सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 195 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 189

१७४) (श्री भक्तमाल
कुँजविहारी केलि, सदा अभ्यन्तर भासैं।
दम्पति सहज सनेह, प्रीति परमिति परकासै ॥
अननि भजन रसरीति, पुष्ट मारग करि देखी।
विधि निषेध बल त्यागि, पागि रति हृदय विशेखी ॥
माधव सुत सम्मत रसिक, तिलक दाम धरि सेव लिय।
भगवन्तमुदित उदार जस, रस रसना आस्वाद किय ॥ १६८ ॥
सूजा के दिवान, भगवन्त रसवन्त भये, वृन्दावन-वासिन की, सेवा ऐसी करी है।
विप्र कै गुसाँई, साधु कोई ब्रजवासी जाहु, देत बहु धन, एक प्रीति मति हरी है।।
सुनी गुरूदेव, अधिकारी श्रीगोविन्ददेव, नाम हरिदास जाय, देखें चित धरी है।
योग्यताई सीवाँ, प्रभु दूध-भात माँणि लियौ, कियौ उतसाह तऊ, पेखैं अरबरी है ।। ६२६ ।।
सुनी गुरु आवत, अमावत न किहूँ अंग, रंग भरि तिया सौ यों, कही कहा कीजिये।
बोली घरबार पट, सम्पति भण्डार सब, भेट करि दीजै, एक धोती धारी लीजिये।।
रीझे सुनि वानी, साँची भक्ति तैं ही जानी मेरे, अति मनमानी कहि, आँखैं जल भीजिये।
यही बात, परी कान, श्रीगुसाँई लई जान, आये फिरे वृन्दावन, पन मति धीजिये ।। ६२७ ।।
रह्यौ उतसाह, उर दाह कौ न पारावार, कियौ लै विचार आज्ञा माँगि वन आये हैं।
रहे सुख लहे, नाना पद रचि कहे, एकरस निर्वहे, ब्रजवासी जा छुटाये हैं।।
कीनी घर चोरी, तऊ नेकु नासा मोरी नाहिं, बोरी मति रंग, लाल प्यारी दृग छाये हैं।
बड़े बड़भागी, अनुरागी रति जागी जग, माधव रसिक बात, सुनौ पिता पाये हैं।। ६२८ ।।
आयौ अन्तकाल जानि, बेसुधि पिछानि सब आगरे तें लै कै चले, वृन्दावन जाइयै।
आये आधी दूर, सुधि आई बोले चूर ह्वैकै, कहाँ लिये जात कूर? कही जोई ध्याइयै ।।
कह्यौ फेरो तन, वन जाइवे कौ पात्र नाहीं, जरै बास आवै, प्रिया पिय को न भाइयै।
जानहारौ होई सोई, जायगौ जुगल पास, ऐसे भावरासि, ताही ठौर चलि आइयै ।। ६२६ ।।
श्रीलालमतीजी
दुर्लभ मानुष देह कौ, लालमती लाहौ लियौ ॥