सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

१५६) (श्री भक्तमाल
पृथ्वीपति आयौ, वृन्दावन मन चाह, भई सारँग सुनावै कोऊ, जोरावरी ल्यायै हैं।
वल्लभ हूँ संग, सुर भरत ही छायौ रंग, अति ही रिझायौ, दृग अँसुवा बहाये हैं।।
ठाढ़ौ कर जोरि, विनै करी पै न धरी हियै, जियै ब्रजभूमि ही सो, वचन सुनाये हैं।
कैद करि साथ लिये, दिल्ली ते छुटाय दिये, हरीदास तूँवर नै, आये प्रान पाये हैं।। ५६३।।
श्रीसोतीजी
सोती श्लाघ्य सन्तनि सभा, दृतिय दिवाकर जानियो।।
परम भक्ति परताप, धर्मध्वज नेजा धारी।
सीतापति को सुजस, वदन शोभित अति भारी।।
जानकी जीवन चरण, शरण थाती थिर पाई।
नरहरि गुरू परसाद, पूत पोते चलि आई।।
राम उपासक छाप दृढ़, और न कछु उर आनियो।
सोती श्लाघ्य सन्तनि सभा, दृतिय दिवाकर जानियो।। १६३।।
श्रीलालदासजी
जीवत जस पुनि परमपद, लालदास दोनों लही।।
हृदै हरीगुन खानि, सदा सत्संग अनुरागी।
पद्मपत्र ज्यौं रह्यौ, लोभ की लहर न लागी।।
विष्णुरात सम रीति, बघेरै त्यौं तन त्याज्यो।
भक्त बरातीवृन्द, मध्य दूलह ज्यौं राज्यो।।
खरी भक्ति हरिषांपुरे, गुरुप्रताप गाढ़ी गही।
जीवत जस पुनि परमपद, लालदास दोनों लही।। १६४।।
श्रीमाधवग्वालजी
भक्तनि हित भगवत रची, देही माधवग्वाल की।।
निसिदिन यहै विचार, दास जिहि विधि सुख पावैं।
तिलक दाम सौं प्रीति, हृदै अति हरिजन भावैं।।

श्रीप्रेमनिधिजी) (१५७
परमारथ सौं काज, हिये स्वारथ नहीं जानैं।
दशधा मत्त मराल, सदा लीला गुण गानै।।
आरत हरिगुण शील सम, प्रीति रीति प्रतिपाल की।
भक्तनि हित भगवत् रची, देही माधवग्वाल की।। १६५।।
श्रीप्रयागदासजी
“श्रीअगर” सुगुरु परपात ते, पूरी परी प्रयाग की।।
मानस वाचक काय, राम चरणनि चित दीनौ।
भक्तनि सौं अति प्रेम, भावना करि सिर लीनौ।।
रास मध्य निर्जन, देह दुतिदसा दिखाई।
आड़ौ बलियौ अंक, महोच्छौ पूरी पाई।।
क्यारे कलस औली ध्वजा, विदुष श्लाघा भाग की।
“श्रीअगर” सुगुरू परताप तें, पूरी परी प्रयाग की।। १६६।।
श्रीप्रेमनिधिजी
प्रगट अमित गुन प्रेमनिधि, धन्य विप्र जिन नाम धर्यौ।।
सुन्दर शील सुभाव, मधुर वानी मंगल करू।
भक्तनि कौं सुख दैन, फल्यौ बहुधा दसधा तरू।।
सदन बसत निर्वेद, सारभुक जगत् असंगी।
सदाचार ऊदार, नेम हरिदास प्रसंगी।।
दयादृष्टि बसि आगरैं, कथा लोक पावन कर्यौ।।
प्रगट अमित गुन प्रेमनिधि, धन्य विप्र जिन नाम धर्यौ।। १६७।।
प्रेमनिधि नाम, करैं सेवा अभिराम स्याम आगरौ शहर निसि, शेष जल ल्याइयै।
बरखा सु रितु, जित तित अति कीच भई, भई चित चिन्ता, कैसे अपरसि आइयै।।

१५८) (श्री भक्तमाल
जोपै अन्धकार ही मैं, चलौं तो बिगार होत, चले यों विचारि, नीच छुवै न सुहाइयै।
निकसत द्वार, जब देख्यौ सुकुमार एक, हाथ में मशाल याके, पाछे चले जाइयै॥५६४॥
जानी यहै बात, पहुँचाये कहूँ जात यह, अबहीं विलात भले, चैन कोऊ घरी है।
जमुना लौं आयौ, अचरज सो लगायौ मन, तन अन्हवायौ मति, वाही रूप हरी है॥
घट भरि धर्यौ सीस, पट वह आय गयौ, आय गयौ घर, नहीं देखी कहा करी है।
लागी चटपटी-अटपटी न समझि परै, भटभटी भई नई, नैन नीर झरी है॥५६५॥
कथा ऐसी कहैं, जामें गहैं मन भाव भरैं, करैं कृपादृष्टि, दुष्टजन दुख पायौ है।
जायकै सिखायौ, बादशाह उर दाह भयौ, कही तिया भली को, समूह घर छायौ है॥
आये चोबदार कहैं, चलौं एही बार वारि, झारी प्रभु आगे धर्यौ, चाहै शोर लायौ है।
चले तब संग, गये पूछे नृप रंग कहा?, तियनि प्रसंग करौ?, कहिकै सुनायौ है॥५६६॥
कान्ह भगवान् ही की, बात सो बखानि कहौं, आनि बैठैं नारी-नर, लागी कथा प्यारी है।
काहू कौं बिडारैं, झिरकारैं नेकु टारैं, विषैदृष्टि कै निहारैं, ताकौं लागै दोष भारी है॥
कही तुम भली, तेरी गली ही के लोग मोसौँ, आयकै जताई वह, रीति कछु न्यारी है।
बोल्यौ याहि राखौ सब, करौं निरधार नीके, चलै चोबदार लैके, रोके प्रभु धारी है॥५६७॥
सोयौ बादशाह निसि, आयकै सुपन दियौ, कियौ वाकौ इष्टभेष, कही प्यास लागी है।
पीवौ जल कही, आबखाने लै बखाने तब, अति ही रिसाने, को पियावै कोऊ रागी है॥
फेर मारी लात, अरे सुनी नहीं बात मेरी, आप फुरमावै जोई, प्यावै बड़भागी है।
सो तौ तैं कैद कर्यौ, सुनि अरबर्यो डर्यौ, भर्यौ हिये भाव, मति, सोवत तें जागी है॥५६८॥
दौरे नर ताही समै, वेगि दै लिवाय ल्याये, देखि लपटाये पाँय, नृप दृग भीजे हैं।
साहिब तिसाये जाय, अबही पियावौ नीर, और पै न पीवैं, एक तुमही पै रीझे हैं॥
लेवौ देश गाँव सदा, पांव हीं सो लग्यौ रहौं, गहौं नहीं नेकु, धन पाय बहु छीजे हैं।
संग दै मशाल, ताही काल में पठाये यों, कपाट जाल खुले, लाल प्यायो जल धीजे हैं॥५६६॥
श्रीराघवदासजी दूबलो
दूबरो जाहि दुनियाँ कहै, सो भक्त भजन मोटौ महन्त॥
सदाचार गुरु शिष्य, त्याग विधि प्रगट दिखाई।
बाहर भीतर विशद्, लगी नहिं कलियुग काई॥

श्रीकान्हरदासजी) (१५६
राघौ रुचिर सुभाव, असद् आलाप न भावै।
कथा कीर्त्तन नेम, मिलैं सन्तनि गुन गावै॥
ताय तोलि पूरौ, निकष ज्यौं घन, अहरनि हीरौ सहन्त।
दूबरो जाहि दुनियाँ कहै, सो भक्त भजन, मोटौ महन्त॥ १६८॥
दासनि के दासत्व कौ, चौकस चौकी ये मड़ी॥
हरि नारायण नृपति, पद्म बेरछे विराजैं।
गाँव हुसंगाबाद, अटल ऊधौ भल छाजैं॥
भैलै तुलसीदास, भट ख्यात देवकल्याने।
बोहिथवीरा रामदास, सुहेलैं परम सुजाने॥
औली परमानन्द कै, ध्वजा सबल धर्म की गड़ी।
दासनि के दासत्व की, चौकस चौकी ये मड़ी॥ १६६॥
अबला शरीर साधन सबल, ये बाई हरिभजन बल।
देमा प्रगट सब दुनी, रामाबाई वीराँ हीरामनि।
लाली नीरा लक्ष्म, जुगुल पार्वती जगत् धनि॥
खीचनि केसी धना, गोमती भक्त उपासिनी।
बाँदररानी विदित, गंगा जमुना रैदासिनी॥
जेवा हरिषां जोइसिनि, कुँवरिराय कीरति अमल।
अबला शरीर साधन सबल, ये बाई हरिभजन बल॥ १७०॥
श्रीकान्हरदासजी
कान्हरदास सन्तनि कृपा, हरि हिरदै लाहौ लह्यौ॥
श्रीगुरू शरणै आय, भक्ति मारग सत जान्यौ।
संसारी धर्महिं छाँड़ि, झूठ अरु साँच पिछान्यौ॥

१६०) (श्री भक्तमाल
ज्यौं साखा द्रुम चन्द, जगत् सौं इहि विधि न्यारौ।
सर्वभूत समदृष्टि, गुननि गम्भीर अति भारौ॥
भक्त भलाई वदन नित, कुवचन कबहुँ नहीं कह्यौ।
कान्हरदास सन्तनि कृपा, हरि हिरदै लाहौ लह्यौ ॥ १७१॥
श्रीकेशवलटेरा, श्रीपरशुरामजी
लट्यौ लटेरा आन विधि, परम धरम अति पीन तन।।
कहनी रहनी एक, एक प्रभुपद अनुरागी।
जस वितान जग तन्यौ, सन्त सम्मत बड़भागी।।
तैसोइ पूत सपूत, नूत फल जैसोइ परसा।
हरि हरिदासनि टहल, कवित रचना पुनि सरसा।।
(श्री) सुरसुरानन्द सम्प्रदाय दृढ़, केसव अधिक उदार मन।
लट्यौ लटेरा आन विधि, परम धरम अति पीन तन ।। १७२ ।।
श्रीकेवलरामजी
केवलराम कलियुग्ग के, पतित जीव पावन किये।।
भक्ति भागवत विमुख, जगत् गुरू नाम न जानैं।
ऐसे लोक अनेक, ऐंचि सनमारग आनैं।।
निर्मल रति निहकाम, अजा तें सदा उदासी।
तत्वदरसी तमहरन, शील करूना की रासी।
तिलक दाम नवधारतन, कृष्ण कृपा करि दृढ़ दिये।
केवलराम कलियुग्ग के, पतित जीव पावन किये।। १७३ ।।
घर-घर जाय कहैं, यहै दान दीजै मोकौं, कृष्ण सेवा कीजै, नाम लीजै चित लायकै।
देखे भेषधारी, दस बीस कहूँ, अनाचारी दये प्रभु सेवनि कौं, रीति दी सिखायकै।।

श्रीआशकरणजी) (१६१
करुनानिधान कोऊ, सुने नहीं कान कहूँ, बैल के लगायौ साँटौ, लोटे दया आयकै।
उपट्यो प्रगट तन, मन की सचाई अहो, भये तदाकार कहौं, कैसे समुझायकै।। ६०० ।।
श्रीआशकरणजी
(श्री) मोहन मिश्रित पद कमल, आसकरन जस विस्तर्यौ ।।
धर्मशील गुनसींव, महा भागवत राजरिषि।
पृथीराज कुलदीप, भीम सुत विदित कील्ह सिषि।।
सदाचार अति चतुर, विमल वानी रचना पद।
सूरधीर ऊदार, विनै भलपन भक्तनि हद।।
सीतापति राधासुवर, भजन नेम कूरम धर्यौ।
(श्री) मोहन मिश्रित पद कमल, आसकरन जस विस्तर्यौ।। १७४।।
नरवर पुर ताकौ, राजा नरवर जानौ, मोहन जू धरि हियें, सेवा नीके करी है।
घरी दस मन्दिर में रहें, रहै चौकी द्वार, पावत न जान कोऊ, ऐसी मति हरी है।।
पर्यो कोऊ काम, आय अबहि लिवाय ल्यावौ, कहै पृथीपति, लोग कान में न धरी है।
आई फौज भारी, सुधि दीजिये हमारी सुनि, बहू बात टारी, परी अति खरबरी है।।६०१।।
कहिकै पठाई कहौ, कीजियै लराई सुनि, रुचि उपजाई चलि, पृथीपति आयौ है।
पर्यौ सोच भारी, तब बात यों विचारी, कही आप एक जावौ, गयौ अचरज पायौ है।।
सेवा करि सिद्धि, साष्टांग ह्वैकै भूमि परे, देखि बड़ी बेर, पाँव खड्ग लगायौ है।
कटि गई एड़ी, एपै टेढिहू न भौंह करी, करी नित नेम रीति, धीरज दिखायौ है।। ६०२।।
उठि चिक डारि तब, पाछें सो निहारि कियौ, मुजरा विचारि, बादशाह अति रीझे हैं।
हित की सचाई यहै, नेकु न कचाई होत, चरचा चलाई भाव, सुनि-सुनि भीजे हैं।।
बीते दिन कोऊ, नृप भक्त सो समायौ, पृथीपति दुख पायौ, सुनि भोग हरि छीजे हैं।
करैं विप्र सेवा, तिन्हें गाँव लिखि न्यारे दिये, वाके प्रान न्यारे, लाड़ करौ कहि धीजे हैं।।६०३।।
मास परायण अट्ठाईसवाँ विश्राम

१६२) (श्री भक्तमाल
श्रीहरिवंशजी
निहिकिंचन भक्तनि भजैं, हरि प्रतीति हरिवंश के।।
कथा कीर्तन प्रीति, सन्तसेवा अनुरागी।
खरिया खुरपा रीति, ताहि ज्यौं सर्वसु त्यागी।।
सन्तोषी सुठि शील, असद् आलाप न भावै।
काल वृथा नहिं जाय, निरन्तर गोविन्द गावै।।
सिष सपूत श्री रंग को, उदित पारषद अंस के।
निहिकिंचन भक्तनि भजैं, हरि प्रतीति हरवंश के।। १७५।।
श्रीकल्याणजी
हरिभक्ति भलाई गुन गम्भीर, बाँटे परी कल्यान के।।
नवलकिशोर दृढ़व्रत, अनन्य मारग इक धारा।
मधुर वचन मन हरन, सुखद जानत संसारा।।
पर उपकार विचार, सदा करुना की रासी।
मन वच सर्वसु रूप, भक्तपद रेनु उपासी।।
धर्मदास सुत शील सुठि, मन मान्यौ कृष्ण सुजान के।
हरिभक्ति भलाई गुन गम्भीर, बाँटे परी कल्यान के।। १७६।।
श्रीबीठलदासजी
बीठलदास हरिभक्ति के, दुहूँ हाथ लाडू लिये।।
आदि अन्त निर्वाह, भक्तपद रज व्रतधारी।
रह्यौ जगत् सौं ऐंड़, तुच्छ जाने संसारी।।
प्रभुता पति की पधति, प्रगट कुल दीप प्रकासी।
महत् सभा में मान, जगत् जानै रैदासी।।
पद पढ़त भई परलोक गति, गुरू गोविन्द जुग फल दिये।
बीठलदास हरिभक्ति के, दुहूँ हाथ लाडू लिये।। १७७।।

श्रीहरीदासजी) (१६३
भगवन्त रचे भारी भगत, भक्तनि के सनमान को।।
क्वाहब श्रीरँग सुमति, सदानन्द सर्वसु त्यागी।
श्यामदास लघुलम्ब, अननि लाखै अनुरागी।।
मारू मुदित कल्यान, परस वंसी नारायन।
चेता ग्वाल गोपाल, शंकर लीला पारायन।।
सन्तसेय कारज किया, तोषत श्याम सुजान को।
भगवन्त रचे भारी भगत, भक्तनि के सनमान को।।१७८।।
श्रीहरीदासजी
तिलक दाम पर काम कौं, हरीदास हरि निर्मयो।।
सरनागत कौं सिविर दान, दधीचि टेक बलि।
परमधर्म प्रहलाद, सीस देन जगदेव कलि।
बीकावत बानैत, भक्तपंन धर्मधुरन्धर।
तूँवर कुलदीपक, सन्तसेवा नित अनुसर।।
पारथपीठ अचरज कौन, सकल जगत् में जस लियो।
तिलक दाम पर काम कौं, हरीदास हरि निर्मयो।।१७६।।
प्रह्लाद आदि भक्त, गाये गुन भागवत, सब, इकठोर आये, देखे हरिदास में।
रीझि जगदेव सो यों, कहिकै बखान कियौ, जानत न कोऊ सुनौ, कर्यौ ले प्रकास में।।
रहै एक नटी, शक्तिरूप गुन जटी गावै, लागै चटपटी, मोह पावै मृदुहास में।
राजा रिझवार, करै देवे को विचार, पै न पावै सार, काटै सीस, राख्यो तेरे पास में।।६०४।।
दियौ कर दाहिनो में, यासौं नहीं जाचौं कहूँ, सुनि एक राजा, भेदभाव सौं बुलाई है।
नृत्य करि गाई, रीझि लेवौ कही, आई देहु ओड्यौ बाँयों हाथ, रिस भरिकै सुनाई है।।
इतौ अपमान, पानि दच्छिन लै दियौ अहो, नृप जगदेव जू कौं, ऐसी कहा पाई है।
तासौं दसगुनी लीजै, मोकौं सो दिखाय दीजै, दई नहीं जाय, काहु मोहिये सुहाई है।।६०५।।
कितौ समुझावै, ल्यावौ कहै यहै जक लागी, गई बड़भागी पास, वस्तु मेरी दीजिये।
काटि दियो सीस, तन रहै ईश शक्ति लखो, ल्याई बकसीस, थार ढाँपि देखि लीजिये।

१६४) (श्री भक्तमाल
खोलिकै दिखायो नृप, मूरछा गिरायो तन, धन की न बात, अब याकौ कहा कीजिये।
मै जु दीनौ हाथ जानि, आनि ग्रीवा जोरि दई, लई वही रीझि पद, तन सुनि जीजिये।।६०६।।
सुनी जगदेव रीति, प्रीति नृपराज सुता, पिता सौं बखानि कही, वाही कौ लै दीजिये।
तबतौ बुलाये, समुझाये बहुभाँति खोलि, वचन सुनाये, अजू बेटी मेरी लीजिये।।
नट्यौ सतबार जब, कही डारौ मारि, चले मारिवे कौं बोली, वह मारौ मत भीजिये।
दृष्टि सौं न देखें, कही ल्यायौ काटि मूँड़ लाये, चाहै सीस आँखिन को, गयौ फिरि रीझियै।।६०७।।
निष्ठा रिझवार रीति, कीनी विसतार यह, सुनौ साधुसेवा, हरीदास जू ने करी है।
परदा न सन्त सौं है, देत हैं अनन्त सुख, रह्यौ सुख जानि, भक्तसुता चित धरी है।।
दोऊ मिलि सोवैं रितु, ग्रीषम की छत पर, गात पर गात सोये, सुधि नही परी है।
दातुन के करिवे को, चढ़े निसि शेष आप, चादर उड़ाय, नीचे आये ध्यान हरी है।।६०८।।
जागि परे दोऊ, अरबरे देखि चादर कौं, पेखि पहिचानी सुता, पिता ही की जानी है।
सन्त दृग नये, चले, बैठे मग पग लये, गये लै एकान्त में, यो, विनती बखानी है।।
नेकु सावधान ह्वैकै, कीजिये निशंक काज, दुष्टराज छिद्र पाय, कहैं कटु वानी है।
तुमको जु नांव धरैं, जरै सुनि हियौ मेरौ, डरैं निन्दा आपनी न, होत सुखदानी है।।६०९।।
इतनी जतावनी में, भक्ति कौं कलंक लगै, ऐपे शंक वही, साधु घटती न भाइयै।
भई लाज भारी, विषै बास धोय डारी, नीके जीके दुखरासि, चाहै कहूँ उठि जाइयै।।
निपट मगन किये, नानाविधि सुख दिये, दिये पै न जान, मिलि लालन लड़ाइयै।
गोविन्द अनुज जाके, बाँसुरी कौ साँचोपन, मन में न ल्यायो नृप इहि विधि गाइयै।।६१०।।
(किसी प्रति में यह एक अतिरिक्त छप्पय भी प्राप्त है)
श्रीगोविन्ददासजी
टेक एक वंशी तनी, जन गोविन्द की निर्वही।।
युगलचन्द किरपाल, तासु को दास कहावै।
बादशाह सौं पैज, हुकुम नहिं वेनु बजावै।।
बीकावत बानैत, भक्त पाण्डव अवतारी।
कपि ज्यौं बीरा लियो, सीस अम्बर कै झारी।।

परमधर्म पोषक संन्यायी भक्त) (१६५
पीठ परीक्षित सारका, सभा शाष सन्तन कही।
टेक एक वंशी तनी, जन गोविन्द की निर्वही॥
श्रीकृष्णदासजी
नन्दकुँवर कृष्णदास कौं, निज पग तें नूपुर दियौ॥
तान मान सुर ताल, सुलय सुन्दरि सुठि सोहै।
सुधा अंग भ्रूभंग, गान उपमा को कोहै॥
रत्नाकर संगीत, रागमाला रँगरासी।
रिझये राधालाल, भक्तपद रेनु उपासी॥
स्वर्णकार खरगू सुवन, भक्त भजनपन दृढ़ लियौ।
नन्दकुँवर कृष्णदास कौं, निज पग तें नूपुर दियौ॥१८०॥
कृष्णदास ये सुनार, राधाकृष्ण सुखसार, लियौ सेवा पाछे, नृत्य-गान बिसतारिये।
ह्वै करि मगन काहू, दिन तन सुधि भूली, एक पग नूपुर सो, गिर्यौ न सँभारिये॥
लाल अति रंग भरे, जानी गति भंग भई, पाँय निज खोलि, आप बाँध्यौ सुख भारिये।
फेरि सुधि आई, देखि धारा लै बहाई नैन, कीरति यों छाई, जग भक्ति लागी प्यारिये॥६११॥
परमधर्म पोषक संन्यासी भक्तजी
परमधर्म प्रति पोषकौं, संन्यासी ए मुकुटमनि॥
चित्सुख टीकाकार, भक्ति सर्वोपरि राखी।
श्रीदामोदर तीर्थ, रामअर्चन विधि भाखी॥
चन्द्रोदय हरिभक्ति, नरसिंहारन कीनी।
माधौ मधूसूदन सरस्वती, परमहंस कीरति लीनी॥
प्रबोधानन्द रामभद्र, जगदानन्द कलिजुग्ग धनि।
परमधर्म प्रति पोषकौं, संन्यासी ए मुकुटमनी॥१८१॥

१६६) (श्री भक्तमाल
श्रीप्रबोधानन्दजी
श्रीप्रबोधानन्द बड़े, रसिक आनन्दकन्द, श्रीचैतन्यचन्द्र जू के, पारषद प्यारे हैं।
श्रीराधाकृष्ण कुँजकेलि, निपट नवेिल कही, झेलि रसरूप दोऊ, किये दृग तारे हैं।।
वृन्दावन वास कौ, हुलास लै प्रकास कियौ, दियौ सुखसिन्धु, कर्म धर्म सब टारे हैं।
ताहि सुनि-सुनि कोटि-कोटिजन, रंग पायौ, विपिन सुहायौ बसे, तन मन वारे हैं।।६१२।।
श्रीद्वारकादासजी
अष्टांगयोग तन त्यागियौ, द्वारकादास जानै दुनि।।
सरिता कूकस गाँव, सलिल में ध्यान धर्यौ मन।
राम चरण अनुराग, सुदृढ़ जाके साँचौ पन।।
सुत कलत्र धन धाम, ताहि सौं सदा उदासी।
कठिन मोह कौ फंद, तरकि तोरी कुल फाँसी।।
कील्ह कृपा बल भजन के, ज्ञान खड्ग माया हनी।
अष्टांगयोग तन त्यागियौ, द्वारकादास जानै दुनि।।१८२।।
श्रीपूर्णजी
पूरन प्रगट महिमा अनन्त, करिहै कौन बखान।।
उदै अस्त, परवत गहिर मधि, सरिता भारी।
जोग जुगति विश्वास, तहाँ दृढ़ आसन धारी।।
व्याघ्र सिंघ गुँजैं, खरा कछु शंक न मानै।
अर्द्ध न जातैं पौन, उलटि ऊरध कौं आनै।।
साखि शब्द निर्मल, कहा, कथिया पद निर्वान।
पूरन प्रगट महिमा अनन्त, करिहै कौन बखान।। १८३।।
श्रीलक्ष्मणभट्टजी
श्रीरामानुज पद्धति प्रताप, भट्ट लक्ष्मन अनुसर्यौ।।

श्रीगदाधरदासजी) (१६७
सदाचार मुनिवृत्ति, भजन भागवत उजागर।
भक्तनि सौं अति प्रीति, भक्ति दशधा कौ आगर॥
सन्तोषी सुठि शील, हृदै स्वारथ नहिं लेसी।
परमधर्म प्रतिपाल, सन्त मारग उपदेसी॥
श्रीभागवत बखानिकै, नीर क्षीर विवरन कर्यो।
श्रीरामानुज पद्धति प्रताप, भट्ट लक्षमन अनुसर्यौ॥१८४॥
स्वामी श्रीकृष्णदासजी पयहारी
दधीचि पाछें दूसरि करी, कृष्णदास कलि जीति॥
कृष्णदास कलि जीति, न्यौति नाहर पल दीयौ।
अतिथि धर्म प्रतिपालि, प्रगट जस जग में लीयौ॥
उदासीनता अवधि, कनक कामिनी नहिं रात्यो।
राम चरण मकरन्द, रहत निसिदिन मद मात्यों॥
गल तें गलित, अमित गुण सदाचार सुठि नीति।
दधीचि पाछें दूसरि करी, कृष्णदास कलि जीति॥१८५॥
बैठे हे गुफा में, देखि सिंह द्वार आय गयौ, लयौ यों विचारि, हो अतिथि आज आयौ है।
दई जाँघ काटि, डारि कीजियै अहार अज, महिमा अपार, धर्म कठिन बतायौ है॥
दियौ दरसन आय, साँच में रह्यौ न जाय, निपट सचाई दुख, जान्यौ न बिलायौ है।
अन्न-जल देवे ही कौ, झींखत जगत् नर, करि कौन सकै, जन मन भरमायौ है॥६१३॥
श्रीगदाधरदासजी
भलीभाँति निर्वही भगति, सदा गदाधरदास की॥
लालविहारी जपत, रहत निसिवासर फूल्यौ।
सेवा सहज सनेह, सदा आनन्द रस झूल्यौ॥
भक्तनि सौं अति प्रीति, रीति सबही मन भाई।
आशय अधिक उदार, रसन हरि कीरति गाई॥

१६८) (श्री भक्तमाल
हरि विश्वास हिय आनिकै, सपनेहुँ आन न आस की।
भलीभाँति निर्वही भगति, सदा गदाधरदास की।। १८६।।
बुरहानपुर ढिंग, बाग तामें बैठे आय, करि अनुराग गृह, त्याग पागे स्याम सौं।
गाँव में न जात लोग, किते हा-हा खात सुख, मानि लियौ गात नहीं, काम और काम सौं।।
पर्यौ अति मेह, देह वसन भिजाय डारे, तब हरिप्यारे बोले, स्वर अभिराम सौं।
रहै एक शाह, भक्त कही जाय ल्यावौ उन्हें, मन्दिर करावौ तेरौ, भर्यौ घर दाम सौं।।६१४।।
नीठि-नीठि ल्याये, हरि वचन सुनाये जब, तब करवायौ ऊँचौ, मन्दिर सँवारिकै।
प्रभु पधराये, नाम लाल औ विहारी स्याम, अति अभिराम रूप, रहत निहारिकै।।
करैं साधुसेवा, जामें निपट प्रसन्न होत, बासी न रहत अन्न, सोवैं पात्र झारिकै।
करत रसोई जोई, राखी ही छिपाय सामा, आयै घर सन्त आप, कही जिंवावौ प्यारिकै।।६१५।।
बोल्यौ प्रभु भूखे रहें, ताके लिये राख्यो कछु, भाष्यो तब आप काढौ, भोर और आवैगौ।
करिकै प्रसाद दियौ, लियौ सुख पायौ सबै, सेवा रीति देखि कही, जग जस गावैगौ।।
प्रात भये भूखे हरि, गये तीन जाम ढरि, रहे क्रोध भरि, कहें कब धौं छुटावैगौ।
आयौ कोऊ ताही समैं, दो सत रूपैया धरे, बोले गुरु सीस, लैकै मारौ कितौ मारैगौ।।६१६।।
डर्यौ वह शाह, मति मोपै कछु कोप कियौ, कियौ समाधान सब, बात समुझाई है।
तबतौ प्रसन्न भयौ, अन्न लगै जितौ जितौ, देत सेवासुख लेत, साधु रूचि उपजाई है।।
रहे कोऊ दिन, पुनि मधुपूरी वास लियो, पियौ ब्रजरस लीला, अति सुखदाई है।
लाल लै लड़ाये, सन्त नीके भुगताये गुन, जाने जिते गये मति सुन्दर लगाई है।। ६१७ ।।
श्रीनारायणदासजी
हरिभजन सींव स्वामी सरस, श्रीनारायणदास अति ।।
भक्ति जोग जुत सुदृढ़, देह निज वश करि राखी।
हिये स्वरूपानन्द, लाल जस रसना भाखी ।।
परिचै प्रचुर प्रताप, जानमनि रहस सहायक।
श्रीनारायण प्रगट, मनौ लोगनि सुखदायक ।।
नित सेवत सन्तनि सहित, दाता उत्तर देसगति।
हरिभजन सींव स्वामी सरस, श्रीनारायणदास अति ।। १८७ ।।

श्रीकल्याणजी) (१६६
आये बद्रीनाथ जू तें, मथुरा निहारि नैन, चैन भयौ रहें, जहाँ केसौ जू कौ द्वार है।।
आवैं दरसनी लोग, जूतनि कौ सोग हिये, रूप कौ न भोग, होत कियौ यों विचार है।।
करें रखवारी, सुख पावत हैं भारी, कोऊ जानै न प्रभाव, उर भाव सो अपार है।
आयौ एक दुष्ट, पोट पुष्ट सो तौ सीस दई, लई चले मग, ऐसौ धीरज कौ सार है।।६१८।।
कोऊ बड़ौ नर, देखि मग पहिचानि लिये, किये परनाम भूमि, परि भरि नेह कौ।
जानिकै प्रभाव, पाँव लीने महादुष्ट हूँ नै, कष्ट अति पायो, छूट्यौ अभिमान देह कौ।।
बोले आप चिन्ता जिनि, करौ तेरौ काम होत, नैन नीर सोत, मुख देखौं नही गेह कौ।
भयौ उपदेस, भक्ति देस, उन जान्यौ साधु, शक्ति कौ विशेष, इहाँ जानौ भाव मेह कौ।।६१९।।
श्रीभगवानदासजी
भगवानदास श्रीसहित नित, सुहृद् शील सज्जन सरस ।।
भजन भाव आरूढ़, गूढ़ गुन बलित ललित जस।
श्रोता श्रीभागवत, रहसि ज्ञाता अक्षर रस।।
मथुरापुरी निवास, आस पद सन्तनि इक चित।
श्रीजुत खोजी श्याम, धाम सुखकर अनुचर हित।।
अति गम्भीर सुधीर मति, हुलसत मन जाके दरस।
भगवानदास श्री सहित नित, सुहृद शील सज्जन सरस ॥१८८॥
जानिवे कौं पन, पृथीपति मन आई यों, दुहाई लै दिवाई, माला तिलक न धारियै।
मानि आनि प्रान लोभ, केतिकनि त्याग दिये, छिपे नहीं जात, जानी वेगि मारि डारियै।।
भगवानदास उर, भक्ति सुखरासि भर्यौ, कर्यौ लै सुदेश, देश रीति लागी प्यारियै।
रीझ्यौ नृप, देखि रीझि मथुरा निवास पायौ, मन्दिर करायौ, हरिदेव सौं निहारियै ।। ६२० ।।
श्रीकल्याणदासजी
भक्तपक्ष उद्दारता, यह निवही कल्यान की।।
जगन्नाथ कौ दास, निपुन अति प्रभु मन भायौ।
परम पार्षद समुझि, जानि प्रिय निकट बुलायौ ।।

१७०) (श्री भक्तमाल
प्रान पयानौ करत, नेह रघुपति सौं जोर्यौ।
सुत दारा धन धाम, मोह तिनका ज्यौं तोर्यौ॥
कौंधनी ध्यान उर में बस्यौ, राम नाम मुख जानकी।
भक्तपक्ष उद्दारता, यह निवही कल्यान की॥१८६॥
श्रीसन्तदासजी, श्रीमाधवदासजी
सोदर सोभूराम के, सुनौं सन्त तिनकी कथा॥
सन्तदास सद्वृत्ति, जगत् छोई करि डार्यौ।
महिमा महा प्रवीन, भक्तवित धर्म विचार्यौ॥
बहुर्यो माधवदास, भजन बल परचौ दीनौ।
करि जोगिन सौं वाद, श्वसन पावक प्रति लीनौ॥
परम धर्म विस्तार हित, प्रगट भये नाहिन तथा।
सोदर सोभूराम के, सुनौ सन्त तिनकी कथा॥१६०॥
श्रीजसवन्तजी
बूड़िये विदित कन्हर कृपाल, आत्माराम आगम दरसि॥
कृष्ण भक्ति को थम्भ, ब्रह्मकुल परम उजागर।
क्षमा शील गम्भीर, सर्व लच्छन कौ आगर॥
सर्वसु हरिजन जानि, हृदै अनुराग प्रकासै।
असन वसन सनमान, करत अति उज्ज्वल आसै॥
सोभूराम प्रसाद तें, कृपादृष्टि सब पर बरसि।
बूड़िये विदित कन्हर कृपाल, आत्माराम आगम दरसि॥१६१॥
श्रीगोविन्ददासजी ''भक्तमाली''
भक्तरत्न माला सुधन, गोविन्द कण्ठ विकास किय॥

श्रीगिरिधरग्वालजी) (१७१
रुचिर शील घन नील, लील रुचि सुमति सरित पति।
विविध भक्त, अनुरक्त व्यक्त, बहु चरित चतुर अति।
लघु दीरघ सुर, शुद्ध वचन अविरुद्ध उचारन।
विश्व वास विश्वास, दास परिचय विस्तारन।।
जानि जगत् हित सब गुननि, सु सम नारायनदास दिय।
भक्तरत्न माला सुधन, गोविन्द कण्ठ विकास किय।। १६२ ।।
श्रीजगत्सिंहजी
भक्तेश भक्त भवतोष कर, सन्त नृपति वासो कुँवर।।
श्रीयुत् नृप मनि जगत्सिंह, दृढ़भक्ति परायन।
परम प्रीति किये सुवश, शील लक्ष्मी नारायन।।
जासु सुजस सहज ही कुटिल, कलि कल्प जु घायक।
आज्ञा अटल सुप्रगट, सुभट कटकनि सुखदायक।।
अति प्रचण्ड मारतण्ड सम, तम खण्डन दोरदण्ड वर।
भक्तेश भक्त भवतोष कर, सन्त नृपति वासो कुँवर।। १६३।।
जगता कौ तन, मन, सेवा श्रीनारायन जू भयौ ऐसौ परायन रहै डोला संग ही।
लरिवे कौं चलै आगे, आगै सदा पाछै रहै, ल्यावै जल सीस, ईश भर्यौ हियौ रंग ही।।
सुनि जसवन्त, जयसिंह कै हुलास भयौ, देख्यौ दिल्ली माँझ, नीर ल्यावत अभंग ही।
भूमि परि विनै, करी, धरी देह तुम्हहिं नै, जातै पायौ नेह, भींजि गये यों प्रसंग ही।। ६२१।।
नृपति जयसिंह जू सौं, बोल्यौ कहा नेह मेरे? तेरे जो बहिन, ताकी गन्ध को न पाऊँ मैं।
नाम दीपकुँवरि, सो बड़ी भक्तिमान् जानि, वह रसखानि ऐपै, कछुक लड़ाऊँ मैं।।
सुनि सुख भयौ भारी, हुती रिस वासौं टारी, लिये गाँव काढ़ि, फेरि दिये हरि ध्याऊँ मैं।
लिखिकै पठाई बाई, करैं सो करन दीजै, लीजै साधुसेवा करि, निसिदिन गाऊँ मैं।। ६२२।।
श्रीगिरिधरग्वालजी
गिरिधरन ग्वाल गोपाल कौं सखा साँचलौ संग कौ।।

१७२) (श्री भक्तमाल
प्रेमी भक्त प्रसिद्ध, गान अति गद्गद वानी।
अन्तर प्रभु सौं प्रीति, प्रगट रहै नाहिन छानी॥
नृत्य करत आमोद, विपिन तन वसन बिसारै।
हाटक पट हित दान, रीझि तत्काल उतारै॥
मालपुरै मंगल करन, रास रच्यौ रसरंग कौ।
गिरिधरन ग्वाल गोपाल कौं, सखा साँचलो संग कौ।। १६४।।
गिरिधर ग्वाल साधुसेवा ही कौ ख्याल जाके, देखि यों निहाल होत, प्रीति साँची पाई है।
सन्त तन छूटेहूँ ते, लेत चरनामृत जो, और अब रीति कहौ, कापै जात गाई है।।
भये द्विज पंच, इकठौरे सो प्रपंच मान्यो, आन्यो सभा माँझ, कहें छोड़ौ न सुहाई है।
जाके हो अभाव, मत लेवौ मैं प्रभाव जानौ, मृतक यों बुद्धि ताकौ, वारो सुनि भाई है।। ६२३।।
श्रीगोपालीजी
गोपाली जनपोषकौं, जगत् जसोदा अवतरी।।
प्रगट अंग में प्रेम, नेम सौं मोहन सेवा।
कलियुग कलुष न लग्यौ, दास तें कबहुँ न छेवा।।
वानी सीतल सुखद, सहज गोविन्द धुनि लागी।
लक्षन कला गँभीर, धीर सन्तनि अनुरागी।।
अन्तर शुद्ध सदाँ रहै, रसिक भक्ति निज उर धरी।
गोपाली जनपोषकौं, जगत् जसोदा अवतरी।। १६५।।
श्रीरामदासजी
श्रीरामदास रसरीति सौं, भलीभाँति सेवत भगत।।
सीतल परम सुशील, वचन कोमल मुख निकसै
भक्त उदित रवि देखि, हृदै बारिज जिमि विकसै।।

श्रीभगवन्तमुदितजी) (१७३
अति आनन्द मन उमँगि, सन्त परिचर्या करई।
चरण धोय दण्डौत, विविध भोजन विस्तरई॥
बछवन निवास विस्वास हरि, जुगल चरण उर जगमगत।
श्रीरामदास रसरीति सौं, भलीभाँति सेवत भगत॥ १६६॥
सुनि एक साधु आयौ, भक्तिभाव देखिवे कौं, बैठें रामदास पूछै, रामदास कौन है।
उठै आप, धोये पाँव, आवै रामदास अब, रामदास कहाँ? मेरे चाह और गौन है॥
चलौ जू प्रसाद लीजै, दीजै रामदास आनि, यही रामदास, पग धारौ निज भौन है।
लपटानौ पाँयनि सौं, चायनि समात नाहिं, भायनि सौं भयौ हिये, छाई जस जौन्ह है॥६२४॥
बेटी कौ विवाह घर, बड़ौ उतसाह भयौ, किये पकवान नाना, कोठे माँझ धरे हैं।
करैं रखवारी सुत, नाती दिये तारौ रहें, और ही लगाई तारी, खोल्यौ नहीं डरे हैं॥
आये गृह सन्त, तिन्हें पोट बँधवाय दई, पायौ यों अनन्त सुख, ऐसे भाव भरे हैं।
सेवा श्रीविहारीलाल, गाई पाक शुद्धताई, मेरे मनभाई सब साधु उर हरे हैं॥६२५॥
मास परायण उन्तीसवाँ विश्राम
श्रीरामरायजी
विप्र सारसुत घर जनम, रामराय हरि रति करी॥
भक्ति ज्ञान वैराग, जोग अन्तरगति पाग्यौ।
काम क्रोध मद लोभ, मोह मत्सर सब त्याग्यौ॥
कथा कीरतन मगन, सदा आनन्द रस झूल्यौ।
सन्त निरखि मन मुदित, उदित रवि पंकज फूल्यौ॥
बैर भाव जिन द्रोह किय, तासु पाग खसि भ्वैं परी।
विप्र सारसुत घर जनम, रामराय हरि रति करी॥१६७॥
श्रीभगवन्तमुदितजी
भगवन्तमुदित उदार जस, रस रसना आस्वाद किय॥

१७४) (श्री भक्तमाल
कुँजविहारी केलि, सदा अभ्यन्तर भासैं।
दम्पति सहज सनेह, प्रीति परमिति परकासै ॥
अननि भजन रसरीति, पुष्ट मारग करि देखी।
विधि निषेध बल त्यागि, पागि रति हृदय विशेखी ॥
माधव सुत सम्मत रसिक, तिलक दाम धरि सेव लिय।
भगवन्तमुदित उदार जस, रस रसना आस्वाद किय ॥ १६८ ॥
सूजा के दिवान, भगवन्त रसवन्त भये, वृन्दावन-वासिन की, सेवा ऐसी करी है।
विप्र कै गुसाँई, साधु कोई ब्रजवासी जाहु, देत बहु धन, एक प्रीति मति हरी है।।
सुनी गुरूदेव, अधिकारी श्रीगोविन्ददेव, नाम हरिदास जाय, देखें चित धरी है।
योग्यताई सीवाँ, प्रभु दूध-भात माँणि लियौ, कियौ उतसाह तऊ, पेखैं अरबरी है ।। ६२६ ।।
सुनी गुरु आवत, अमावत न किहूँ अंग, रंग भरि तिया सौ यों, कही कहा कीजिये।
बोली घरबार पट, सम्पति भण्डार सब, भेट करि दीजै, एक धोती धारी लीजिये।।
रीझे सुनि वानी, साँची भक्ति तैं ही जानी मेरे, अति मनमानी कहि, आँखैं जल भीजिये।
यही बात, परी कान, श्रीगुसाँई लई जान, आये फिरे वृन्दावन, पन मति धीजिये ।। ६२७ ।।
रह्यौ उतसाह, उर दाह कौ न पारावार, कियौ लै विचार आज्ञा माँगि वन आये हैं।
रहे सुख लहे, नाना पद रचि कहे, एकरस निर्वहे, ब्रजवासी जा छुटाये हैं।।
कीनी घर चोरी, तऊ नेकु नासा मोरी नाहिं, बोरी मति रंग, लाल प्यारी दृग छाये हैं।
बड़े बड़भागी, अनुरागी रति जागी जग, माधव रसिक बात, सुनौ पिता पाये हैं।। ६२८ ।।
आयौ अन्तकाल जानि, बेसुधि पिछानि सब आगरे तें लै कै चले, वृन्दावन जाइयै।
आये आधी दूर, सुधि आई बोले चूर ह्वैकै, कहाँ लिये जात कूर? कही जोई ध्याइयै ।।
कह्यौ फेरो तन, वन जाइवे कौ पात्र नाहीं, जरै बास आवै, प्रिया पिय को न भाइयै।
जानहारौ होई सोई, जायगौ जुगल पास, ऐसे भावरासि, ताही ठौर चलि आइयै ।। ६२६ ।।
श्रीलालमतीजी
दुर्लभ मानुष देह कौ, लालमती लाहौ लियौ ॥

श्रीलालमतीजी) (१७५
गौर स्याम सौं प्रीति, प्रीति जमुना कुँजनि सौं।
वंशीवट सौं प्रीति, प्रीति ब्रजरज पुंजनि सौं॥
गोकुल गुरुजन प्रीति, प्रीति घन बारह वन सौं।
पुर मथुरा सौं प्रीति, प्रीति गिरि गोवर्द्धन सौं॥
वास अटल वृन्दाविपिन, दृढ़करि सो नागरि कियौ।
दुर्लभ मानुष देह कौ, लालमती लाहौ लियौ॥ १६६॥
भक्त-परत्व
कविजन करत विचार, बड़ौ कोउ ताहि भनिज्‍जै।
कोउ कह अवनी बड़ी, जगत आधार फनिज्‍जै॥
सो धारी सिर शेष, शेष शिव भूषन कीनौ।
शिव आसन कैलास, भुजा भरी रावन लीनौ॥
रावन जीत्यौ बालि, बालि राघो इक सायक दँड़े।
''अगर'' कहैं त्रैलोक में, हरि उर धरें तेई बड़ै॥ २००॥
हरि सुजस प्रीति हरिदास कैं, त्यौ भावै हरिदास जस॥
नेह परसपर अघट, निबहि चारों जुग आयौ।
अनुचर कौ उत्कर्ष, स्याम अपने मुख गायौ॥
ओत-प्रोत अनुराग, प्रीति सबही जग जानें।
पुर प्रवेश रघुवीर, भृत्य कीरति जु बखानैं॥
''अगर'' अनुग गुन बरनते, सीतापति नित होयँ बस।
हरि सुजस प्रीति हरिदास कैं, त्यौ भावै हरिदास जस॥२०१॥
सन्त-उत्कर्ष
उत्कर्ष सुनत सन्तनि कौं, अचरज कोऊ जिनि करौ॥