सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
अथवा प्रसरित होती है, हर्षोत्पादिका कला का नाम प्रवृत्ति है, टेढ़ी-टेढ़ी गति
वाली कला लहरी है। चञ्चल होने वाली कला का नाम लोला है, रसादि को
चाटनेवाली कला लेलिहाना है। फैलनेवाली कला का नाम प्रसरन्ती हैं, चन्द्रकान्त
आदि मणियों को द्रवित करने वाली कला का नाम प्रवाहा है, समस्त पदार्थों,
औषधियों, लता-वृक्षादि को सोमरस से सिक्त करने वाली कला का नाम सौम्या
है, सभी पदार्थों में निर्मलता स्थापित करने वाली कला का नाम प्रसन्ना है,
उछल कर प्रवाहित होनेवाली कला का नाम प्लवन्ती है। चन्द्रमा में स्थायी
रहने वाली, प्रलयकाल में भी अक्षुण्ण रहने वाली सोमरसमयी कला ( निजकला )
का नाम निवृत्ता है, यही अमृत कला है, जो सत्रहवीं कला कहलाती है ॥ ६५ ॥
विशेष—चन्द्रमा की इन समस्त कलाओं का सेवन लोकोत्तरानन्द की
प्राप्ति में भी सार्थक है, केवल विषयेन्द्रिय-भोगजन्य तृप्ति में ही इनकी उपादेयता
सीमित नहीं है, ये परमात्मप्रेम अथवा आत्मरस की तृप्तिस्वरूपिणी हैं।
तापिनी, ग्रासिका, उग्रा, आकुञ्चनी, शोषिणी, प्रबोधिनी,
स्मरा, आकर्षिणी, तुष्टिवर्धनी, ऊर्मिरेखा, किरणवती,
प्रभावतीति द्वादशकला सूर्यस्य त्रयोदशी स्वप्रकाशता
निजकला ॥ ६६ ॥
सूर्य की बारह कलायें हैं। तापिनी ताप पैदा करती हैं, ग्रासिका तम—
अन्धकार का नाश करती है, उग्रा कला प्रखर होती है, आकुञ्चनी समेटने वाली,
संकुचित करनेवाली कला है, कुमुदिनी आदि को संकुचित और आकुंचित करने
वाली कलायें उग्रा और आकुंचिनी हैं। शोषिणी कला जल आदि को सुखाती है।
प्रबोधिनी कला कमल आदि को खिलाती (विकसित करती) है। स्मरा कला
स्मृति उत्पन्न करती है। आकर्षिणी कला भूमि आदि के जल को अपनी ओर
खींचती है। प्राणिमात्र को संतुष्टि प्रदान करनेवाली कला तुष्टिवर्धिनी है। ऊर्मी
रेखा कला प्राणियों की आयु का माप करती है। किरणों का विस्तार करनेवाली
कला किरणवती है और प्रकाश करनेवाली कला का नाम प्रभावती है। सूर्य की
तेरहवीं कला—निजकला स्वप्रकाशता है ॥ ६६ ॥
दीपका, राजिका, ज्वालिनी, विस्फुलिङ्गिनी, प्रचण्डा,
पाचिका, रौद्री, दाहिका, रागिणी, शिखावतो इत्यग्नेर्दशकला
२६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
एकादशो कला ज्योतिरिति प्रत्यक्षकरणगुणकला-
समूहः ॥ ६७ ॥
अग्नि की दस कलायें हैं । दीपका कला दीप्त ( प्रकाशित ) करनेवाली
कला है । राजिका कला शोभामयी करती है, ज्वाला कला ही ज्वालिनी है,
विस्फुलिंग—चिनगारी प्रकट करनेवाली कला विस्फुलिंगिनी है । प्रचण्डकिरणों
से युक्त कला ही प्रचण्डा है और जठरादि में भोज्य पदार्थों को पचानेवाली,
वृक्षादि में फलों को रसमय करनेवाली कला ही पाचिका है । रौद्र स्वभाव की
प्रतिपादिका कला रौद्रे है, जलाने वाली कला का नाम दाहिका है, रागिणी अग्नि
की लाल ज्योति की प्रकाशिका है, ऊपर की ओर लौ धारण करनेवाली कला
शिखावती है । अग्नि की निजकला ज्योति है । ( सूर्य, चन्द्र और अग्नि—शिव
के त्रिनेत्र के वाचक हैं । ) इस तरह प्रत्यक्षकरणपंचक के गुण-समूह और
कलाओं का वर्णन किया गया है ॥ ६७ ॥
दस प्रधान नाड़ी और उनके स्थान
ग्रथ नाड़ीनां दश द्वाराणि । इडापिङ्गला नासाद्वारयोर्वहतः
सुषुम्णा नाडी तु ब्रह्मदण्डमार्गेण ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्तं वहति सरस्वती
मुखद्वारे वहति पूषाऽलम्बुषा चक्षुर्द्वारयोर्वहतो गान्धारी हस्ति-
जिह्विका च कर्णद्वारयोर्वहतः कुहूर्गुदाद्वारे वहति शंखिनी
लिङ्गद्वारे वहति एवं दशद्वारेषु वहन्ति ॥ ६८ ॥
शरीर में ( प्राणवाहिनी ) दस ( प्रमुख ) नाड़ियों के दस द्वारों का
वर्णन किया जाता है । नासिका के दोनों रन्ध्र ( द्वार ) से—बायें से इडा और
दायें से पिंगला बहती है । सुषुम्णा नाड़ी ब्रह्मदण्डमार्ग ( मेरुदण्ड ) से ब्रह्मरन्ध्र
तक बहती है और सरस्वती मुख-द्वार में बहती है । चक्षुद्वार—बायें नेत्र में
गान्धारी और दक्षिण नेत्र में हस्तिजिह्विका नाड़ी बहती हैं, कानों के द्वार में—
यथाक्रम पूषा और अलम्बुषा बहती हैं । शंखिनी नाड़ी लिंग द्वार में बहती है
और गुदा द्वार में मूल नाड़ी बहती है । दसों द्वारों में दसों नाड़ियाँ बहती
हैं ॥ ६८ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ २७
विशेष—लिङ्ग से ऊपर और नाभि से नीचे पक्षी के अण्डे के समान समस्त
नाड़ियों का उत्पत्तिस्थान मूलकन्द है । इसी मूलकन्द से बहत्तर हजार नाड़ियों
की उत्पत्ति है । इनमें सर्वश्रेष्ठ सुषुम्णा है, सुषुम्णा से प्राण निकलने पर ब्रह्मलोक
तक गति होती है और जीवात्मा मोक्षस्वरूप—परमेश्वर अलख निरञ्जन शिव में
प्रतिष्ठित हो जाता है । दूसरी नाड़ियों से प्राण निकलने पर स्वकर्म के अनुसार
जीवात्मा को स्वर्गादि लोकों की प्राप्ति होती है । योगशिखोपनिषद् में वर्णित
नाड़ी-स्थिति-क्रम के अनुसार ही ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति १ । ६८ में वर्णित )
नाड़ी-स्थिति का अर्थ किया गया है ।
गान्धारी हस्तिजिह्वा च तस्मान्नेत्रद्वयं गते । २१ ॥
पूषा चालम्बुषा चैव श्रोत्रद्वयमुपागते ॥ २२ ॥
सरस्वती तु या नाड़ी साजिह्वान्तं प्रसर्पति ॥ २३ ॥
( योगशिखोपनिषद् ५ । २१-२३ )
दस वायु ( प्राण ) और उनके स्थान
अथ दशवायवः । हृदये प्राणवायुरुच्छ्वासनिःश्वासकारो
हकारसकारात्मकश्चास्यैवावस्थाभेदे हठयोग इति संज्ञा, 'हकारः
कीर्त्तितः सूर्यष्ठकारश्चन्द्र उच्यते । सूर्याचन्द्रमसोर्योगाद्
हठयोगो निगद्यते ॥' गुदेत्वपानवायू रेचक.कुम्भकपूरकश्च
नाभौ समानवायुर्दीपकः पाचकश्च सर्वाङ्गे व्यानवायुग्र
सनवमनजल्पकारश्च उदानः नागवायु सर्वाङ्ग व्यापकश्चाल-
कश्च कूर्मवायुः कम्पकश्चचक्षुरुन्मेषकारकश्च कृकल उद्गारकः
क्षुत्कारकश्चदेवदत्तो मुखविजृम्भकः धनञ्जयो नादघोषक इति
दशवायववलोकनेन पिण्डोत्पत्तिर्नरनारीरूपः । ६८ ॥
शरीर में दस ( प्रधान ) वायु हैं । हृदय में प्राणवायु उच्छ्वास और
निःश्वास का संचालन करती है । यही प्राणवायु हकार और सकारात्मक है । यह
हकार की ध्वनि से बाहर जाती है, सकार की ध्वनि से भीतर आती है, यह हठयोग
की स्थिति है । हकार सूर्य और ठकार चन्द्र कहा जाता है, हकार और ठकार का
योग ही हठ ( प्राण )-साधना है । गुदादेश में अपान वायु रहती है, यह अपान
२८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
२. द्वितीय-तृतीय उपदेश: पिण्ड-विचार एवं पिण्ड-संवित्ति (शरीरस्थ तीर्थ व देवता)
वायु रेचक, पूरक, कुम्भक की सामर्थ्य से युक्त होती है । ( प्राणवायु को शरीर
में रोकती है और प्राणायाम के अभ्यास में सिद्धि प्रदान करती है । ) नाभि में
समान वायु रहती है, यह जठरानल को दीप्त करती है और भोजन के रूप में
ग्रहण किये गये पदार्थों को रसयुक्त करती तथा पचाती है । व्यानवायु शरीर में
व्याप्त रहती है, यह समस्त नाड़ियों में विद्यमान मलादि दोषों का शोषण कर
शरीर की कान्ति और तेज को बढ़ाती है । कंठ में उदान वायु रहती है । इसका
कार्य वमन, भाषण और शरीर से प्राण का उत्क्रमण है । नागवायु शरीर में व्याप्त
रह कर उसके अंग-प्रत्यंग के संचालन में सहायता करती है । आँखों की पलकों
को खोलना और बन्द करना ( नेत्रोन्मीलन ) कूर्मवायु का कार्य है । कृकल
( कृकर ) वायु का कार्य है डकार उत्पन्न करना तथा भूख बढ़ाना । देवदत्त
वायु जँभाई लेने में सहायता रती है तथा धनञ्जय समस्त शरीर में व्याप्त
रहकर अव्यक्त नाद उत्पन्न करती है । ( प्राण, अपान, समान, उदान और
व्यान, पाँच मुख्य वायु हैं और नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त तथा धनञ्जय उपवायु
हैं । ) इस तरह इन दस वायुओं के सम्बन्ध से नरनारीरूप पिण्ड ( शरीर ) की
उत्पत्ति होती है ॥ ६६ ॥
विशेष -- प्राण-वायु के हकार की ध्वनि से बाहर जाने पर और सकार की
ध्वनि से भीतर आने पर हंस-हंस मन्त्र की उत्पत्ति शरीर में इक्कीस हजार छः
सौ बार होती रहती है । इस हंस मन्त्र से सोऽहं शब्द की उत्पत्ति होती है ।
हंस-मन्त्र का जप ही अजपा गायत्री है । यह योगियों को मोक्ष प्रदान करती है,
इसके संकल्पमात्र से उसके समस्त पाप नष्ट होते हैं । कुण्डलिनी से उत्पन्न यह
गायत्री, प्राण-विद्या महाविद्या है ।
हकारेण वहिर्याति सकारेण विशेत् पुनः ।
हंसहंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा ॥
अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदायिनी ।
अस्याः संकल्पमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
कुण्डलिन्यां समुद्भूता गायत्री प्राणधारिणी ।
प्राणविद्या महाविद्या यस्तां वेत्ति स योगवित् ॥
( गोरक्षशतक ४२, ४४, ४६ )
हकार से सूर्यस्वर और ठकार से चन्द्रस्वर का सुषुम्ना नाड़ी में संयोग ही
हठयोग में प्राणसिद्धि है ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ २६
जीवात्मा के स्थूल शरीर का उत्पत्ति-क्रम
अथ गर्भोली पिण्डोत्पत्तिर्भवति नरनारीसंयोगे ऋतुकाले
रजोविन्दुसंयोगे जीवः ॥ ७० ॥
ऋतु-काल में नर और नारी के संभोग—संयोग ( संगम ) से निकले हुए
रज-विन्दु का स्त्री की योनि में ऐक्य होने से जीव के स्थूल शरीर की उत्पत्ति
होती है ॥ ७० ॥
विशेष—शिवरूप विन्दु है और बीज शक्ति रूप है । इन दोनों का परस्पर
सम्बन्ध ही नाद कहा गया है । व्यष्टि जीव सहित शुक्र भी बिन्दु है, पुरुष के वीर्य
में अन्य जीवात्मा निवास करता है, पर उसके शरीर में उसे सुख-दुःखादि प्रभावित
नहीं करते, पर संभोग-काल में भोगार्थ कर्मवश वह अन्य जीवात्मा पुरुष के बिन्दु
से स्त्री के गर्भाशय में रज में सिंचित होकर स्थूल शरीर ( रज-वीर्य से उत्पन्न
शरीर ) में जन्म लेने में समर्थ होता है । अतएव रज और बिन्दु का ऐक्य ही
भोगकर्म के परिणामस्वरूप स्थूल शरीर की उत्पत्ति का कारण है ।
प्रथमदिने कलल भवति सप्तरात्रे बुद्बुदाकारं भवति ।
अर्धमासे गोलाकारं भवति । मासमात्रेण कठिनं मासद्वयेन
शिरो भवति । तृतीयमासि हस्तपादादिकं भवति । चतुर्थे मासि
चक्षुःकर्णादिनासिकामुखमेढ्रगुदं भवति । पञ्चमे मासि
पृष्ठोदरौ भवतः । षष्ठे मासि नखकेशादिकं भवति । सप्तमे
मासे सर्वचेतनयुक्तो भवति । अष्टमे मासि सर्वलक्षणयुक्तो
भवति । नवमे मासि सत्यज्ञानयुक्तो भवति । दशमे मासि
योनिसंस्पर्शादज्ञानी बालको भवति ॥ ७१ ॥
( माता के गर्भ में प्रविष्ट जीवात्मा के स्थूल शरीर के निर्माण ( सृष्टि )
क्रम पर प्रकाश डालते हुए महायोगी गोरखनाथजी का कथन है— ) नर-नारी
के परस्पर सम्भोग के परिणामस्वरूप वीर्य और रज का मिश्रित द्रव पहले दिन
कुछ गाढ़ा-सा रहता है । सात दिन की अवधि में यह बुलबुले का आकार धारण
कर लेता है । पन्द्रह दिनों में यह गोल आकार का ( पिण्ड ) हो जाता है । एक
३० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
माह में यह स्थूल ठोस—कठिन-सा हो जाता है और दो माह में ( उस गोलाकार
पिण्ड में ) सिर बनता है, तीन माह में उसमें हाथ-पैर आदि अंग बनते हैं, चार
माह की अवधि में उसमें नेत्र, कान, नाक, मुख, लिंग, गुदा के आकार बन जाते
हैं, पाँचवें मास में पीठ और पेट आकारित होते हैं, छठें माह में नख, बाल आदि
उत्पन्न होते हैं; सातवें माह में उसमें चेतनता का समस्त अंगों में संचार होता है ।
आठवें मास में उसमें सभी लक्षण पूरे हो जाते हैं। नौवें मास में उसे ( चेतन
जीवात्मा को ) अपने सत्स्वरूप का ज्ञान होता है । ( उसे पिछले जन्म के
कर्मों और तज्जन्य दुःखों का स्मरण हो आता है और वह परमात्मा से प्रार्थना
करता है कि मुझे कृपा करके इस गर्भवास नरक-यातना से मुक्त कीजिये । दसवें
मास में गर्भ से बाहर होते समय योनि-द्वार का स्पर्श होते ही वह अज्ञानी बालक-
रूप में जन्म लेता है ॥ ७१ ॥
शुक्राधिकेषु पुरुषो रक्ताधिका कन्यका समशुक्ररक्ताभ्यां
नपुंसकः परस्परं चिन्ताव्याकुलत्वादन्धः कुब्जो वामनः पङ्गु
रङ्गहीनश्च भवति । परस्परं रतिकालेऽङ्गनिःपीडनकर-
गुणैः शुक्रो द्वित्रिवारं पतति, येन द्वितीयो बालको
भवति ॥ ७२ ॥
यदि पिता का वीर्य गर्भाशय में अधिक सिंचित होता है और माता का रक्त
( रज ) कम है तो संभोग के परिणामस्वरूप पुरुष- ( बालक ) शरीर उत्पन्न
होता है, माता का रज अधिक होने से कन्या-शरीर की उत्पत्ति होती है ।
पिता-माता के वीर्य और रज के समान ( मिश्रित ) द्रव से नपुंसक सन्तान की
प्राप्ति होती है । यदि संभोग के समय स्त्री-पुरुष, दोनों चिन्ताग्रस्त हों तो जन्म
लेने वाली सन्तान अन्धी, कुबड़ी, वामन (बौनी), लँगड़ी, अंगहीन होती है । रति-
प्रसंग के समय आपस में अङ्गमर्दन से वीर्य-स्खलन में अवरोध होने पर गर्भाशय में
रुक-रुक कर दुबारा वीर्यपात होते रहने पर एक से अधिक सन्तान उत्पन्न
होती हैं ॥ ७२ ॥
सार्धपलत्रयं शुक्रं विंशतिपलं रक्तं द्वादशपलं मेदः,
दशपलं मज्जा, शतपलं मांसं, दशपल पित्तं, विंशतिपलं श्लेष्मा,
तद्वद्वातः स्यात् षष्ट्यधिकशतत्रयमस्थीन्यस्थिमात्रं सन्धयः
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३१
सार्धत्रयकोटिरोमकूपाणि पितृमातृवीर्यं भवति वातपित्तश्लेष्म-
धातुत्रयं दशधातुमयं शरीरमिति गर्भोत्थपिण्डोत्पत्तिः ॥ ७३ ॥
( जीवात्मा के स्थूल शरीर में कितनी मात्रा में कौन-कौन धातु हैं, इसका
वर्णन किया गया है । ) इस शरीर में वीर्य साढ़े तीन पल ( २२५ ग्राम ), रक्त
बीस पल (१२८० ग्राम), मेद बारह पल ( ७६८ ग्राम ), मज्जा, दस पल
(६४० ग्राम), मांस सौ पल (६४०० ग्राम), पित्त दस पल (६४० ग्राम), कफ
२० पल ( १२८० ग्राम ), वात बीस पल (१२८० ग्राम), अस्थि तीन सौ साठ,
सन्धि (जोड़) तीन सौ साठ, रोम और रोमकूप साढ़े तीन करोड़ हैं । यह शरीर
पिता-माता के वीर्य और रज से उत्पन्न है । वात, पित्त, कफ आदि से युक्त दस
धातुओं से निर्मित शरीर की गर्भ से उत्पत्ति होती है । यह गर्भ में उत्थित पिण्ड
की उत्पत्ति है ॥ ७३ ॥
विशेष--१ पल ४ कर्ष के बराबर होता है, और १ कर्ष का तौल १६
मासा है, १ मासा १ ग्राम के तौल के बराबर होता है, इस तरह १ पल का तौल
६४ ग्राम है ।
इति शिवगोरक्षविरचितसिद्धसिद्धान्तपद्धतौ प्रथमोपदेशः ॥
३२ ] [ सिद्ध सिद्धान्तपद्धति
दूसरा उपदेश
[ पिण्डविचार ]
नौ चक्र-वर्णन
पिण्डे नवचक्राणि । आधारे ब्रह्मचक्रं त्रिधावतं भगमण्डला-
कारं तत्र मूलकन्दस्तत्र शक्तिं पावकाकारां ध्यायेत् तत्रैव
कामरूपपीठं सर्वकामप्रदं भवति ॥ १ ॥
शरीर में नौ चक्र हैं। ( गुदा से दो अंगुल ऊपर और लिङ्ग से दो अंगुल
नीचे—चार अंगुल परिमाण का मूलाधार है। ) मूलाधार में तीन बार गोल
आकार में चारों ओर लिपटा त्रिकोण भगमण्डल के सदृश ब्रह्मचक्र है, वहीं
( उसी के समीप) मूलकन्द है, वहाँ अग्नि के आकारवाली शक्ति का (योगी को)
ध्यान करना चाहिये, वहीं कामरूप पीठ है, जिसके ध्यान मात्र से समस्त काम-
नाओं की सिद्धि होती है ॥ १ ॥
विशेष—हमारे पिण्ड में पीठ में संलग्न मेरुदण्ड है। मेरुदण्ड के भीतर ही
दाहिनी ओर पिंगला तथा बायीं ओर इडा नाड़ी स्थित हैं, मध्य में सुषुम्ना
नाड़ी है। यह तेजःस्वरूपिणी नाड़ी मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त सहस्रार तक जाती
है। इसी नाड़ी में स्थित अनेक आकार-विशेष ही षट्चक्र के रूप में प्रसिद्ध हैं।
गोरखनाथजी ने यद्यपि इसमें नवचक्र निरूपित किये हैं तथापि उन्होंने गोरक्ष-
शतक आदि में षट्चक्र ही स्वीकार किये हैं।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३३
षट्चक्रं षोडशाधारं त्रिलक्ष्यं व्योमपञ्चकम् ।
स्वदेहे ये न जानन्ति कथं सिद्ध्यन्ति योगिनः ॥
आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम् ।
योनिस्थानं द्वयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते ॥
आधाराख्यं गुदास्थानं पङ्कजं च चतुर्दलम् ।
तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाक्षा सिद्धवन्दिता ॥
योनिमध्ये महालिङ्गं पश्चिमाभिमुखस्थितम् ।
मस्तके मणिवद् बिम्बं यो जानाति स योगवित् ॥
तप्तचामीकराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत् ।
त्रिकोणं तत्पुरं वह्नेरधोमेढ्रात् प्रतिष्ठितम् ॥
यत्समाधौ परं ज्योतिरनन्तं विश्वतोमुखम् ।
तस्मिन्दृष्टे महायोगे यातायातं न विद्यते ॥
( गोरक्षशतक १३, १७-२१ )
मूलाधार-चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र के मध्य में स्थित योनिस्थान को
कामरूप कहा जाता है। मूलाधार नामक चार दल वाले कमल ( चक्र ) के,
जो गुदास्थान में है, मध्य में त्रिकोणाकार योनि है, यही योगसिद्धों द्वारा वन्दित
कामाक्षा पीठ है। उस कामाक्षा के मध्य में पश्चिमाभिमुख महालिंग है, उसके
मस्तक में मणि के समान प्रदीप्त बिम्ब को जो अच्छी तरह जानता है, वही योग-
वेत्ता है। लिङ्गस्थान के नीचे मूलाधार पद्म की कर्णिका में तप्त स्वर्ण वर्ण
और विद्युल्लेखा के समान ज्योतित त्रिकोणाकार अग्निमय योनिस्थान है।
समस्त दिशाओं में व्याप्त इस परम ज्योति का महायोगसमाधि में स्थित योगी
दर्शन कर मुक्त हो जाता है।
मूलाधार कमल ( चक्र ) ही ब्रह्मचक्र है। यह मूलाधार-चक्र कुलचक्र
भी कहलाता है। इस में कुण्डलिनी निवास करती है। कुण्डलिनी के स्थान में ही
बन्धूक-पुष्प के समान लाल वर्ण के तेज से युक्त कामबीज है। यह तपाये हुए
स्वर्ण के समान उज्ज्वल और प्रयुक्त अक्षरस्वरूप है। यह काम-बीज शरद के
चन्द्रमा के समान दीप्त और करोड़ों सूर्य के समान तेजस्वी तथा करोड़ों चन्द्रमा
के समान शीतल होता है।
तत्र बन्धूकपुष्पाभं कामबीजं प्रकीर्तितम् ॥
( शिवसंहिता ५।१६ )
३४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
यह आधार चक्र अपने चार दलों से युक्त है, उन दलों में वं, शं, षं, सं, ये
चार अक्षर हैं। इस मूलाधार कमल के ध्यान से शरीर की कान्ति बढ़ जाती है
जठराग्नि प्रदीप्त होती है, शरीर नीरोग रहता है। साधक तीनों काल का ज्ञाता
हो जाता है। इस चक्र के ध्यान से योगी के सभी पाप क्षणमात्र में नष्ट
हो जाते हैं। योगी मन, बिन्दु और प्राण, तीनों को अपने वश में कर लेता है।
द्वितीयं स्वाधिष्ठानं चक्रं तन्मध्ये पश्चिमाभिमुखलिङ्गं
प्रवालाङ्कुरसदृशं ध्यायेत् तत्रैवोड्डियानपीठं जगदाकर्षणं
भवति ॥ २ ॥
दूसरा स्वाधिष्ठान चक्र है। उसके बीच में पीछे की ओर मुख वाला प्रवालांकुर
मूंगे के अग्रभाग के सदृश ( लाल रंग का ) शिवलिंग है, इसका ध्यान करना
चाहिये, यहीं उड्डियान पीठ भी है, इस लिंग का ध्यान करने से समस्त जगत्
साधक की ओर सहज खिंच जाता है, शिवलिंग की उपासना से जगत् के प्राणो
को साधक अपनी ओर आकृष्ट करने की सामर्थ्य प्राप्त करता है ॥ २ ॥
विशेष --'स्व' शब्द प्राण का वाचक है, इसलिये स्वाधिष्ठान प्राणचक्र है।
स्वशब्देन भवेत्प्राणः स्वाधिष्ठानं तदाश्रयः ।
( गोरक्षशतक २२ )
यह स्वाधिष्ठान-चक्र मेढ़ में स्थित है।'यह छः दलों का कमल ( चक्र )
है। यह माणिक्य के समान लाल रंग का है। छः दलों पर क्रमशः वं, भं, मं,
यं, रं, लं अक्षर अंकित होते हैं। इस चक्र में आत्मा का ध्यान कर योगी सुखी
होता है।
स्वाधिष्ठाने च षट्पत्रे सन्माणिक्यसमप्रभे ।
नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा योगी सुखो भवेत् ॥
( गो० संहिता २ । ६५)
स्वाधिष्ठान चक्र के ध्यानी को समस्त न सुने शास्त्रों का ज्ञान हो जाता
है। उसका शरीर रोगरहित हो जाता है। वह संसार में अभय रहता है।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३५
सर्वरोगविनिर्मुक्तो लोके चरति निर्भयः ॥
(शिवसंहिता ५।१०१)
स्वाधिष्ठान चक्र का ध्यान करने वाले योगी की शारीरिक दिव्य कान्ति से
लोग सम्मोहित हो उठते हैं । उसे अनेकानेक सिद्धियाँ प्राप्त होने लगती हैं, पर
वह इन्हें साधना में बाधक मानकर आत्मलीन रहता है ।
तृतीयं नाभिचक्रं पञ्चावर्तं सर्पवत् कुण्डलाकारं तन्मध्ये
कुण्डलिनीशक्तिं बालार्ककोटिसदृशीं ध्यायेत् सा मध्यमा
शक्तिः सर्वसिद्धिदा भवति ॥ ३ ॥
तीसरा नाभिचक्र (मणिपूरक) है। यह सर्प के समान कुण्डलाकार नाड़ी
से पाँच वलयों में वेष्टित है, इस चक्र के मध्य में अरुणोदयकालीन करोड़ों सूर्य
की प्रभा के समान विभासित कुण्डलिनी शक्ति का (योगी को) ध्यान करना
चाहिये । यह मध्यमा शक्ति है, इसके ध्यान मात्र से समस्त सिद्धियों की प्राप्ति
होती है । (यह मूलाधार में स्थित सूक्ष्म कुण्डलिनी शक्ति की ही ज्योतिर्मयी
विशिष्ट अवस्था है। इसके ध्यान से चित्त में सत्वगुण प्रवाहित होता है।
मूलाधारस्थ कुण्डलिनी तीन वलयों में वेष्टित होती है ।) मणिपूरक-चक्र में
ज्योतित पाँच वलयों में वेष्टित कुण्डलिनी मध्यमा शक्ति है ॥ ३ ॥
विशेष—यह स्वर्ण-वर्ण का कमल है, इसके दस दलों पर क्रमशः ड से फ
तक—डं, ढं, णं, तं, थं, दं, धं, नं, पं, फं, वर्णमाला अंकित है। इस चक्र का ध्यान
करने से पाताल नाम की सिद्धि प्राप्त होती है, योगी इसका ध्यान कर सदा
सुखी रहता है । जगत् में उसकी अभीष्ट कामनायें पूरी होती हैं, दुःख-रोग नष्ट
होते हैं, मृत्यु का भय टल जाता है और परकाय-प्रवेश की शक्ति प्राप्त होती है,
स्वर्णादि बनाने की सिद्धि प्राप्त होती है, औषधि—जड़ी-बूटी तथा पृथ्वी के भीतर
छिपी रत्नादि निधि का ज्ञान होता है ।
तृतीयं पङ्कजं नाभौ मणिपूरकसंज्ञकम् ।
दशारण्डादिफान्तार्णं शोभितं हेमवर्णकम् ।
तस्मिन् ध्यानं सदा योगी करोति मणिपूरके ।
तस्य पातालसिद्धिः स्यान्निरन्तरसुखावहा ॥
ईप्सितं च भवेल्लोके दुःखरोगविनाशनम् ॥
३६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
कालस्य वञ्चनं चापि परदेहप्रवेशनम् ॥
जाम्बूनदादिकरणं सिद्धानां दर्शनं भवेत् ।
औषधादर्शनं चापि निधीनां दर्शनं भवेत् ॥
( शिवसंहिता १०४, १०६-१०८ )
विवेक-मार्तण्ड में महायोगी गोरखनाथजी का कथन है कि मणिपूरक
चक्र तरुण सूर्य के समान है । नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर कर इस
चक्र में आत्मा का ध्यान करने से योगी जगत् को संक्षुब्ध कर देता है ।
तरुणादित्यसंकाशे चक्रे तु मणिपूरके ।
नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा संक्षोभयेज्जगत् ॥
( विवेकमार्तण्ड १७० )
मणिपूर चक्र का अर्थ है मणि का नगर, यह अग्नि का केन्द्र है, ताप का
मध्य बिन्दु है, मणि की भांति चमकदार है । यह चेतनता की शक्ति से प्रदीप्त
है । इस पद्म के भीतर उलटा त्रिभुज है, जिसका रंग लाल है । इसका वाहन
भेंड़ा है । यह चक्र आत्मिक तथा भौतिक शरीर का प्राण-केन्द्र है, यहाँ प्राण-
अपान का संगम होता है, जिसके परिणामस्वरूप ताप की उत्पत्ति होती है ।
यह ताप जीवन की रक्षा करता है ।
श्रीगोरखनाथ ने इस चक्र को नाभिचक्र कहा है । यह सुषुम्ना नाड़ी के
अन्तर्गत एक केन्द्र के रूप में नाभिक्षेत्र में स्थित अनुभव किया जाता है । एक
ऊर्ध्वगामिनी शक्ति योगी की चेतना को आधार चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र से
ऊपर उठा कर इसमें प्रतिष्ठित करती है । मूलाधार और स्वाधिष्ठान की
अपेक्षा शिव-शक्ति के मिलन की आनन्दानुभूति का यह विशिष्ट केन्द्र है ।
महायोगी गोरखनाथ ने इस चक्र में प्रकट कुण्डलिनी को मध्यमा शक्ति कहा है,
जिसका आशय है कि शिव-शक्ति के मूल स्वरूप की आत्माभिव्यक्ति की यह
मध्यवर्ती अवस्था है । मणिपूर चक्र में मनरूपी भ्रमर रहता है । यह समय-
समय पर विभिन्न दलों-पंखुड़ियों पर विचरण करता है । इस चक्र में चौबीस
सौ श्वास लेने के समय ( २ घंटे ४० मिनट ) तक ध्यान करना चाहिये, इस
ध्यान से शान्ति, आनन्द, धृति, समता, निर्मोहता, वैराग्य, एकान्तप्रियता आदि
की प्राप्ति होती है ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३७
चतुर्थं हृदयाधारमष्टदलकमलमधोमुखं तन्मध्ये कर्णिकायां
लिङ्गाकारं ज्योतिरूपां ध्यायेत् । सैव हंसकला सर्वेन्द्रियाणि
वश्यानि भवन्ति ॥ ४ ।
हृदय में ( सुषुम्ना नाड़ी में ) स्थित चौथा अनाहत चक्र है। यह आठ
दल ( पंखुड़ियों ) वाला कमल है, जो अधोमुख ( नीचे की ओर मुख वाला )
है। उसके मध्य में कर्णिका में स्थित शिव-लिंग के आकार वाली ज्योति का
ध्यान करना चाहिये। यही हंसकला नामवाली श्रीशक्ति है। इसकी उपासना से
( साधक की ) सभी इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं ॥ ४ ॥
विशेष—यद्यपि इस सिद्धसिद्धान्तपद्धति में गोरखनाथजी ने अनाहत चक्र
को अष्टदल कमल कहा है तथापि अपनी अन्यान्य रचनाओं में उन्होंने अनाहत चक्र
को बारह पंखुड़ियों ( दल ) का कमल स्वीकार किया है और उनकी इस
स्वीकृति की पुष्टि शिवसंहिता आदि में भी उपलब्ध होती है। बारह दलवाला
कमल ही अनाहत महाचक्र है, यह पाप-पुण्य से रहित है, जीवात्मा तब तक
संसार-बन्धन में भ्रमित रहता है, जब तक वह इस चक्र में ध्यानस्थ होकर
परमतत्व परमात्मा का ज्ञान नहीं प्राप्त करता है, परमात्म साक्षात्कार नहीं कर
लेता है।
द्वादशारे महाचक्रे पुण्यपापविवर्जिते ।
तावज्जीवो भ्रमत्येव यावत्तत्त्वं न विन्दति ॥
( गोरक्षशतक २४ )
गोरखनाथजी का कथन है कि इस अनाहत-चक्र का ध्यान करने वाला
साधक अमृतत्व में स्थित हो जाता है, अमर हो जाता है।
अनाहते महाचक्रे द्वादशारे च पङ्कजे ।
नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा ध्यातामरो भवेत् ॥
( विवेकमार्तण्ड १७१)
गोरक्षसंहिता में तो स्पष्ट कथन है कि अनाहत चक्र के ध्यान से साधक
ब्रह्ममय हो जाता है। यह चक्र प्रचण्ड सूर्य के समान प्रकाशित कहा गया है।
३८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
नासाग्रे दृष्टिमाधाय ध्यात्वा ब्रह्ममयो भवेत् ॥
( गोरक्षसंहिता २।६७)
हृदय-चक्र—अनाहत कमल के ध्यान से मन जड़ता का परित्याग कर
ऊर्ध्वगामी होकर प्रबोध पाता है, जाग जाता है । महायोगीन्द्र मत्स्येन्द्रनाथजी ने
गोरखनाथजी को उपदेश दिया है ।
हिरदा चक्र में मन प्रबोध ॥
( गोरख वा० मच्छींद्र-गोरखबोध ५४ )
अनाहतचक्र आघातरहित होता है । सृष्टि की समस्त ध्वनियों की उत्पत्ति
परस्पर दो वस्तुओं के आघात से होती है, भौतिक जगत् के परे दिव्य ध्वनि ही
समस्त ध्वनियों का स्रोत है । यह अनहद ( अनाहत ) नाद है; ये ध्वनियाँ हृदय
केन्द्र से उत्पन्न होती हैं । यह चक्र नीले रंग का कमल कहा गया है । इसके
मध्य में षट् कोण की आकृति है । इसका बीज मन्त्र यं है । इसकी वाहन द्रुतगामी
काला हिरण है । यह वायुतत्व का प्रतीक है । इसके देवता पिनाक धारण
करने वाले भगवान शिव हैं। इसकी अधिष्ठात्री देवी काकिनी है । अनेक सिद्धों
और योगियों ने इस चक्र का रंग श्वेत भी बताया है । इस चक्र में ४८०० श्वास
आने के समय ( ५ घंटे २० मिनट ) तक ध्यान करना चाहिये । ध्यान से
निर्लोभता, सत्यता, प्रेम, सावधानता, समदर्शिता, अहिंसकता, वात्सल्य, विवेक-
शीलता, जिज्ञासुता, दया, क्षमा और करुणा की शक्ति प्राप्त होती है । शिवसंहिता
में इस चक्र को लाल रंग का कहा गया है । यह चक्र आनन्द का स्थान कहा
गया है । इस अनाहत (चक्र) कमल में व्याप्त परम तेज को वाणलिंग कहा
गया है । इस वाणलिंग के स्मरण मात्र से साधक को दृष्ट-अदृष्ट फल की
प्राप्ति होती है । वह दूरस्थ सूक्ष्म पदार्थों को देखने की शक्ति पाता है । वह
आकाश में उड़ने में समर्थ हो जाता है । खेचरी-मुद्रा सिद्ध हो जाती है । आकाश
में स्थित जीव साधक के वश में हो जाते हैं ।
हृदयेऽनाहतं नाम चतुर्थं पङ्कजं भवेत् ।
कादिठान्तार्णसंस्थानं द्वादशारसमन्वितम् ॥
अतिशोणं वायुबीजं प्रसादस्थानमीरितम् ।
पद्मस्थं तत्पर तेजो वाणलिङ्गं प्रकीर्तितम् ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३६
यस्यस्मरणमात्रेण दृष्टादृष्टफलं लभेत् ॥
सिद्धिः पिनाकीयत्रास्ते काकिनी यत्र देवता ।
( शिवसंहिता ५ । १०६-१११ )
महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि इस ज्योतिपूर्ण कमल के मध्य में
शक्ति स्वयं को असाधारण रूप से भव्य, सुन्दर और स्थिर लिंगाकार प्रकाश के
रूप में प्रकट करती है। शिवरूपिणी—शिवालिंगन के आनन्द में मग्न कुण्डलिनी
के इस रूप को हंसकला कहा जाता है, इस हंसकला को श्रीशक्ति भी कहा जाता
है। योगी इसका ध्यान कर इन्द्रियजयी और शान्त हो जाता है। सिद्धियों की
प्राप्ति के प्रलोभन नष्ट हो जाते हैं और योगी अपनी जैविक अथवा मानसिक
शक्ति को इसमें केन्द्रित कर लेता है।
पञ्चमं कण्ठचक्रं चतुरङ्गुलं तत्र वाम इडा चन्द्रनाड़ी
दक्षिणे पिङ्गला सूर्यनाड़ी तन्मध्ये सुषुम्णां ध्यायेत् सैवानाहत-
कलाऽनाहतसिद्धिर्भवति ॥ ५ ॥
पांचवां चार अंगुल विस्तारवाला कण्ठ ( विशुद्ध ) चक्र है। वहाँ बायीं
ओर इडा-चन्द्रनाड़ी है और दाहिनी ओर पिंगला-सूर्यनाड़ी है। ( ये दोनों
नाडियाँ मूलकन्द से प्रकट होकर यहाँ आती हैं- निकलतो हैं।) इन दोनों
नाड़ियों के मध्य में ( श्वेत वर्ण की ) सुषुम्ना नाड़ी-ब्रह्म नाड़ी का ध्यान
करना चाहिये। यह ब्रह्मनाड़ी अनाहत कला कहलाती है, इसकी उपासना
( ध्यान ) से अनाहत सिद्धि—मानसिक संकल्पों की सिद्धि होती है, संकल्पशक्ति
सफल होती है ॥ ५ ॥
विशेष—कण्ठस्थान में दीपक की ज्योति के समान प्रभाववाले विशुद्ध चक्र में
नासा के अग्र भाग पर दृष्टि स्थिर कर आत्मा का ध्यान करने से साधक के समस्त
( आधिभौतिक, आधिदैहिक और आधिदैविक ) ताप-दुःख नष्ट हो जाते हैं।
सततं घण्टिकामध्ये विशुद्धे दीपकप्रभे।
नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा दुःखं विमुञ्चति ॥
( विवेकमार्तण्ड १७२ )
महायोगीन्द्र मत्स्येन्द्रनाथजी ने कण्ठचक्र को इष्ट के ध्यान का स्थान
कहा है।
४० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
'कांठे चक्रे धरिये ध्यान ।
( मच्छोन्द्रगोरखवोध-५४ )
यह कण्ठचक्र सुनहले रंग का है। यह बड़ा तेजस्वी और सोलहस्वरों
( अक्षरों ) से समलंकृत है । इस कमल में सोलह दल हैं और उन पर यथाक्रम-
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः —स्वर अंकित हैं ।
इस चक्र की अधिष्ठात्री शाकिनो है और इष्ट देवता अर्धनारीश्वर शिव हैं ।
कण्ठस्थानस्थितं पद्म विशुद्ध नाम पञ्चमम् ।
सुहेमाभं स्वरोपेतं षोडशस्वरसंयुतम् ।
( शिवसंहिता ५ । ११६ )
जो इस कंठचक्र का ध्यान करता है, वह योगीश्वर हो जाता है, चारों
वेद का ज्ञानी हो जाता है, इस विशुद्ध चक्र में मन और प्राण का लय होने पर
योगी यदि क्रोध करता है तो तीनों लोक भय से कांप उठते हैं। इसका ध्यान
कर योगी लम्बी अवधि के लिये वाह्य ज्ञान से शून्य होकर समाधिस्थ हो जाता
है । इस चक्र में
शिवशक्ति का नादरूप अथवा ध्वनिरूप है। इस स्तर पर योगी नादों की
अनेकता को पार कर शाश्वत शिव-शक्ति के तादात्म्य का अनुभव करता है।
षष्ठं तालुचक्रं तत्रामृतधाराप्रवाहः घण्टिकालिङ्गमूल-
रन्ध्रराजदन्तं शंखिनोविवर दशमद्वारं तत्र शून्यं ध्यायेत्,
चित्तलयो भवति ॥ ६ ॥
छठाँ तालुचक्र है, वहाँ ( सहस्रदलस्थित चन्द्रमण्डल से ) अमृत प्रवाहित
होता रहता है । ( उस अमृत की बूंदें तालु की विशेष नाड़ियों में झरती रहती
हैं । ) मुख खोलने पर जो मांस खण्ड दीखता है, वही घण्टिका है, जो लिंग के
समान है, उसके मूल से लेकर तालुपर्यन्त राजदन्त नाम का बिल है, यही शंखिनी
विवर कहा जाता है । ( यहाँ शंखिनी नाड़ी का सम्बन्ध है । ) यह दसवें द्वार
का मार्ग है, यहाँ शून्य ( निर्गुण-निराकार अलख-निरञ्जन परमेश्वर ) का
ध्यान करना चाहिये । यहाँ शून्य का ध्यान करने से चित्त लय को प्राप्त
होता है ॥ ६ ॥
विशेष—महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि तालुचक्र तालूमूल में स्थित
हैं । इस चक्र में सहस्रार से सतत अमृत की धारा प्रवाहित होती रहती है ।
योगी अपनी मानसिक जैविक शक्ति को इस चक्र में समुचित प्रणाली से एकाग्र
कर इस अमृत का पान कर क्षुधा-पिपासा से मुक्त होकर शरीर दिव्य कर लेता
है, भौतिक अमृतत्व प्राप्त कर लेता है, इस चक्र में शून्य पर ध्यान केन्द्रित करना
चाहिये, जिससे चित्तलय की स्थिति की प्राप्ति हो सके । पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान
प्राप्त करने के लिये और चेतना को परमात्ममय कर देने के लिये चित्तलय एक
महान् सोपान है । तालूमूल में एक घंटिका लिंग है, जिसके मूल में एक लघु
छिद्र है, एक पूर्ण रिक्त स्थान शंखिनी विवर है. यह दसवाँ द्वार है, यहीं शून्य पर
धारणा करने से समाधि के फलस्वरूप चित्त विलीन हो जाता है, इसमें ध्यान
करने से व्यावहारिक चेतना समाप्त हो जाती है और पारमार्थिक ज्योति आलो-
कित हो उठती है ।
इसी चक्र से योगी को सहस्रार से द्रवित अमृतपान सुलभ होता है ।
गोरखनाथ ने इस चक्र के ऊपर भ्रूचक्र ( आज्ञा चक्र ) और निर्वाण-चक्र तथा
४२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
आकाश चक्र में शिव सायुज्य अथवा अलख निरंजन परम ज्योति स्वरूप स्वसंवेद्य
परमेश्वर के साक्षात्कार का वर्णन किया है ।
स्रवत् पीयूषसम्पूर्णे लम्बिकाचन्द्रमण्डले ।
नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा मृत्युं विमुञ्चति ॥
( विवेकमार्तण्ड १७३ )
लम्बिका-स्थान में स्थित चन्द्रमण्डल से स्रवित पीयूष में आत्मा का ध्यान
कर योगी नासा के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर करता है और मृत्यु के भय से रहित
हो जाता है ।
सप्तमं भ्रूचक्र मध्यममंगुष्ठमात्रं ज्ञाननेत्रं दीपशिखाकारं
ध्यायेद् वाचां सिद्धिर्भवति ॥ ७ ॥
सातवाँ भ्रूचक्र है । ( यही आज्ञाचक्र कहा जाता है । यह दोनों भौंहों के
मध्य में स्थित है, इसलिये मध्यम चक्र कहा गया है । ( यह दो दलों वाला कमल
है । ) इस भ्रूचक्र के मध्य में दीपशिखा के आकार वाला एक अंगुल का ज्ञाननेत्र
( तृतीय नेत्र ) है । इस ज्ञाननेत्र का ध्यान करने से योगी वाक्सिद्ध हो जाता
है, वह जो कुछ कहता है, वह व्यर्थ नहीं होता ॥ ७ ॥
गोरक्षसंहिता में महायोगी गोरखनाथजी ने आज्ञाचक्र में माणिक्य की
शिखा के समान आत्मा में नासाग्रदृष्टि से ध्यान करने का फल आनन्दमय
होना बताया है । इस आज्ञाचक्र में नीलवर्ण के शिव का ध्यान कर योगी प्राण
को वश में कर जीव-शिव का ऐक्य सम्पादित करता है। नासिका के अग्र भाग
में निर्गुण, शान्त, विश्वतोमुख, आकाश के समान व्याप्त शिव का ध्यान कर
ब्रह्ममय हो जाता है । आज्ञाचक्र की स्थिति भौंहों के मध्य में है । भौंहों के
मध्य के स्थान को आकाश कहा जाता है, इस चक्र के देवता शिव हैं; उनका
ध्यान कर योगी मुक्ति प्राप्त करता है ।
भ्रुवोरन्तर्गतं देवं सन्माणिक्यशिखोपमम् ।
नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वानन्दमयो भवेत् ।
ध्यायन्नीलनिभं नित्यं भ्रूमध्ये परमेश्वरम् ।
आत्मानं विजितप्राणो योगी योगमाप्नुयात् ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ४३
आकाशे यत्र शब्दः स्यात्तदाज्ञाचक्रमुच्यते ।
तत्रात्मानं शिवं ध्यात्वा योगी मुक्तिमवाप्नुयात् ॥
( गोरक्षसंहिता २।७०,७१, ७३)
आज्ञाचक्र के सम्बन्ध में शिवसंहिता में बड़े विस्तार से विचार किया
गया है । आज्ञाचक्र कमल के दोनों दलों पर हं, क्षं बीजाक्षर अंकित हैं । ये
दोनों दल श्वेत रंग के हैं । यहाँ के महाकाल सिद्ध हैं और हाकिनी देवी अधि-
ष्ठात्री रूप में स्थित रहती हैं । इस आज्ञापद्म के मध्य में शरद् के चन्द्रमा की
आभा के सदृश चन्द्रबीज ('ठ' बीज) स्थित रहता है, इसे जान लेने पर परमहंस
पुरुष को किसी प्रकार का अवसाद नहीं रहता है ।
आज्ञापद्मं भ्रुवोर्मध्ये हक्षोपेतं द्विपत्रकम् ।
शुक्लाभं तन्महाकालः सिद्धो देव्यत्र हाकिनी ॥
शरच्चन्द्रनिभं तत्राक्षरबीजं विजृम्भितम् ।
पुमान् परमहंसोऽयं यज्ज्ञात्वा नावसीदति ॥
( शिवसंहिता ५ । १२२-१२३ )
इस आज्ञा-चक्र में तुरीय तृतीय लिंग के रूप में मुक्तिदायक शिव विराजमान
हैं । इस लिंग का ध्यान करने से योगी शिवस्वरूप हो जाता है । शरीर की इडा-
पिंगला नाड़ियाँ वरणा और असी कही जाती हैं, इन्हीं वरणा-असी ( वाराणसी )
के मध्य में विश्वनाथ अभिव्यक्त हैं । इस वाराणसी को परमतत्व माना गया है ।
मेरु दण्ड के सहारे सुषुम्ना नाडी ब्रह्मारन्ध्र तक गयी है । इडा नाड़ी सुषुम्ना के परा-
वृत होती हुई आज्ञाचक्र के दक्षिण भाग से होकर बायें नासापुट को जाती है,
इसलिये गंगा कही गयी है । इडा नाड़ी के समान पिंगला नाड़ी आज्ञा-चक्र के
वाम भाग से चलकर दाहिने नासांपुट को जाती है, इसलिये इसको असी कहा
गया है । महेश्वर इस आज्ञाचक्र के देवता हैं, इस चक्र के ऊपर तीन पीठ हैं,
जिन्हें नाद, बिन्दु और शक्ति कहा जाता है । इस आज्ञापद्म का ध्यान करने वाले
साधक के पहले जन्म में किये गये कर्म के फल नष्ट हो जाते हैं । इस आज्ञाचक्र
में जिस साधक का मन क्षणमात्र के लिये भी स्थिर हो जाता है, उसके सभी पाप
उसी क्षण में नष्ट हो जाते हैं । वासना का महाबन्धन समाप्त हो जाता है । जो
योगी मृत्यु के समय इस आज्ञाचक्र का ध्यान करता है, वह परमात्मस्वरूप हो जाता
है । इस कमल का ध्यान करने वाला साधक राजयोग का अधिकारी होता है ।
४४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
राजयोगाधिकारोस्याद्देतच्चिन्तंनततो ध्रुवम् ।
यागो बन्धाद् विनिर्मुक्तः स्वीयया प्रभयास्वयम् ॥
( शिवसंहिता ५ । १४८ )
इस आज्ञाचक्र को तीसरा नेत्र, त्रिकुटी, त्रिवेणी, शिवनेत्र, गुरुचक्र आदि
भी कहा जाता है । इस चक्र का रंग हल्का भूरा भी कहा गया है । दलों पर
हं, क्षं अक्षर प्राणशक्ति के ऋणात्मक तथा धनात्मक प्रवाह के प्रतिनिधि हैं ।
पद्म के मध्य में ॐ बीज मन्त्र है । सामान्यतः ध्यान तो भ्रूमध्य में किया जाता
है, पर चक्र का स्थान मस्तिष्क में है । शरीर के वाम भाग से इड़ा, दक्षिण भाग
से पिंगला तथा मेरुदण्ड के माध्यम से ऊर्ध्व भाग से सुषुम्ना आकर मिलती है,
इसी से इसका नाम त्रिवेणी भी है । इस स्थान पर ३००० श्वास के आने के
समय ( ३ घंटे २० मिनट ) तक ध्यान केन्द्रित करने पर वृत्तियाँ अन्तर्मुखी
होती हैं । मन की चंचलता मिट जाती है । नेत्रों के प्रकाश में बाहर-भीतर के
अंग प्रकाशित हो उठते हैं । अन्तः प्रदेश की रचना का ज्ञान सुलभ होता है ।
आत्मसाक्षात्कार होता है ।
ब्रह्मरन्ध्रमुखे तासां सङ्गमः स्यादसंशयः ।
तस्मिन्स्नानेस्नातकानां मुक्तिः स्यादविरोधतः ॥
गङ्गायमुनयोर्मध्ये वहत्येषा सरस्वती ।
तासान्तु सङ्गमे स्नात्वा धन्यो याति परां गतिम् ॥
( शिवसंहिता ५ १६३-१६४ )
इस त्रिवेणी में ध्यान करनेवाला ( स्नान करने वाला ) साधक परमगति
को प्राप्त करता है । महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि इस आज्ञाचक्र में
सुषुम्ना अंगुष्ठमात्र दीपशिखाकार हो जाती है । योगसाधक का इस चक्र में
ध्यान करने से सम्पूर्ण अस्तित्व सत्य की अभिव्यक्ति करता है और वह सहज गति
से सत्य भाषण ही किया करता है, वाक्सिद्ध हो जाता है ।
अष्टमं ब्रह्मरन्ध्रं निर्वाणचक्रं सूचिकाग्रभेद्यं धूमशिखाकारं
ध्यायेत् तत्र जालन्धरपीठं मोक्षप्रदं भवति । ८ ॥
आठवाँ निर्वाणचक्र है । ( इसमें ध्यान करने से ब्रह्म अभिव्यक्त होता है,
जिसका फल है मोक्ष) इसका नाम ब्रह्मरन्ध्र भी है । यह सूई के अग्रभाग के
सिद्धसिद्धान्तपद्धति । [ ४५