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श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary

गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

हनुमान्‌जीकी आरती

रचयिता–हिन्दूधर्मोद्धारक जगद्गुरु आद्य रामानन्दाचार्य¹
आरति कीजै हनुमान लला की।
दुष्ट-दलन रघुनाथ-कला की॥ १ ॥
जाके बल गरजे महि काँपै।
रोग सोग जाके सिमाँ न चाँपै॥ २ ॥
अंजनी-सुत महाबल-दायक।
साधु संत पर सदा सहायक॥ ३ ॥
बाएँ भुजा सब असुर सँघारी।
दहिन भुजा सब संत उबारी॥ ४ ॥
लछिमन धरनि में मूर्छि पड़्यो।
पैठि पताल जमकातर तोड़्यो॥ ५ ॥
आनि सजीवन प्रान उबार्यो।
मही सबन कै भुजा उपार्यो॥ ६ ॥
गाढ़ परे कपि सुमिरौं तोहीं।
होहु दयाल देहु जस मोहीं॥ ७ ॥
लंका कोट समुंदर खाई।
जात पवनसुत बार न लाई॥ ८ ॥
¹ इस पदको आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, डॉ. श्यामसुन्दर दास, सर जॉर्ज ग्रियर्सन, और रामकुमार
वर्मा सदृश अनेक विद्वानोंने रामानन्दाचार्यजीकी रचना माना है।

हनुमान्‌जीकी आरती महावीरी व्याख्या
लंक प्रजारि असुर सब मार्यो।
राजा राम कै काज सँवार्यो॥ ९ ॥
घंटा ताल झालरी बाजै।
जगमग जोति अवधपुर छाजै॥ १० ॥
जो हनुमान की आरति गावै।
बसि बैकुंठ परम पद पावै॥ ११ ॥
लंक बिधंस कियो रघुराई।
रामानन्द आरती गाई॥ १२ ॥
सुर नर मुनि सब करहिं आरती।
जै जै जै हनुमान लाल की॥ १३ ॥
डॉ. रामाधार शर्मा द्वारा संपादित प्रस्तुत पाठके स्रोत हैं—(१) डॉ. पीताम्बर दत्त
बड़थ्वाल (संपादित) (१९५५ ई.), रामानन्द की हिन्दी रचनाएँ (प्रथम संस्करण),
काशी: नागरी प्रचारिणी सभा, पृष्ठ ७; और (२) डॉ. बदरीनारायण श्रीवास्तव (१९५७
ई.), रामानन्द साहित्य तथा हिन्दी साहित्य पर उसका प्रभाव, प्रयाग: हिन्दी परिषद्
प्रयाग विश्वविद्यालय, पृष्ठ १३९। दोनों स्रोतोंमें कई पाठभेद हैं, यथामति समीचीन पाठ
ही यहाँ डॉ. रामाधार शर्मा द्वारा प्रस्तुत किया गया है—संपादक।
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पद्मविभूषण-विभूषित जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य भारतके प्रख्यात
विद्वान्, वैयाकरण, शिक्षाविद्, बहुभाषाविद्, महाकवि, भाष्यकार, दार्शनिक,
रचनाकार, संगीतकार, प्रवचनकार, कथाकार, व धर्मगुरु हैं। वे चित्रकूट-स्थित
श्रीतुलसीपीठके संस्थापक एवं अध्यक्ष और जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग
विश्वविद्यालय चित्रकूटके संस्थापक एवं आजीवन कुलाधिपति हैं। स्वामी
रामभद्राचार्य दो मासकी आयुसे प्रज्ञाचक्षु होते हुए भी २२ भाषाओंके ज्ञाता, अनेक
भाषाओंमें आशुकवि, और शताधिक ग्रन्थोंके रचयिता हैं। उनकी रचनाओंमें चार
महाकाव्य (दो संस्कृत और दो हिन्दीमें), रामचरितमानसपर हिन्दी टीका, अष्टाध्यायीपर
गद्य और पद्यमें संस्कृत वृत्तियाँ, और प्रस्थानत्रयीपर (ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता, और प्रधान
उपनिषदोंपर) संस्कृत और हिन्दी भाष्य प्रमुख हैं। वे तुलसीदासपर भारतके मूर्धन्य
विशेषज्ञोंमें गिने जाते हैं और रामचरितमानसके एक प्रामाणिक संस्करणके संपादक हैं।
प्रस्तुत पुस्तक सनातन धर्मके सर्वाधिक लोकप्रिय स्तोत्र श्रीहनुमान्-चालीसापर
स्वामी रामभद्राचार्यकी महावीरी व्याख्याका तृतीय संस्करण है। ईस्वी सन् १९८३में
मात्र एक दिनमें प्रणीत इस व्याख्याको रामचरितमानसके अंग्रेज़ी व हिन्दी अनुवादक
डॉ. रामचन्द्र प्रसादने श्रीहनुमान्-चालीसाकी 'सर्वश्रेष्ठ व्याख्या' कहा है। अनेक
टिप्पणियों और परिशिष्टों सहित महावीरी व्याख्याका परिवर्धित अंग्रेज़ी अनुवाद भी
Mahāvīrī: Hanumān-Cālīsā Demystified नामसे प्रकाशित हो चुका है।
₹50 विशिष्ट मूल्य
ISBN 978-93-82253-07-5
ज.रा.दि.वि.
www.jrhu.com
9 789382 253075