सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
पृष्ठ 124, कुल 222 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरना चाहिये । जिस इन्द्रिय के द्वारा जिस विषय का बोध होता हो, उसी में
आत्मभाव करने से इन्द्रियजय होना ही प्रत्याहार है ।
यं यं जानाति योगीन्द्रस्तं तमात्मेति भावयेत् ।
यैरिन्द्रियैर्यद्विधानस्तदिन्द्रियजयो भवेत् ॥
( शिवसंहिता ३ । ६८ )
प्रत्याहार की सिद्धि ही धारणा, ध्यान और समाधि में आत्मसाक्षात्कार
अथवा परमात्म पद में स्वरूपावस्थान का सोपान है ।
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धारणेति सा बाह्याभ्यन्तर एकमेवनिजतत्वस्वरूपमेवान्तः
करणेन साधयेद् यथा यद्यदुत्पद्यते तत्तन्निराकारे धारयेत्
स्वात्मानं निर्वातदीपमिव संधारयेदिति धारणा-
लक्षणम् ॥ ३७ ॥
( धारणा अष्टांगयोग का छठा अंग है, इसका निरूपण किया जाता है । )
शरीर से बाहर-भीतर एक ही निज तत्त्वस्वरूप ( आत्मा ) व्याप्त है, अन्तःकरण
से इस तरह की भावना ही धारणा है । जो-जो भौतिक प्रपञ्च उत्पन्न होता है,
उसकी निराकार आत्मा रूप में धारणा करनी चाहिये और वायुरहित दीपक
के निश्चल प्रकाश के समान ( प्रपञ्चातीत ) आत्मचैतन्य का ही चिन्तन करना
चाहिये । यही धारणा का लक्षण है ॥ ३७ ॥
विशेष—धारणा, ध्यान और समाधि—अष्टांगयोग के तीन अंग स्वरूपा-
वस्थान के यथाक्रम परस्पर सम्बद्ध-अन्योन्याश्रित सोपान हैं, पर इनमें से किसी
एक के भी आश्रय से स्वरूप-प्राप्ति होती है —ऐसा भी कहा जा सकता है ।
पांच तत्व--पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश की धारणा के सम्बन्ध में
हठयोगशास्त्रों में विशद विवेचन किया गया है । पृथ्वी तत्व की धारणा का
वर्णन है कि जिस साधक को भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश की धारणा हो
जाती है, उसका चित्त निश्चल हो जाता है ।
या पृथ्वी हरितालहेमरुचिरा तत्त्वं लकारान्वितं
संयुक्ता कमलासनेन हि चतुष्कोणा हृदिस्थायिनी ।
प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये
८२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति