श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीतत्वाजी, श्रीजीवाजी) (७६
श्रीनरहरियानन्दजी
निपट नरहरियानन्द कौ, करदाता दुर्गा भई॥
घर झर लकरी नाहिं, शक्ति कौ सदन उदारैं।
शक्ति भक्त सौं बोलि, दिनहिं प्रति बरही डारैं॥
लगी परोसी हौंस, भवानी भैंसो मारैं।
बदले की बेगारि, मूँड़ वाके सिर डारैं॥
भरत प्रसंग ज्यौं कालिका, लडू देखि तन में तई।
निपट नरहरियानन्द कौ करदाता दुर्गा भई॥ ६७॥
श्रीपद्मनाभजी
कबीर कृपा तें परमतत्त्व, पद्मनाभ परचौ लह्यौ॥
नाम महानिधि मन्त्र, नाम ही सेवा पूजा।
जप तप तीरथ नाम, नाम बिन और न दूजा॥
नाम प्रीति नाम बैर, नाम कहि नामी बोलै।
नाम अजामिल साखि, नाम बन्धन तें खोलै॥
नाम अधिक रघुनाथ तें, राम निकट हनुमत् कह्यौ।
कबीर कृपा तें परमतत्त्व पद्मनाभ परचौ लह्यौ॥ ६८॥
काशीवासी साहु भयो कोढ़ी सो निवाह कैसे, परि गये कृमि चल्यौ बूड़िवे को भीर है।
निकसे पद्म आय पूछि ढिंग जाय कही, गही देह खोलौ गुन न्हाय गंगा नीर है॥
राम-नाम कहै बेर तीन में नवीन होत, भयौई नवीन कियौ भक्त मति धीर है।
गयौ गुरु पास तुम महिमा न जानी अहो ! नामाभास काम करै कही यों कबीर है॥ ३११॥
श्रीतत्वाजी, श्रीजीवाजी
तत्वा जीवा दक्षिण देश, वंशोद्धर राजत विदित॥
भक्ति सुधा जल समुद्र, भये बेलावलि गाढ़ी।
पूरवजा ज्यौं रीति, प्रीति उत्तरोत्तर बाढ़ी॥