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सर्वकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 222 में से

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पृष्ठ 59

सद्वस्तु का ज्ञान प्राप्त हो जाने पर लोक-परलोक के विषयभोग और पुण्यफलभोग
में मन की आसक्ति का समाप्त हो जाना ही वैराग्य है। यह बुद्धि का दूसरा गुण
है। बुद्धि का तीसरा गुण शान्ति है । ( विवेक और वैराग्य हो जाने पर मन में
शान्ति-वृत्ति का उदय होता है । ) चित्त में चञ्चलता अथवा विषयभोग की
कामना में उपरामता की वृत्ति ही शान्ति है। मन शान्त हो जाता है। बुद्धि
का चौथा गुण संतोष है । जब विवेक, वैराग्य और भोग में अनासक्ति का बुद्धि में
उदय होता है, तब मन सहज संतुष्ट होकर आत्मस्वरूप में ही तृप्त रहने का
स्वभाव ग्रहण करता है ।। बुद्धि की यही वृत्ति संतोष है । पांचवां गुण क्षमा है ।
विवेक, वैराग्य, शान्ति और संतोष से मन राग-द्वेष से प्रभावित नहीं होता है ।
वह सहनशील होकर दूसरे जीव में दोष-दर्शन नहीं करता और दोष बन जाने पर
भी उसे दण्डित करने की भावना का त्याग कर देता है । यह आत्मोदय की वृत्ति
है। यह आत्मोदय की वृत्ति ही स्थितप्रज्ञता की भूमिका है ।
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।
( गीता २ । ५५-५७ )
जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को अच्छी तरह
त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह
स्थितप्रज्ञ कहा जाता है । दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं
होता, सुखों की प्राप्ति में जो निःस्पृह है तथा जिसमें राग, भय, क्रोध नहीं रह
जाते, वह स्थिरबुद्धि है। जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित होकर शुभाशुभ की
प्राप्ति में प्रसन्न और द्वेषयुक्त नहीं होता, उसी की बुद्धि स्थिर है ।
अभिमानं, मदीयं, मम सुखं, मम दुःखं, ममेदमिति
पञ्चगुणोऽहंकारः ॥ ४७ ॥
अहंकार की पाँच वृत्तियाँ हैं। पहली अवस्था अभिमान है। मैं ही इस
तरह का कार्य करने में समर्थ हूँ, ऐसा विचार ही अभिमान है। दूसरी अवस्था
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १७