श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८) (श्री भक्तमाल
जोपै अन्धकार ही मैं, चलौं तो बिगार होत, चले यों विचारि, नीच छुवै न सुहाइयै।
निकसत द्वार, जब देख्यौ सुकुमार एक, हाथ में मशाल याके, पाछे चले जाइयै॥५६४॥
जानी यहै बात, पहुँचाये कहूँ जात यह, अबहीं विलात भले, चैन कोऊ घरी है।
जमुना लौं आयौ, अचरज सो लगायौ मन, तन अन्हवायौ मति, वाही रूप हरी है॥
घट भरि धर्यौ सीस, पट वह आय गयौ, आय गयौ घर, नहीं देखी कहा करी है।
लागी चटपटी-अटपटी न समझि परै, भटभटी भई नई, नैन नीर झरी है॥५६५॥
कथा ऐसी कहैं, जामें गहैं मन भाव भरैं, करैं कृपादृष्टि, दुष्टजन दुख पायौ है।
जायकै सिखायौ, बादशाह उर दाह भयौ, कही तिया भली को, समूह घर छायौ है॥
आये चोबदार कहैं, चलौं एही बार वारि, झारी प्रभु आगे धर्यौ, चाहै शोर लायौ है।
चले तब संग, गये पूछे नृप रंग कहा?, तियनि प्रसंग करौ?, कहिकै सुनायौ है॥५६६॥
कान्ह भगवान् ही की, बात सो बखानि कहौं, आनि बैठैं नारी-नर, लागी कथा प्यारी है।
काहू कौं बिडारैं, झिरकारैं नेकु टारैं, विषैदृष्टि कै निहारैं, ताकौं लागै दोष भारी है॥
कही तुम भली, तेरी गली ही के लोग मोसौँ, आयकै जताई वह, रीति कछु न्यारी है।
बोल्यौ याहि राखौ सब, करौं निरधार नीके, चलै चोबदार लैके, रोके प्रभु धारी है॥५६७॥
सोयौ बादशाह निसि, आयकै सुपन दियौ, कियौ वाकौ इष्टभेष, कही प्यास लागी है।
पीवौ जल कही, आबखाने लै बखाने तब, अति ही रिसाने, को पियावै कोऊ रागी है॥
फेर मारी लात, अरे सुनी नहीं बात मेरी, आप फुरमावै जोई, प्यावै बड़भागी है।
सो तौ तैं कैद कर्यौ, सुनि अरबर्यो डर्यौ, भर्यौ हिये भाव, मति, सोवत तें जागी है॥५६८॥
दौरे नर ताही समै, वेगि दै लिवाय ल्याये, देखि लपटाये पाँय, नृप दृग भीजे हैं।
साहिब तिसाये जाय, अबही पियावौ नीर, और पै न पीवैं, एक तुमही पै रीझे हैं॥
लेवौ देश गाँव सदा, पांव हीं सो लग्यौ रहौं, गहौं नहीं नेकु, धन पाय बहु छीजे हैं।
संग दै मशाल, ताही काल में पठाये यों, कपाट जाल खुले, लाल प्यायो जल धीजे हैं॥५६६॥
श्रीराघवदासजी दूबलो
दूबरो जाहि दुनियाँ कहै, सो भक्त भजन मोटौ महन्त॥
सदाचार गुरु शिष्य, त्याग विधि प्रगट दिखाई।
बाहर भीतर विशद्, लगी नहिं कलियुग काई॥