सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनादि पिण्ड के पाँच तत्व और पचीस गुण
अपरम्परं परमपदं शून्यं निरञ्जन परमात्मेति ॥ १७ ॥
इन पाँच शक्तियों के ( शक्तिचक्र-क्रम से ) प्रकट पाँच अधिष्ठाता देव
अपरम्पर सदाशिव—निजा शक्ति के अधिष्ठाता ), परमपद (परमेश्वर—परा शक्ति
के अधिष्ठाता ), शून्य ( रुद्र—अपरा शक्ति के अधिष्ठाता), निरंजन ( विष्णु,
रागद्वेषादिरहित, ज्ञानशक्तिविशिष्ट सूक्ष्मशक्ति के अधिष्ठाता ) और परमात्मा
(ब्रह्मा—कुण्डलिनी शक्ति के साक्षी जगत् के स्रष्टा) हैं ॥ १७ ॥
अपरम्परात् स्फुरतामात्रमुत्पन्नं परमपदाद् भावनामात्र-
मुत्पन्नं शून्यात्स्वसत्तामात्रमुत्पन्नं निरञ्जनात् स्वसाक्षात्कार-
मात्रमुत्पन्नं परमात्मनः परमात्मोत्पन्नः ॥ १८ ॥
अपरम्पर ( सदाशिव ) से स्फुरता .( उत्साह ), परमपद ( परमेश्वर )
से भावना ( समालोचनात्मक—क्रियासामान्य ज्ञान ), शून्य ( रुद्र ) से
स्वसत्तामात्र, निरञ्जन ( विष्णु ) से स्वसाक्षात्कारमात्र ( अहंकार ) और
परमात्मा ( ब्रह्मा ) से सृष्टि के उत्पादन के लिये उपयोगी ( बीजरूप )
समष्टिपिण्ड उत्पन्न हैं । यह समष्टिपिण्ड अस्मदादि व्यष्टिपिण्डों की अपेक्षा
उत्कृष्ट है, इसलिये यह परमात्मा कहा गया है ॥ १८ ॥
अकलंकत्वमनुपमत्वमपारत्वममूर्तत्वमनुदयत्वमिति पञ्च-
गुणमपरम्परम् ॥ १६ ॥
अपरम्पर ( सदाशिव ) के पाँच गुण हैं । पहला गुण अकलंकत्व ( दोष-
शून्यता—रागद्वेषादि का अभाव ) है । दूसरा गुण अनुपमत्व ( सजातीयतारहित—
अद्वितीय सत्तामात्र ) है । तीसरा गुण अपारत्व असीमत्व ( अनन्तता ) है ।
चौथा गुण अमूर्तत्व ( परिच्छेदरहितता—अमापकत्व ) है—'न तस्य प्रतिमा
अस्ति' । ( श्वेताश्वतर ४ । १६ ) पाँचवां गुण अनुदयत्व ( प्रागभावशून्यता ) है,
क्योंकि वह उत्पत्ति से परे है, सर्वव्यापक, अकाल और सनातन—शाश्वत है ॥ १६ ॥
निष्कलत्वमणुतरत्वमचलत्वमसंख्यत्वमनाधारत्वमिति पञ्च-
गुणं परमपदम् ॥ २० ॥
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