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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

शरीर की नाड़ियों में प्राण के प्रवाह के प्रयासपूर्वक उसे स्थिर रखने की
क्रिया ही प्राणायाम है। रेचक, पूरक, कुम्भक और प्राण-अपान का मेलन—संघट-
करण प्राणायाम के चार भेद हैं। ये ही प्राणायाम के लक्षण हैं ॥ ३५ ॥
विशेष—गोरखनाथजी ने शरीर में जीवनी-शक्ति को अक्षुण्ण रखने के लिये
प्राणायाम पर विशेष बल दिया है। रेचक वायु को बाहर निकालना है, पूरक में
नासारन्ध्र से वायु को भीतर भरा जाता है और शरीर के
भीतर वायु को स्थिर रखने की क्रिया कुम्भक है, प्राणवायु और
अपानवायु का ऐक्य ही संघटकरण है। योगियों ने प्राणायाम को पाप को
जलाने वाला पावक कहा है और संसार-सागर का महासेतु बताया है। प्राणायाम
में ही योगी का मोक्षदायक धर्म प्रतिष्ठित है तथा उसके सभी दोष—विकार नष्ट
होते हैं।
प्राणायामे महान्धर्मो योगिनो मोक्षदायकः ।
प्राणायामे दिवारात्रौ दोषजालं परित्यजेत् ॥
( विवेकमार्तण्ड ११४ )
हठयोगप्रदीपिका में प्राणायाम की महत्ता और विधि पर यथेष्ट प्रकाश
डाला गया है। प्राणवायु के स्थिर होने पर ही चित्त निश्चल होता है। चित्त-
वृत्ति का निरोध होता है। षट्कर्म धौति, वस्ति, कपालभाति, नौलि, नेति,
त्राटक आदि क्रियाओं से शरीर का शोधन होने पर नाड़ियाँ मलरहित हो
जाती हैं।
षट्कर्मनिर्गतस्थौल्यंकफदोषमलादिकः ।
प्राणायामं ततः कुर्यादनायासेन सिद्धयति ॥
प्राणायामैरेव सर्वे प्रशुष्यन्ति मला इति ।
( हठयोगप्रदीपिका २। ३६-३७ )
अपान और प्राण के एक होने पर वायु की सुषुम्ना में ऊर्ध्वगति होती है,
यह केवल कुम्भक की सिद्धि से ही सम्भव है। रेचक और पूरक छूट जाते हैं
तथा प्राण की केवल कुम्भक से शरीर के भीतर स्थिरता स्थापित हो जाती है।
अपान-प्राण के संघटकरण पर गीता में उल्लेख है कि अनेक ( दूसरे ) योगी
अपानवायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, अन्य प्राणवायु में अपान-वायु को हवन
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ७७

करते हैं, अन्य नियमित आहार करनेवाले प्राणायामपरायण पुरुष प्राण और अपान
की गति रोक कर प्राणों को प्राणों में ही हवन करते हैं । ये सभी यज्ञों द्वारा
पापों का नाश करनेवाले और यज्ञों को जानने वाले हैं ।
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणोऽपानं तथापरे ।
प्राणापानगतीरुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ।
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥
( गीता ४ । २९-३० )
महर्षि पतञ्जलि ने आसन की अभ्यास-सिद्धि के बाद श्वास-प्रश्वास के गति-
विच्छेद को प्राणायाम कहा है । गति-विच्छेद का आशय है गति का रुक जाना,
गति-विच्छेद ही प्राण की स्थिरता है, जिसका संकेत महायोगी गोरखनाथजी ने
किया है ।
तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥
( योगदर्शन २.४९)
पतञ्जलि ने भी गोरखनाथजी की ही तरह प्राणायाम के चार भेद
स्वीकार किये हैं, वे बाह्य ( रेचक ), आभ्यन्तर ( पूरक ) और स्तम्भ
(कुम्भक) की वृत्ति वाले हैं और बाह्य-आभ्यन्तर विषय-वृत्ति का त्याग ही चौथा
( संघटकरण ) प्राणायाम है ।
बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिः । .......... बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी
चतुर्थः ।
( योगदर्शन २।५०-५१)
प्राणवायु को नासारन्ध्रों से यथानुक्रम बाहर निकालना और देखना कि कहाँ
कितने समय तक वह स्थिर है, रेचक है । प्राणवायु नासारन्ध्रों से यथानुक्रम
भरना पूरक है और शरीर के भीतर प्राण के जाने और बाहर निकल ने की गति
का अभ्यास न कर, वह जहाँ हो, उसकी गति को स्तम्भित कर देना कुम्भक है ।
बाहर और भीतर जाने-आने वाले प्राण की गति का त्याग कर देने से मन को
इष्ट-चिन्तन में लगा देना और देश-काल-संख्या के ज्ञान के बिना प्राण की गति का
(जिस किसी देश में-सुषुम्ना में) ठहरना चौथा प्राणायाम है । यह राजयोग का
७८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

३. चतुर्थ उपदेश: पिण्डाधार विचार (नव चक्र, षोडश आधार, त्रिलक्ष्य व पञ्चव्योम)

प्राणायाम है। यही प्राण-अपान अथवा अपान-प्राण का पारस्परिक हवन अथवा .
यज्ञकर्म है। यही संघटककरण प्राण-अपान का मेलन है । महायोगी गोरखनाथ
जी ने कहा है कि अपान-वायु के निरोध से देह में स्थित प्राणवायु का उसमें
एकश्वासमय होकर ऊर्ध्वगामी होना प्राणापान के मेलन अथवा ऐक्य का
स्वारस्य है ।
प्राणो देहे स्थितो वायुरपानस्य निरोधनात् ।
एकश्वासमयो भूत्वोद्घाटयेद् गगने गतिम् ॥
( विवेकमार्तण्ड १०४)
महर्षि घेरण्ड का कथन है कि प्राणायाम के साधन से आकाशगमन,
रोगनिवृत्ति तथा कुण्डलिनी का जागरण होता है । चित्त में आनन्द उत्पन्न होता
है और प्राणायाम का अभ्यास करने वाला सुखी होता है । प्राणायाम से उन्मनी
सिद्ध होती है ।
प्राणायामात् खेचरत्वं प्राणायामाद् रोगनाशनम् ।
प्राणायामाद् बोधयेच्छक्तिं प्राणायामान्मनोन्मनी ।
आनन्दो जायते चित्ते प्राणायामी सुखी भवेत् ॥
( घेरण्ड-संहिता ५।५६ )
प्राणायाम के अभ्यास से ही अजपा गायत्री सिद्ध होती है, साधक आकाश-
चक्र में शिव का साक्षात्कार करता है ।
प्रत्याहारमिति चैतन्यतुरङ्गाणां प्रत्याहरणं विकारग्रसन
उत्पन्नविकारस्यापि निवृत्तिर्निभातीति प्रत्याहार लक्षणम् ।।३६।।
प्रत्याहार का वर्णन किया जाता है । चैतन्य आत्मा के इन्द्रियरूपी घोड़ों
के ( उनके शब्द, रूप, रस, स्पर्श, गन्धादि में) प्रत्याहरण से उनके विकारग्रस्त
होने से उत्पन्न विकारों की समाप्ति हो जाती है—यही प्रत्याहार का
लक्षण है ।। ३६ ।।
विशेष--प्रत्याहार के सम्बन्ध में हमारे औपनिषद वाङ्मय तथा योग-
शास्त्रों में विशद विवेचन उपलब्ध होता है। महायोगी गोरखनाथ ने इन्द्रियों को
तुरंग माना हैं, इसी तरह उपनिषदों मैं इन्द्रियों को तुरंग (घोड़ों) के रूप में
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ७९

परिलक्षित किया गया है । यम ने नचिकेता को समझाया है कि शरीर में
जीवात्मा रथ का स्वामी (रथी) है, शरीर ही रथ है, बुद्धि इस रथ का सारथी
है, मन लगाम है, ज्ञानियों ने इन्द्रियों को घोड़े कहा है, विषय उन घोड़ों के
विचरने का मार्ग है, शरीर, इन्द्रिय और मन के साथ चैतन्य जीवात्मा रहता है ।
जो सदा विवेकहीन बुद्धिवाला और चंचल मन से रहता है, उसकी इन्द्रियाँ
असावधान सारथी के दुष्ट घोड़ों की भाँति वश में न रहनेवाली हो जाती हैं ।
जो सदा विवेकयुक्त बुद्धि तथा वश में किये हुए स्थिर मन से सम्पन्न है, उसकी
इन्द्रियाँ सावधान सारथी के अच्छे घोड़ों की तरह वश में रहती हैं ।
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गाचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥
यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥
( कठोपनिषद् १।३।३-६)
गोरखनाथजी ने इन्हीं घोड़े के समान इन्द्रियों को विषयों से प्रत्याहारित
कर आत्ममुखी करने पर बल दिया है । श्रीगीता में भी कहा गया है कि
जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषय से निगृहीत हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है ।
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
(गीता २।६८)
इन्द्रियों को उनके विषयों से मोड़कर आत्मचिन्तन में मन के साथ जोड़
देना प्रत्याहार की सिद्धि है । इन्द्रियों का राजा मन है । इसी लिये मन को
प्रत्याहारित करने पर भी गोरखनाथजी ने बल दिया है । सावधानी की बात
यही है कि इसे पीठ की ओर (अ-पूठौ), पीछे जहाँ से इसकी चंचलता आरम्भ
होती है, वापस ले जाना चाहिये, मकड़ी के तार की तरह वापस ले जाना
चाहिये । जिस तरह मकड़ी तार (जाल) से बाहर निकलने पर उसी में वापस
८० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

जाने में सुरक्षा समझती है, इसी तरह मन का धर्म स्थैर्य्य है, स्थिरता ही
उसकी सुरक्षा है। यह इन्द्रियरूपी घोड़ों के लिये प्रग्रह--लगाम है।
मन मकड़ी का ताग ज्यूं उलटि अनूठी आंणि ।
( गोरखवानी सबदी २३४ )
प्रत्याहार इन्द्रियविजय का महान् साधन है । अपने विषयों के सम्बन्ध से
रहित होने पर इन्द्रियों का चित्त के स्वरूप में तदाकार हो जाना ही प्रत्याहार है ।
प्रत्याहार सिद्ध हो जाने पर योगसाधक की इन्द्रियाँ उसके वश में हो जाती हैं ।
स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ।
ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ।
( पातञ्जलयोगदर्शन २ । ५४-५५ )
इन्द्रियों की वश्यता, प्राण और मन की स्थिरता पर निर्भर है । हठयोग
की साधना में स्पष्ट निर्देश है कि शरीर में प्राण की स्थिरता से ही मन
स्थिर होता है, इसलिये प्राणसाधना इन्द्रियों के प्रत्याहार की दिशा में आवश्यक
है । प्रत्याहार की सिद्धि से काम, क्रोध, मद, मत्सर, लोभ, मोह आदि छः शत्रुओं
का नाश हो जाता है। जहाँ-जहाँ मन जाता है, उसे वहाँ-वहाँ से लौटा कर
आत्मा के वश में करना चाहिये, यही प्रत्याहार है । महर्षि घेरण्ड की दृष्टि में :
यतो यतो मनश्चरति चाञ्चल्यवशतः सदा ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥
( घेरण्डसंहिता ४ । २ )
रेचक-पूरक-कुम्भक, लयक्रमपूर्वक बारह बार प्राणायाम कर वायु को शरीर
के भीतर स्थिर करने से मन स्थिर होता है और प्राणायाम के द्वारा इस तरह
इन्द्रियों का प्रत्याहार हो जाता है ।
प्राणायामद्विष्ट्केन प्रत्याहारः प्रकीर्तितः ।
( विवेकमार्तण्ड ११७ )
—शिवसंहिता में प्रत्याहार के स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है कि जब योग-
साधक एक प्रहर तक वायु-धारण की शक्ति प्राप्त करता है, तब प्रत्याहार होता
है । योगसाधक को जिस-जिस पदार्थ की जानकारी हो, उसमें उसे आत्मभाव
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ८१

करना चाहिये । जिस इन्द्रिय के द्वारा जिस विषय का बोध होता हो, उसी में
आत्मभाव करने से इन्द्रियजय होना ही प्रत्याहार है ।
यं यं जानाति योगीन्द्रस्तं तमात्मेति भावयेत् ।
यैरिन्द्रियैर्यद्विधानस्तदिन्द्रियजयो भवेत् ॥
( शिवसंहिता ३ । ६८ )
प्रत्याहार की सिद्धि ही धारणा, ध्यान और समाधि में आत्मसाक्षात्कार
अथवा परमात्म पद में स्वरूपावस्थान का सोपान है ।
धारणेति सा बाह्याभ्यन्तर एकमेवनिBS... wait: एकमेवनिBS
Wait, exact characters in L8: धारणेति सा बाह्याभ्यन्तर एकमेवनिBS... no, एकमेवनिजतत्वस्वरूपमेवान्तः
धारणेति सा बाह्याभ्यन्तर एकमेवनिजतत्वस्वरूपमेवान्तः
करणेन साधयेद् यथा यद्यदुत्पद्यते तत्तन्निराकारे धारयेत्
स्वात्मानं निर्वातदीपमिव संधारयेदिति धारणा-
लक्षणम् ॥ ३७ ॥
( धारणा अष्टांगयोग का छठा अंग है, इसका निरूपण किया जाता है । )
शरीर से बाहर-भीतर एक ही निज तत्त्वस्वरूप ( आत्मा ) व्याप्त है, अन्तःकरण
से इस तरह की भावना ही धारणा है । जो-जो भौतिक प्रपञ्च उत्पन्न होता है,
उसकी निराकार आत्मा रूप में धारणा करनी चाहिये और वायुरहित दीपक
के निश्चल प्रकाश के समान ( प्रपञ्चातीत ) आत्मचैतन्य का ही चिन्तन करना
चाहिये । यही धारणा का लक्षण है ॥ ३७ ॥
विशेष—धारणा, ध्यान और समाधि—अष्टांगयोग के तीन अंग स्वरूपा-
वस्थान के यथाक्रम परस्पर सम्बद्ध-अन्योन्‍याश्रित सोपान हैं, पर इनमें से किसी
एक के भी आश्रय से स्वरूप-प्राप्ति होती है —ऐसा भी कहा जा सकता है ।
पांच तत्व--पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश की धारणा के सम्बन्ध में
हठयोगशास्त्रों में विशद विवेचन किया गया है । पृथ्वी तत्व की धारणा का
वर्णन है कि जिस साधक को भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश की धारणा हो
जाती है, उसका चित्त निश्चल हो जाता है ।
या पृथ्वी हरितालहेमरुचिरा तत्त्वं लकारान्वितं
संयुक्ता कमलासनेन हि चतुष्कोणा हृदिस्थायिनी ।
प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये
८२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

देषा स्तम्भकरी सदा क्षितिजयं कुर्याद् भुवो धारणा ।
अर्धेन्दुप्रतिमं च कुन्दधवलं कण्ठेऽम्बुतत्त्वं स्थितं
तत्पीयूषवकारबीजसहितं युक्तं सदा विष्णुना ।
प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये-
देषा दुःसहकालकूटजरणी स्यादम्बवी धारणा ॥
यत्तालुस्थितमिन्द्रगोपसदृशं तत्त्वं त्रिकोणांज्वल-
तेजोरेफयुक्तं प्रवालरुचिरं रुद्रेण यत्सङ्गतम् ।
प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये-
देषा वह्निजयं सदा विदधती वैश्वानरी धारणा ॥
यद्भिन्नाञ्जनपुञ्जसन्निभमिदं वृत्तं भ्रुवोरन्तरे
तत्त्वं वायुमयंयकारसहितं तत्रेश्वरो देवता ।
प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये-
देषा खेगमनं करोति यमिनां वै वायवी धारणा ।
आकाशं सुविशुद्धवारिसदृशं यद् ब्रह्मरन्ध्रे स्थितं
तन्नाथेन सदाशिवेन सहितं शान्तं हकाराक्षरम् ।
प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये-
देषा मोक्षकपाटपाटनपटुः प्रोक्ता नभोधारणा ।
( विवेकमार्तण्ड १५८-१६२ )
यह हरिताल स्वर्ण के समान रुचिर है, यह 'ल' कार बीज से युक्त है,
इसके अधिष्ठातृ देवता ब्रह्मा हैं, यह चौकोर है, हृदय में स्थित है, मनसहित प्राण
को इसमें लीन कर लेना ही पृथ्वीतत्व की धारणा है, इसका पांच घड़ी
( दो घंटे ) तक अभ्यास करना चाहिये, इसके प्रभाव से पृथ्वीतत्व वश में हो जाता
है। ( इस धारणा के प्रभाव से साधक मृत्यु को वश में कर लेता है।)
जलतत्व अर्धचन्द्राकार कुन्द पुष्प के समान श्वेत है, यह कण्ठ में अमृतरूप वकार
बीजयुक्त के समान स्थित है, विष्णु इसके अधिष्ठातृ देवता हैं, इस जलतत्व की
प्राण और मन का विलय कर पाँच घड़ी तक धारणा करनी चाहिये, इससे दुःसह
कालकूट विष भी भस्म हो जाता है, यह वारुणी धारणा है। इस धारणा से न
तो जल का भय रहता है और न जल से मृत्यु होती है। अग्नितत्व तालु में
स्थित है, यह इन्द्रगोप के समान लाल, मूँगे के समान रुचिर है, यह त्रिकोण है,
तेजःस्वरूप 'र' बीज से युक्त है। इसके अधिष्ठातृ देवता रुद्र हैं, चित्त को प्राण
में लीन कर इस तत्व की पाँच घड़ी तक धारणा करनी चाहिये, इससे अग्नितत्व
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ८३

वश में हो जाता है, यह वैश्वानरी धारणा है। वायुतत्व सुरमा के रंग का है,
यह भ्रू में स्थित है, इसके अधिष्ठातृ देवता ईश्वर हैं, इसका बीज 'य' है। मन-
प्राणसहित वायुतत्व की धारणा करनी चाहिये, पाँच घड़ी तक की धारणा से
साधक को आकाश-गमन की शक्ति प्राप्त हो जाती है। यह वायवी धारणा है।
आकाशतत्व स्वच्छ जल के समान निर्मल है, इसका बीज 'ह' कार है, इसके
अधिष्ठात देवता नाथस्वरूप सदाशिव हैं, यह तत्व ब्रह्मरन्ध्र में स्थित है, मन और
प्राण को लय कर पाँच घड़ी तक साधक को आकाशतत्व की धारणा करनी चाहिये,
यह नभोधरणा है, इसके अभ्यास के फलस्वरूप मोक्ष का बन्द दरवाजा खुल जाता
है। गोरखनाथजी की सबदी ( गो० बा० सबदी १६८) है कि—आकास
तत सदासिव जांण ) । इन पाँच महाभूतों की धारणा से मोक्ष की प्राप्ति
होती है।
महर्षि पतञ्जलि का कथन है कि शरीर के बाहर या भीतर—कहीं एक
विशेष देश ( स्थान ) में चित्त को ठहराना ही धारणा है।
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा।
( योगदर्शन ३ । १ )
जहाँ चित्त को लगाया जाता है, उसी ध्येय में चित्त की एकाग्रता ध्यान
है और जब ध्यान में केवल ध्येय मात्र की ही प्रतीति होती है और चित्त का
निज स्वरूप शून्य-सा अथवा तदाकार हो जाता है, तब वही समाधि है। इन
तीनों धारणा, ध्यान और समाधि को महर्षि पतञ्जलि ने संयम कहा है। ये
तीनों अन्तरंग साधन हैं। पञ्च भूततत्व की वश्यता के सम्बन्ध में योगदर्शन में
कहा गया है :
स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद् भूतजयः ।
( योगदर्शन ३ । ४४ )
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश पाँच भूत हैं। इनमें प्रत्येक की पाँच
अवस्था होती है। पहली स्थूलावस्था है। इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष अनुभव में आने
वाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इनकी स्थूलावस्था है। दूसरी स्वरूपावस्था
है। पृथ्वी की मूर्ति, जल का गीलापन, अग्नि की उष्णता और प्रकाश, वायु की
गति और कम्पन, आकाश का अवकाश स्वरूपावस्था है। तीसरी सूक्ष्मावस्था है।
कारण-अवस्था या तन्मात्रा ही सूक्ष्मावस्था है। पृथ्वी की गन्ध तन्मात्रा, जल
८४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

की रसतन्मात्रा, अग्नि की रूपतन्मात्रा, वायु की स्पर्श तन्मात्रा और आकाश की
शब्दतन्मात्रा ही सूक्ष्मावस्था है । चौथी अन्वय-अवस्था है । पाँचों भूतों में तीनों
गुणों के स्वभाव ( प्रकाश, क्रिया और स्थिति ) की व्याप्ति ही अन्वय-अवस्था
है । पाँचवीं अर्थवत्व-अवस्था का तात्पर्य है कि पाँचों भूत पुरुष के भोग और
अपवर्ग के लिये हैं । इन भूतों की प्रत्येक अवस्था के क्रम से सम्पूर्ण अवस्थाओं में
संयम कर जब योगसाधक इन को प्रत्यक्ष कर लेता है, तब उसका इन भूतों पर-
तत्वों पर अधिकार हो जाता है ।
अथ ध्यानमिति कश्चन परमाद्वैतस्य भावः स एवात्मेति
यथा यद्यत्स्फुरति तत्तत्स्वरूपमेवेति भावयेत् सर्वभूतेषु
समदृष्टिश्च इति ध्यानलक्षणम् ॥ ३८ ॥
( अष्टांगयोग के सातवें अंग ) ध्यान का वर्णन किया जाता है । ( नाम-
रूप से परे ) अद्वैतस्वरूप परमात्मा है, यही आत्मा है । जो-जो वस्तु प्रतीत हो,
उस में आत्मस्वरूप की ही भावना करनी चाहिये, समस्त भूतमात्र में समदृष्टि-
आत्मदृष्टि अथवा आत्मस्वरूप की ( सभी प्राणियों में एकमात्र परमात्मा की
व्याप्ति की ) भावना ही ध्यान है । यही ध्यान का लक्षण है ॥ ३८ ॥
विशेष-महायोगी गोरखनाथजी ने अष्टांगयोग के सातवें अंग ध्यान की
सार्थकता के लिये निराकार आत्मस्वरूप में तथा सम्पूर्ण चैतन्य-परमात्मा की
अभिव्यक्ति में समदृष्टि को बड़ा महत्व दिया है । अपनी एक संक्षिप्त रचना
में उन्होंने कहा है कि एकमात्र ध्येय-ध्यान का विषय निरञ्जन है, निरञ्जन
के उपरान्त ध्यान के लिये रह ही क्या जाता है :
निरंजन उपरांति ध्यान नाहीं ।
( गोरखबानी-सिष्टपुराण )
गोरखनाथजी का कथन है कि ध्यान दर्शन है, चैतन्य तत्व का सर्वत्र
अनुभव ही दर्शन अथवा ध्यान है । साधक आज्ञाचक्र में स्थित दोनों भ्रू के मध्य
में प्रदीप्त ज्ञानदीप्ति- -ज्ञाननेत्र अथवा शिवनेत्र की ज्योति से समृद्ध होकर
दर्शन की सीमा में-ध्यान की दशा में अलखनिरञ्जन--परमेश्वर शिव में
प्रतिष्ठित हो जाता है ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ८५

दरसण माहीं आपै आप ॥
( गोरखवानी सबदी २७२ )
महर्षि पतञ्जलि की दृष्टि में जिस ध्येय वस्तु में चित्त लगाया जाय, उसी
में उसका एकाग्र हो जाना, ध्येय मात्र की एक ही तरह की वृत्ति का प्रवाह
चलना, किसी दूसरी वृत्ति का बीच में न उठना ध्यान है।
'तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ।'
( योगदर्शन ३ । २ )
ध्यान का विशिष्ट उपक्रम आत्मा में चित्तवृत्ति का लय होना है। सहस्रार
कमल का ज्ञान प्राप्त होने पर साधक की चित्तवृत्ति लय को प्राप्त हो जाती है।
योगी की चित्तवृत्ति जब लय को प्राप्त होती है, तब अखण्ड ज्ञानस्वरूप निरंजन
आत्मा का प्रकाश होता है। ब्रह्माण्ड में अपने ( आत्मचैतन्य ) प्रतीक का ध्यान
करना चाहिये, जब ध्यान में चित्त स्थिरता को प्राप्त हो जाय, तब उसमें महत्
शून्य का चिन्तन करना चाहिये। आदि, मध्य और अन्तरूप शून्य में करोड़ों सूर्यं
के समान प्रभावाले और करोड़ों चन्द्रमा के समान शीतल प्रकाशवाले शून्य
रूप आत्मा के दर्शन ( ध्यान ) का अभ्यास करने वाले साधक को सिद्धि प्राप्त
होती है।
चित्तवृत्तिर्यदा लीना तस्मिन् योगी भवेद् ध्रुवम् ।
तदा विज्ञायतेऽखण्डज्ञानरूपी निरञ्जनः ॥
ब्रह्माण्डबाह्ये संचिन्त्य स्वप्रतीकं यथोदितम् ।
तमावेश्य महच्छून्यं चिन्तयेदविरोधतः ॥
आद्यन्तमध्यशून्यं तत्कोटिसूर्यसमप्रभम् ।
चन्द्रकोटिप्रतीकाशमभ्यस्य सिद्धिमाप्नुयात् ।
( शिवसंहिता ५ । १६५-१६७ )
इस प्रकार का ध्यान बड़ा उपयोगी होता है और साधक का मन अथवा
चित्त जब वृत्तिहीन हो जाता है, तब वह पूर्ण ज्ञान से युक्त होकर आत्मस्वरूप
में स्थित होता है।
वृत्तिहीनं मनः कृत्वा पूर्णारूपं स्वयं भवेत् ॥
( शिवसंहिता ५ । २०६ )
८६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

महर्षि घेरण्ड ने ध्यान के तीन भेद बताये हैं। पहला स्थूल ध्यान है, दूसरा
ज्योतिर्ध्यान है और तीसरा सूक्ष्मध्यान है। जिस ध्यान में मूर्ति, इष्टदेव अथवा
गुरु का चिन्तन हो, वह स्थूल ध्यान है, जिसमें तेजोमय ब्रह्म या शक्ति की भावना
हो वह ज्योतिर्ध्यान है, जिसमें विन्दुमयं ब्रह्मकुण्डलिनी का ध्यान हो, वह सूक्ष्म
ध्यान है।
स्थूलं ज्योतिस्तथा सूक्ष्मं ध्यानस्य त्रिविधं विदुः।
स्थूलं मूर्तिमयं प्रोक्तं ज्योतिस्तेजोमयं तथा।
सूक्ष्मं विन्दुमयं ब्रह्मकुण्डली परदेवता ॥
(घेरण्डसंहिता ६।१)
भ्रूमध्य में और मन के ऊर्ध्व भाग में ॐकारमय शिखामालायुक्त ज्योति
का ध्यान ही ज्योतिर्ध्यान अथवा तेजो ध्यान है। शाम्भवी मुद्रा के अभ्यास द्वारा
कुण्डलिनी महाशक्ति का ध्यान सूक्ष्म ध्यान है।
महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि योगी के हृदय में विद्यमान आत्मवस्तु
का निश्चल चिन्तन ही ध्यान है। सगुण ध्यान, निर्गुण ध्यान के रूप में ध्यान
के दो प्रकार हैं।
सर्वं चिन्तासमावर्ति योगिनो हृदि वर्तते।
या तत्वे निश्चला चिन्ता तद्धि ध्यानं प्रचक्षते ॥
द्विधा भवति तद्ध्यानं सगुणं निर्गुणं तथा।
सगुणं वर्णभेदेन निर्गुणं केवलं विदुः॥
(विवेकमार्तण्ड १६५-१६६)
गुणमात्रोपलक्षित वर्णपद सगुण ध्यान का विषय है। शुद्धचैतन्यविषयक
ध्यान निर्गुणं ध्यान है। निर्गुणं ध्यान का फल समाधि है।
निर्गुणध्यानयुक्तस्य समाधिश्च ततो भवेत्।
(योगतत्त्वोपनिषद्)
ध्यानयोग के द्वारा साधक आत्मसाक्षात्कार में समर्थ होता है। साधक को
भावना करनी चाहिये कि—
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ८७

निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् ।
अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥
( श्वेताश्वतर० ६ । १९ )
मैं कलाओं से रहित, क्रियारहित, शान्त, निर्विकार, निरञ्जन, अमृत के
परमसेतु, जले इन्धन से युक्त अग्नि की भाँति ज्योतिःस्वरूप परमात्मा का चिन्तन
करता हूँ । यही योगसाधक के लिये निराकार आत्मस्वरूप के ध्यान का गोरखनाथ
जी द्वारा भी निर्दिष्ट क्रम है ।
अथ समाधिलक्षणं सर्वतत्त्वानां समावस्था निरुद्यमत्व
मनायासस्थितिमत्त्वमिति समाधिलक्षणम् । इत्यष्टाङ्गयोग-
लक्षणम् ॥ ३६ ॥
समाधि के लक्षण का निरूपण किया जाता है । समस्त तत्त्वों की समावस्था-
गत अनायास, स्वाभाविक ( सहज ) स्थिति ही समाधि का लक्षण है । ( इस
वर्णन में समाधिसिद्धि राजयोग परिलक्षित है । ) इस तरह अष्टांगयोग के लक्षण
का निरूपण-वर्णन किया गया ॥ ३६ ॥
विशेष—समस्त तत्त्वों की समावस्था का आशय है तत्त्वों की अभेदरूपता—
आत्मस्वरूप में विद्यमानता । इस समावस्था में सहज प्रतिष्ठा ही समाधि
( राजयोग ) की सिद्धि है । यही उन्मनी अथवा सहजावस्था है । समाधि के
दो रूप हैं—पहला सविकल्प ( सबीज अथवा सम्प्रज्ञात ) समाधि है; दूसरा
निर्विकल्प ( निर्बीज अथवा असम्प्रज्ञात ) समाधि है । जब तक ध्याता, ध्येय
और ध्यान—इन तीनों का साधक को प्रतिभास होता है, तब तक सम्प्रज्ञात
समाधि है और ध्याता और ध्यान ध्येय में समाहित--आकारित हो जाते हैं, तब
निर्विकल्प समाधि की अवस्था समझनी चाहिये । इस समाधि की सिद्धि होने
पर योगी को बिना परिश्रम के ही सहज रूप से जाग्रत् अवस्था में भी समाधि
लगी रहती है, सर्वत्र उसकी चित्तवृत्ति आत्माकारित हो उठती है, । उन्मनी
समाधि के परे की अवस्था शून्य है, योगसिद्ध पुरुष को स्वरूप में स्थिति का फल
शून्य समाधि है । शून्य समाधि में परिचय (आत्मस्वरूप ज्ञान अथवा स्वरूपवोध)
से अटल पद—शाश्वत सनातन पद में स्थैर्य्य की प्राप्ति होती है ।
८८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

सुंनि कै परचै भयः सथोर । निश्चल जोगी गहर गंभीर ॥
( गोरखबानी सबदी २३१ )
महर्षि पतञ्जलि ने समाधि के स्वरूप का वर्णन किया है कि जब ध्यान में
केवल ध्येय मात्र की ही प्रतीति होती है और चित्त का निजस्वरूप शून्य-सा हो
जाता है, तब यह ध्यान ही समाधि हो जाता है ।
तदेवार्थ. [त्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ।
( योगदर्शन ३।३ )
महाराजा भोज ने योगदर्शन के उपर्युक्त सूत्र के भाष्य में समाधि का लक्षण
बताया है कि जिसमें मन विक्षेपों को हटाकर यथार्थता से धारण किया जाता
है--एकाग्र किया जाता है, वही समाधि है ।
'सम्यगाधीयत एकाग्रो [क्रियते, विक्षेपान्परिहृत्य मनो यत्र स
समाधिः ।'
( भोजवृत्ति ३।३ )
समाधि में ब्रह्म अपने साकार रूप में-ध्येय रूप में प्रतिभासित होता है
और निराकार रूप में ( निर्बीज समाधि में ) ज्योतिस्वरूप अभिव्यक्त अथवा
प्रकाशित होता है। यह ब्रह्मपद मन-वचनसापेक्ष नहीं है, साधन की सिद्धि से
अमल ज्ञानरूप में स्वयं स्फुरित ( प्रकाशित ) होता है ।
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।
साधनादमलं ज्ञानं स्वयं स्फुरति तद् ध्रुवम् ॥
( शिवसंहिता ५। २१६ )
महर्षि घेरण्ड का कथन है कि कुम्भक की सिद्धि के द्वारा मन को आत्मा
के स्वरूपभूत करना चाहिये, इस तरह परमात्मा के योग से समाधि राजयोग-
समाधि है ।
परात्मनः समायोगात् समाधिं समवाप्नुयात् ॥
( घेरण्डसंहिता ७। १६ )
हठयोगप्रदीपिका में उल्लेख है कि योगी जाग्रत्, सुषुप्ति आदि सभी अवस्थाओं
से रहित और समस्त चिन्ताओं से परे होकर शव के समान शरीर धारण करता
है, ब्रह्मारन्ध्र में प्राण लीन कर लेता है, वह निस्सन्देह मुक्त है ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ८६

सर्वावस्थाविनिर्मुक्तः सर्वचिन्ताविवर्जितः ।
मृतवत् तिष्ठते योगी स मुक्तो नात्र संशयः ॥
( हठयोग प्र० ४ । १०७ )
महायोगी गोरखनाथजी ने विवेकमार्तण्ड में कहा है कि जब जीवात्मा और
परमात्मा का समत्व—ऐक्य स्थापित हो जाता है, तो वही समाधि है। संकल्प
शून्यता की स्थिति प्रत्यक्ष हो जाती है।
यत्समत्वं द्वयोरत्र जीवात्मपरमात्मनोः ।
समस्तनष्टसङ्कल्पः समाधिः सोऽभिधीयते ॥
( विवेकमार्तण्ड १६६ )
निरालम्ब, निराकार, निरामय, निराधार परब्रह्म में—अलखनिरञ्जन
परमेश्वर में योगाभ्यास के फलस्वरूप योगी स्वस्थ हो जाता है। यही अष्टांगयोग
की महती प्रतिष्ठा अथवा सिद्धि है। गीता के छठें अध्याय के दसवें श्लोक से
२६वें श्लोक तक अष्टांगयोग की साधना का ही वर्णन यथाक्रम उपलब्ध होता
है। गीता में वर्णन है कि मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखनेवाला,
आशारहित, संग्रहरहित योगी अकेला ही एकान्त स्थान में स्थित होकर आत्मा
को निरन्तर परमात्मा में लगाये । .... .... अत्यन्त वश में किया हुआ चित्त जिस
समय परमात्मा में अच्छी तरह स्थित हो जाता है, उस समय सम्पूर्ण भोगों में
स्पृहारहित साधक योगयुक्त हो जाता है ।
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्तः आसीत मत्परः ॥
( गीता ६ । ११-१४ )
क्रम-क्रम से अभ्यास करता हुआ योगी उपरति को प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त
बुद्धि के द्वारा मन को परमात्मा में स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ
भी चिन्तन न करे।
६० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥
( गीता ६ । २६ )
सर्वव्यापी अनन्त चेतन में एकीभाव से स्थितिरूप योगयुक्त आत्मावाला
तथा सर्वात्मदर्शी योगी आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में स्थित और सम्पूर्ण भूतों को
आत्मा में कल्पित देखता है । महायोगी गोरखनाथ ने यमनियमासनप्राणायाम-
प्रत्याहारधारणाध्यानसमाधियुक्त योगसाधना के द्वारा अलख निरञ्जन परमेश्वर
की अभिव्यक्ति—सर्वत्र परिव्याप्ति का अनुभव ही श्रेयस्कर स्वीकार किया है
द्वैताद्वैतविवर्जित स्वसंवेद्य परमतत्व की रसानुभूति ही योगकल्पतरु का सिद्ध
( परिपक्व ) फल है ।
इतिशिवगोरक्षरचितसिद्धसिद्धान्तपद्धतौ द्वितीयोपदेशः ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६१

तीसरा उपदेश
[ पिण्डसंवित्ति ]
पिण्डमध्ये चराचरं यो जानाति स योगी पिण्डसंवित्ति-
र्भवति ॥ १ ॥
( पिण्डविचार के उपरान्त उसके फलस्वरूप पिण्डज्ञान का उपदेश किया
जाता है। यद्यपि हाड़मांसरक्तमज्जामेदादि से गठित व्यष्टिपिण्ड प्रत्यक्ष है और
इस सम्बन्ध में इसका निरूपण असंगत-सा है तथापि इसमें चराचर समस्त
ब्रह्माण्ड परिव्याप्त है, इसलिये पिण्डज्ञान-निरूपण का फल है पिण्ड में व्याप्त
समस्त ब्रह्माण्ड की परिचयप्राप्ति जो योगी इस पिण्ड में चर, अचर, समस्त
ब्रह्माण्ड का ज्ञान प्राप्त करता है, वह पिण्डसंवित्ति ( पिण्डज्ञानी ) हो जाता है ।
योगी पिण्ड ( समष्टि-व्यष्टि पिण्ड ) का ज्ञानी हो जाता है ॥ १ ॥
विशेष—व्यष्टि पिण्ड ( शरीर में अस्मदादि अन्तःकरणाभिमानी जीव
( -आत्मा ) है और समष्टि पिण्ड में विराट् हिरण्यगर्भादि ( परमात्मा )
परिव्याप्त हैं। समष्टिपिण्ड व्यापक, अधिक शक्तिशाली है, सर्वेश्वर सत्यसंकल्प
होने से अस्मदादि शरीरों का कारण और नियन्ता है, व्यष्टि पिण्ड ( शरीर )
विनाशी है, क्षणभंगुर है, उसका अभिमानी जीव कर्मपाश से आबद्ध है । योग-
साधक ब्रह्माण्डगत कार्य-व्यवहार का ज्ञान अपने व्यष्टि पिण्ड में प्राप्त कर,
कर्मपाश से मुक्त होकर परमशान्त और सच्चिदानन्दरूप आदिनाथ, अलख
निरञ्जन परमेश्वर के स्वरूप का बोध प्राप्त कर तदाकार हो जाता है ।
६२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

सप्त पाताल तथा अनेक लोकादि
कूर्मः पादतले वसति पातालं पादाङ्गुष्ठे तलातलमङ्गुष्ठाग्रे
महातलं पादपृष्ठे रसातलं गुल्फं सुतलं जङ्घायां वितलं जान्वोर-
तलमूर्वोरैव सप्तपातालं रुद्रदेवाधिपतये तिष्ठति पिण्डमध्ये क्रोध-
रूपी भावः स एव कालाग्निरुद्रः ॥ २ ॥
कूर्म पैर के नीचे ( पादतल में ) व्यष्टि शरीर के आश्रय के रूप में स्थित
है ( जिस तरह कूर्म--शिवशक्ति की आत्माभिव्यक्ति का एक रूप ब्रह्माण्ड-शरीर
का आश्रय है ) । नीचे के सात लोक-सप्तपाताल हमारे व्यष्टि-शरीर में स्थित
हैं । पैर के अँगूठे में पाताल, अँगूठे के अग्रभाग में तलातल, पादपृष्ठ में रसातल
गट्टे ( गुल्फ ) में सुतल, जाँघ में वितल और जानु में अतल स्थित है। इन सातों
पाताल के अधिष्ठातृ देवता रुद्र हैं । पिण्ड में क्रोधरूपी भाव ही कालाग्निरुद्र है ।
रुद्र व्यष्टि पिण्ड ( शरीर ) में क्रोध के रूप में निवास करता है ॥ २ ॥
विशेष-योगी का लक्ष्य एक आत्मा--अलख निरञ्जन, द्वैताद्वैतविवर्जित
परमात्मा को समस्त प्रकार के शरीरों में देखना और समस्त प्रापंचिक सत्ताओं
के मौलिक आध्यात्मिक स्वरूप को पहचानना है । यही समस्त पिण्डों, प्रापंचिक
सत्ताओं तथा ब्रह्माण्ड-व्यस्था का सच्चा ज्ञान है । जब योग-साधक की व्यावहारिक
चेतना यथेष्ट शुद्ध और आलोकित हो जाती है, तब पूर्ण का प्रत्येक अंश में
अनुभव किया जाता है । सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड-व्यवस्था का प्रत्येक व्यष्टि-पिण्ड में
अनुभव किया जाता है तथा समस्त व्यष्टि-शरीरों की मौलिक एकता स्पष्ट रूप
से प्रकट हो जाती है । जो योगसाधक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड-व्यवस्था का व्यष्टि-शरीर
में अनुभव करता है, वही शरीर का सच्चा ज्ञाता है । निर्वाण--परम कैवल्य
पद की प्राप्ति अपने शरीर में ही प्रत्यक्ष है । उस निर्वाण-पद की खोज काया
में करनी चाहिये, ऐसा गोरखनाथजी का ज्ञानोपदेश है ।
जोग जुक्त जब पावै ग्यांना । काया खोजै पद निरबाना ॥
सप्तदीप नवखंड ब्रह्माण्डा । धरती आकास देवा रवि चंदा ॥
तजिवा तिहुँ लोक निवासा । तहाँ निरंजन जोति प्रकासा ॥
( गोरखवानी-प्राणसंकली २-३ )
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६३

अलख निरञ्जन की ज्योति, जो सप्त-द्वीप, नौ खण्ड, समस्त ब्रह्माण्ड,
धरती, आकाश, देवताओं, रवि और चन्द्रमा तथा तीनों लोक में प्रकट है, हमारे
व्यष्टि-पिण्ड में अभिव्यक्त है । समस्त पिण्ड-ब्रह्माण्ड-व्यवस्था में अलख निरञ्जन
ही ज्योतित है, समस्त ब्रह्माण्ड उसी की अभिव्यक्ति है ।
अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वे-
ऽस्मात्स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः ।
अतश्च सर्वा ओषधयो रसश्च
येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥
( मुण्डकोपनिषद् १ । ६ )
परमेश्वर से ही समस्त पर्वत, समुद्र उत्पन्न हैं, अनेक आकारवाली नदियाँ
वह रही हैं । समस्त औषधि और रस उत्पन्न हैं । प्राणियों के हृदय में यही
निरञ्जन परमेश्वर अधिष्ठित है, इसी परम तत्व की प्राप्ति ही योगसाधक का
प्रतिपाद्य है । श्रीमद्भागवत पुराण के दूसरे स्कन्ध के पहले और पाँचवें अध्याय तथा
पाँचवें स्कन्ध के चौबीसवें अध्याय में सप्तपाताल की स्थिति आदि का विशिष्ट
वर्णन उपलब्ध होता है । शिवसंहिता में इस देह—व्यष्टिपिण्ड को ब्रह्माण्ड कहा
गया है । इसी देह में सात द्वीपों के सहित सुमेरुपर्वत, सरिता, सागर, पर्वत,
क्षेत्र, नक्षत्र, ऋषि, ग्रह, सूर्य, चन्द्र आदि विद्यमान हैं ।
देहेऽस्मिन् वर्तते मेरुः सप्तद्वीपसमन्वितः ।
सरितः सागराः शैलाः क्षेत्राणि क्षेत्रपालकः ॥
ऋषयो मुनयः सर्वे नक्षत्राणि ग्रहास्तथा ।
पुण्यतीर्थानि पीठानि वर्तन्ते पीठदेवताः ॥
सृष्टिसंहारकर्तारौ भ्रमन्तौ शशिभास्करौ ।
नभोवायुश्च वह्निश्च जलं पृथ्वी तथैव च ॥
त्रैलोक्ये यानि भूतानि तानि सर्वाणि देहतः ।
मेरुं संवेष्ट्य सर्वत्र व्यवहारः प्रवर्तते ।
जानाति यः सर्वमिदं स योगी नात्र संशयः ॥
( शिवसंहिता २ । १-४ )
तीनों लोक में जितने भी प्राणी-पदार्थ हैं, वे सभी शरीरस्थ सुमेरु-मेरुदण्ड
के आश्रय में व्यवहाररत हैं ।
६४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

ब्रह्माण्डसंज्ञके देहे यथादेशं व्यवस्थितः ।
मेरुशृङ्गे सुधारश्मिर्वहिरष्टकलायुतः ॥
( शिवसंहिता २ । ५ )
ब्रह्माण्ड-शरीर और व्यष्टि-शरीर में कोई भेद नहीं है । जिस तरह ब्रह्माण्ड
शरीर में सभी देश और सुमेरु आदि स्थित हैं, उसी तरह व्यष्टि-पिण्ड में भी
सुमेरु आदि स्थित हैं ।
भूर्लोकं गुह्यस्थाने भुवर्लोकं लिङ्गस्थाने स्वर्लोकं नाभि-
स्थाने । एवं लोकत्रय इन्द्रो देवता पिण्डमध्ये सर्वेन्द्रय-
नियामकः स एवेन्द्रः ॥ ३ ॥
भूः ( पृथ्वी ) लोक ( हमारे ) व्यष्टि-शरीर के मूलाधार ( गुह्यस्थान )
में, भुवः लोकं लिङ्ग प्रदेश में और स्वः लोक नाभिदेश में स्थित हैं । ( शिव-शक्ति
की एक अन्य आत्माभिव्यक्ति ) इन्द्र इन तीनों लोकों का नियन्ता, शासक
अथवा इन्द्र कहा गया है, यही व्यष्टि शरीर और समस्त इन्द्रियों का नियामक
होने से इन्द्र ही है ॥ ३ ॥
दण्डाङ्कुरे महर्लोको दण्डकुहरे जनोलोको दण्डनाले तपो
लोको मूलकमले सत्यलोक एवं लोकचतुष्टये ब्रह्मादिदेवता
पिण्डमध्येऽनेकमानाभिमानस्वरूपी तिष्ठति ॥ ४ ॥
मेरुदण्ड के मूल में ( प्रजापति दक्ष का वास-स्थान ) महः लोक है । मेरुदण्ड
के कुहर ( छिद्र ) में जनः लोक है, मेरुदण्डनाल में तपः लोक और मूलाधार
कमल ( चक्र ) में सत्यलोक है । इन चारों लोकों में ( शिवशक्ति की ही
आत्माभिव्यक्ति ) ब्रह्मादि ही अधिपति हैं और इस पिण्ड में अनेकमानाभिमानरूप
ब्रह्म का ही ( मेरुदण्ड में ) आधिपत्य है ॥ ४ ।
विशेष—महः, जनः तपः और सत्य, ये चारों लोक व्यष्टि-शरीर में सुषुम्ना
नाड़ी के उच्चतर क्षेत्रों में स्थित माने गये हैं । ज्यों-ज्यों साधक समाधि के
उच्चतर स्तरों पर उठकर शरीर के अन्तरतम तत्व में गहनता से प्रवेश करता है,
त्यों-त्यों वह इन उच्च—सूक्ष्मातिसूक्ष्म लोकों की स्थिति का अपने शरीर के भीतर
अनुभव करता है ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६५

विष्णुलोकः कुक्षौ तिष्ठति तत्र विष्णुर्देवता पिण्डमध्ये-
ऽनेकव्यापारको भवति । हृदये रुद्रलोकस्तत्र रुद्रो देवता
पिण्डमध्य उग्रस्वरूपो तिष्ठति । वक्षःस्थल ईश्वरलोकस्तत्रे-
श्वरो देवता पिण्डमध्ये तृप्तिस्वरूपी तिष्ठति । कण्ठमध्ये
नीलकण्ठलोकस्तत्र नोलकण्ठो देवता पिण्डमध्ये नित्यं तिष्ठति ।
तालुद्वारे शिवलोकस्तत्र शिवो देवता पिण्डमध्येऽनुपमस्वरूपी
तिष्ठति । लम्बिकामूले भैरवलोकस्तत्र भैरवो देवता पिण्डमध्ये
सर्वोत्तमस्वरूपी तिष्ठति । ललाटमध्येऽनादिलोकस्तत्रानादि
देवता पिण्डमध्य आनन्द पराहंतास्वरूपी तिष्ठति । शृङ्गाटे
कुललोकस्तत्रकुलेश्वरो देवता पिण्डमध्ये आनन्दस्वरूपी
तिष्ठति । शङ्खमध्ये नलिनोस्थानेऽकुलेश्वरो देवता पिण्डमध्ये
निरभिमानावस्था तिष्ठति । ब्रह्मरन्ध्रे परब्रह्मलोकस्तत्र
परब्रह्म देवता पिण्डमध्ये परिपूर्णदशा तिष्ठति । ऊर्ध्वकमले
लोकस्तत्र परमेश्वरो देवता पिण्डमध्ये परापरभावस्तिष्ठति ।
त्रिकूटस्थाने शक्तिलोकस्तत्र पराशक्तिर्देवता पिण्डमध्येऽस्ति-
त्वावस्था सर्वासां सर्वकर्तृत्वावस्था तिष्ठति । एवं पिण्डमध्ये
सप्तपातालसहितैकविंशति ब्रह्माण्डस्थानविचारः ॥ ५ ॥
( जिस तरह ब्रह्माण्ड में विष्णुलोकादि उच्चलोक स्थित हैं, उसी तरह
व्यष्टि-पिण्ड में वर्तमान इन शिवशक्तिरूप में अभिव्यक्त उच्च सूक्ष्म लोकों का
साधक दर्शन कर परमात्मा का साक्षात्कार करता है ।) हमारे व्यष्टि-पिण्ड में
कुक्षि ( नाभि-देश -उदर ) में विष्णुलोक है, वहाँ रक्षण-पोषण आदि अनेक
व्यापार ( कार्य ) में तत्पर भगवान् विष्णु विराजमान हैं । हृदय में रुद्रलोक है,
उसमें अपने उग्र रूप में संहार आदि कार्यों में तत्पर भगवान् रुद्रदेव विद्यमान हैं ।
हृदय से थोड़ा ऊपर वक्षःस्थल है, उसमें ईश्वरलोक है, उसमें पिण्ड के मध्य में
तृप्तिस्वरूप ईश्वर देवता विराजमान हैं । कण्ठ के मध्य में नीलकण्ठ लोक है,
वहाँ नीलकण्ठ ( शिव ) शरीर के भीतर नित्य स्थित हैं । तालुद्वार में शिवलोक
६६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति