सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 195 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 183

१६८) (श्री भक्तमाल
हरि विश्वास हिय आनिकै, सपनेहुँ आन न आस की।
भलीभाँति निर्वही भगति, सदा गदाधरदास की।। १८६।।
बुरहानपुर ढिंग, बाग तामें बैठे आय, करि अनुराग गृह, त्याग पागे स्याम सौं।
गाँव में न जात लोग, किते हा-हा खात सुख, मानि लियौ गात नहीं, काम और काम सौं।।
पर्यौ अति मेह, देह वसन भिजाय डारे, तब हरिप्यारे बोले, स्वर अभिराम सौं।
रहै एक शाह, भक्त कही जाय ल्यावौ उन्हें, मन्दिर करावौ तेरौ, भर्यौ घर दाम सौं।।६१४।।
नीठि-नीठि ल्याये, हरि वचन सुनाये जब, तब करवायौ ऊँचौ, मन्दिर सँवारिकै।
प्रभु पधराये, नाम लाल औ विहारी स्याम, अति अभिराम रूप, रहत निहारिकै।।
करैं साधुसेवा, जामें निपट प्रसन्न होत, बासी न रहत अन्न, सोवैं पात्र झारिकै।
करत रसोई जोई, राखी ही छिपाय सामा, आयै घर सन्त आप, कही जिंवावौ प्यारिकै।।६१५।।
बोल्यौ प्रभु भूखे रहें, ताके लिये राख्यो कछु, भाष्यो तब आप काढौ, भोर और आवैगौ।
करिकै प्रसाद दियौ, लियौ सुख पायौ सबै, सेवा रीति देखि कही, जग जस गावैगौ।।
प्रात भये भूखे हरि, गये तीन जाम ढरि, रहे क्रोध भरि, कहें कब धौं छुटावैगौ।
आयौ कोऊ ताही समैं, दो सत रूपैया धरे, बोले गुरु सीस, लैकै मारौ कितौ मारैगौ।।६१६।।
डर्यौ वह शाह, मति मोपै कछु कोप कियौ, कियौ समाधान सब, बात समुझाई है।
तबतौ प्रसन्न भयौ, अन्न लगै जितौ जितौ, देत सेवासुख लेत, साधु रूचि उपजाई है।।
रहे कोऊ दिन, पुनि मधुपूरी वास लियो, पियौ ब्रजरस लीला, अति सुखदाई है।
लाल लै लड़ाये, सन्त नीके भुगताये गुन, जाने जिते गये मति सुन्दर लगाई है।। ६१७ ।।
श्रीनारायणदासजी
हरिभजन सींव स्वामी सरस, श्रीनारायणदास अति ।।
भक्ति जोग जुत सुदृढ़, देह निज वश करि राखी।
हिये स्वरूपानन्द, लाल जस रसना भाखी ।।
परिचै प्रचुर प्रताप, जानमनि रहस सहायक।
श्रीनारायण प्रगट, मनौ लोगनि सुखदायक ।।
नित सेवत सन्तनि सहित, दाता उत्तर देसगति।
हरिभजन सींव स्वामी सरस, श्रीनारायणदास अति ।। १८७ ।।