सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्माण्डसंज्ञके देहे यथादेशं व्यवस्थितः ।
मेरुशृङ्गे सुधारश्मिर्वहिरष्टकलायुतः ॥
( शिवसंहिता २ । ५ )
ब्रह्माण्ड-शरीर और व्यष्टि-शरीर में कोई भेद नहीं है । जिस तरह ब्रह्माण्ड
शरीर में सभी देश और सुमेरु आदि स्थित हैं, उसी तरह व्यष्टि-पिण्ड में भी
सुमेरु आदि स्थित हैं ।
भूर्लोकं गुह्यस्थाने भुवर्लोकं लिङ्गस्थाने स्वर्लोकं नाभि-
स्थाने । एवं लोकत्रय इन्द्रो देवता पिण्डमध्ये सर्वेन्द्रय-
नियामकः स एवेन्द्रः ॥ ३ ॥
भूः ( पृथ्वी ) लोक ( हमारे ) व्यष्टि-शरीर के मूलाधार ( गुह्यस्थान )
में, भुवः लोकं लिङ्ग प्रदेश में और स्वः लोक नाभिदेश में स्थित हैं । ( शिव-शक्ति
की एक अन्य आत्माभिव्यक्ति ) इन्द्र इन तीनों लोकों का नियन्ता, शासक
अथवा इन्द्र कहा गया है, यही व्यष्टि शरीर और समस्त इन्द्रियों का नियामक
होने से इन्द्र ही है ॥ ३ ॥
दण्डाङ्कुरे महर्लोको दण्डकुहरे जनोलोको दण्डनाले तपो
लोको मूलकमले सत्यलोक एवं लोकचतुष्टये ब्रह्मादिदेवता
पिण्डमध्येऽनेकमानाभिमानस्वरूपी तिष्ठति ॥ ४ ॥
मेरुदण्ड के मूल में ( प्रजापति दक्ष का वास-स्थान ) महः लोक है । मेरुदण्ड
के कुहर ( छिद्र ) में जनः लोक है, मेरुदण्डनाल में तपः लोक और मूलाधार
कमल ( चक्र ) में सत्यलोक है । इन चारों लोकों में ( शिवशक्ति की ही
आत्माभिव्यक्ति ) ब्रह्मादि ही अधिपति हैं और इस पिण्ड में अनेकमानाभिमानरूप
ब्रह्म का ही ( मेरुदण्ड में ) आधिपत्य है ॥ ४ ।
विशेष—महः, जनः तपः और सत्य, ये चारों लोक व्यष्टि-शरीर में सुषुम्ना
नाड़ी के उच्चतर क्षेत्रों में स्थित माने गये हैं । ज्यों-ज्यों साधक समाधि के
उच्चतर स्तरों पर उठकर शरीर के अन्तरतम तत्व में गहनता से प्रवेश करता है,
त्यों-त्यों वह इन उच्च—सूक्ष्मातिसूक्ष्म लोकों की स्थिति का अपने शरीर के भीतर
अनुभव करता है ।
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