श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ, मंगलाचरण व भक्त-माहात्म्य
[पृष्ठ भाग]
श्री मज्जगद्गुरु द्वाराचार्य श्री मलूकपीठाधीश्वर
श्री राजेन्द्र दास देवाचार्य
[ग्रन्थ-मेरुदण्ड (Spine)]
श्रीभक्तमाल
[मुख्य पृष्ठ]
श्रीमद्भगवद्भक्तेभ्यो नमः
श्रीमद्गोस्वामी श्रीनाभाजी कृत
श्रीभक्तमाल
वैष्णवरत्न श्री प्रियादासजी कृत
(भक्तिरसबोधिनी टीका सहित)
श्री मलूक ग्रन्थागार
श्री मलूकपीठ, वंशीवट - श्रीधाम वृन्दावन
॥ श्रीमद्भागवद्भक्तेभ्यो नमः ॥
श्रीमद्गोस्वामी श्रीनाभाजी कृत
श्रीभक्तमाल
वैष्णवरत्न श्रीप्रियादास जी कृत
(भक्तिरसबोधिनी टीका सहित)
लाख बार हरि हरि कहै एक बार हरिदास।
श्री सीताराम प्रसन्न हों भाखैनाभादास ॥
सम्पादक :
जगद्गुरु द्वाराचार्य श्री मलूकपीठाधीश्वर श्री राजेन्द्रदास देवाचार्य
प्रकाशक :
श्री मलूक ग्रन्थागार
श्री मलूक पीठ, वंशीवट, श्रीधाम वृन्दावन
मूल्य :
सम्पादक : जगद्गुरु द्वाराचार्य श्री मलूकपीठाधीश्वर
श्री राजेन्द्र दास देवाचार्य जी
प्रकाशक : श्री मलूकपीठ ग्रंथागार
श्री मलूकपीठ, वंशीवट, श्रीधाम वृन्दावन
तिथि : ऋषि पंचमी सम्वत् २०७४
संस्करण : द्वितिय
संख्या : ११००
मूल्य :
प्राप्ति स्थल : (1) श्री मलूक ग्रंथागार,
श्री मलूकपीठ, वंशीवट, श्रीधाम वृन्दावन
प्रिन्टर्स : शिवा प्रिंटेक (प्रा. लि.)
बवाना, दिल्ली
भूमिका
सनातन धर्म की अविच्छिन्न धारा प्राचीन काल से आज तक प्रवाहित हो रही है। भगवान कृष्ण द्वैपायन
वेदव्यास जी ने अवतार लेकर कालक्रम से धारणा शक्ति के क्षीण हो जाने पर, सौलभ्य की दृष्टि से एक वेद की
चार संहितायें कीं। वेद के अंतिम भाग वेदान्त रूप उपनिषदों का अभिप्राय समझने को ब्रह्मसूत्र की रचना की, जन
साधारण को वेदों का अभिप्राय समझाने तथा पुरूषार्थ चतुष्टय की सिद्धि के लिए महाभारत की रचना की।
महाभारत की रचना करने पर भी उन्हें अपने अवतार प्रयोजन की सिद्धि, या कृतार्थता का अनुभव नहीं हो रहा था,
तब देवर्षि नारद ने आकर श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना को प्रेरित किया। श्रीमद्भागवत की रचना करके
व्यास जी को कृतार्थता या शान्ति प्राप्त हुई। वास्तव में महापुरुषों के अवतार का प्रयोजन विश्वकल्याण होता है।
श्रीमद्भागवत में प्रोज्झित कैतव परम धर्म अर्थात् निष्काम प्रेमाभक्ति का वर्णन है जिसके आश्रय लेने से
"सद्योहृद्यवरुद्ध्येतेत्रकृतिभिः" अर्थात् श्रवण की उत्कण्ठा मात्र से भगवान हृदय में अवरुद्ध हो जाते है। भगवत्
प्राप्ति ही मानव जीवन का परम प्रयोजन है। भगवान शुकदेव निर्गुण उपासना में परिनिष्ठित थे, फिर भी वे व्यास
शिष्यों से 'बर्हापीडं नटवर वपुः' श्लोक सुनकर रूपमाधुरी और "अहोबकीयं" श्लोक से भगवान की उदारता को
सुनकर 'उत्तमश्लोक लीलया गृहीत चेता' भगवान वेदव्यास के पास आये और परमहंस संहिता का अध्ययन
किया-
हरेर्गुणाऽक्षिप्तमतिर्भगवान्बादरायणिः। अध्यगान्महदाख्यानं नित्यं विष्णुजनप्रियः॥
श्रीमद्भागवत का परम प्रयोजन ब्रह्माजी ने भी नारदजी को उपदेश करते समय यही बताया है-
यथा हरौ भगवते नृणां भक्तिर्भविष्यति। सर्वात्मन्यखिलाधारे इति संकल्प्य वर्णय।।
अतः नारदजी ने गेहे-गेहे जने-जने भक्ति की स्थापना की प्रतिज्ञा की। स्वयं ब्रह्माजी ही उस परम्
प्रयोजन की सिद्धि के लिये अवतरित हुए। बाल्मीकि जी भी उसी प्रयोजन के लिए अवतरित हुए - कलि कुटिल
जीव निस्तार हित वाल्मीक तुलसी भयौ। उसी प्रयोजन से आचार्यों का अवतरण हुआ। उन्होनें उपनिषद् ब्रह्मसूत्र
गीता पर अपने अपने भाष्य लिखकर अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि के द्वारा ब्रह्म जीव माया के स्वरूप
का निर्वचन किया। इन आचार्यों ने अनीश्वरवादी बौद्ध और जैन के प्रभाव से पथभ्रष्ट जनता का मार्ग दर्शनकर
संरक्षण किया।
कालान्तर में पश्चिम से मुगलों के आक्रमणों और उनके शासन से सनातन धर्म अत्याधिक बाधित हुआ।
तब करुणावरुणालय सनातन धर्म के स्वरूप भगवान ने चैतन्य महाप्रभु, श्री कबीरदास, श्री तुलसीदास, श्री
सूरदास, श्री मीराबाई, श्री नाभादास आदि भक्तों को भेजकर संकटग्रस्त भारतीय जनता को अवलम्बन दिया।
मुगलकाल में समाज के पथ दर्शक भी मुगलों के उत्पीड़न और प्रलोभन से प्रभावित हुये और उनके अनुसरण से
जन साधारण भी प्रभावित हुआ। समाज में अनेक मनसुख सम्प्रदाय प्रगट हो गये। लोग उनका अनुसरण कर
हिंसा का समर्थन करने लगे।
यद् यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनाः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्त दनुवर्तते।।
तत्वनिष्ठ महापुरुषों के मर्यादा उल्लंघन को जन सामान्य कैसे समझ सकता है।
त्वत्पादपद्ममकरन्दजुषां मुनीनां, वर्त्मास्फुटं नृपशुभिर्ननु दुर्विभाव्यम्
इसी प्रेमपथ के रहस्य को सोदाहरण समझाने के लिये ही श्री नाभा गोस्वामी जी द्वारा भक्तमाल का
अवतरण हुआ। श्री नाभा गोस्वामी जी ने वेदों का गाभा अर्थात् सार सर्वस्व भक्तभक्ति भगवन्त गुरु चतुर नाम वपु
एक के द्वैत, अद्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत से अविरुद्ध, सार्वभौम का सद्यः कल्याण कारक “भक्त भक्ति भगवन्त
गुरु" के चतुष्टय का सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इस प्रकार “सबहिं सुलभ सब दिन सब देशा, सेवत सादर शमन
कलेशा” भक्त की उपासना रूप भागवत के परम-प्रयोजन को सिद्ध किया।
वस्तुतः भागवत भक्तमाल ही है। दोनों का प्रयोजन एक है। आपद्ग्रस्त सनातन धर्म की जैसे तुलसीदास
जी ने रामचरितमानस रचकर रक्षा की उसी प्रकार से सम्प्रदायों के बहुरूपों को एकता की डोरी में बाँधकर नाभा
गोस्वामी जी ने किया। भक्तमाल महद् आकाश की ज्योत्स्ना में तारागणों के बीच विराजमान पूर्णचन्द्र श्री कृष्ण
चन्द्र की शोभा संसार से पाप ताप का हरण कर रही है। भारतीय संस्कृति के प्राचीन काल से आज तक के स्वरूप
का दिग्दर्शन कराने वाली भक्तमाल भारतीय संस्कृति का महाकोष है। उसकी उपादेयता आज की परिस्थितियों
में और अधिक बढ़ गयी हैं, क्योंकि प्राचीन काल के समर्थ महापुरुषों का अनुकरण करना आज के असमर्थ
साधकों को भले ही दुरुह हो पर भक्तमाल में आधुनिक, हमारे ही समान परिस्थितियों में रहने वाले भक्तों के
चरित्रों का परम प्रयोजन जीवन में सुख शान्ति लाभपूर्वक परमात्मा की प्राप्ति है जो भक्ति से ही सम्भव है। उसके
गूढ़ रहस्य को बिना भक्तमाल का आश्रय लिये नहीं समझा जा सकता। बिना भक्तमाल भक्ति रूप अति दूर है।
यह भक्ति के रहस्य भक्तों के चरित्र से समझे जा सकते हैं। भगवान गीता में “तदात्मानं सृजाम्यहम्" कह कर
आत्मानम् पद से अपने प्यारे भक्तों का संकेत करते हैं। भगवत प्राप्ति के सम्पूर्ण साधनों में भगवद् भक्ति
सर्वाधिक सरल और उत्तम साधन है और उसकी सिद्धि श्री नाभागोस्वामी रचित श्री भक्तमाल के पठन, श्रवण,
मनन से ही संभव है। इसमें नवधा, दशधा, प्रेमा, परा आदि भक्ति के स्वरूपों का ज्ञान, वैराग्य, तप, त्याग, शील,
सदाचार, सत्य, अहिंसा, क्षमा, दया, समानता, अमानता आदि सद्गुणों का भक्तों की रहनी, सहनी, कहनी,
भगवान के प्रति उनके दिव्य भाव एवं निष्ठा का सविशेष वर्णन हुआ है। साथ ही भगवान की भक्तवत्सलता,
भक्तप्रियता, दयालुता, शौशील्य और भक्त सौलभ्य आदि गुणों का अति सुन्दर वर्णन है। विशेष रूप से भक्त
परत्व का युक्तियुक्त वर्णन है। अतः धार्मिक, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, साहित्यिक सभी दृष्टियों से श्री
भक्तमाल अनूठा ग्रन्थरत्न है।
भक्तमाल के रचियता श्री नाभा जी का जन्म माघ सुदी पंचमी विक्रम संवत १५८७ के लगभग हुआ।
बाल्यकाल में ही आप श्री रामानन्दाचार्य परम्परा के श्री अग्रदेवाचार्य जी महाराज के कृपाभाजन हुये। जन्मान्ध
बालक नारायणदास को सर्वप्रथम गुरुदेव का ही दर्शन हुआ।
गुरुस्थान गलताजी में, गुरु आज्ञा से सन्त सेवा करते-करते, उनका उच्छिष्ट प्रसाद पाकर आपको
दिव्य दृष्टि की प्राप्ति हो गयी। जिससे आप गुरुदेव की मानसी सेवा का दर्शन और भक्त के डूबते हुये जहाज को
बचाने में समर्थ हुए। उसी समय श्री अग्रदेवाचार्य जी ने इन्हें समर्थ जानकर भक्तों के सुयश वर्णन करने की आज्ञा
और आशीर्वाद दिया। तदनुसार आपने समाधिस्थ होकर भक्त चरित्रों का दर्शनकर भक्तमाल की रचना की।
भक्तमाल समाधिवाणी है अतः इसके छप्पय में गागर में सागर भरा है। उसकी सांकेतिक भाषा को समझना सहज
नहीं था। अतः श्री नाभाजी ने अपने साकेत गमन के लगभग सौ वर्ष बाद श्री प्रियादास जी को दर्शन देकर श्री
भक्तमाल पर छन्दोबद्ध टीका करने की आज्ञा दी। तदनुसार आपने मनहरण कवित्त छन्दों में भक्तिरस बोधिनी
नाम की टीका की, जो यथार्थ में भक्तिरस का बोध कराती है। श्री प्रियादास जी के गुरुदेव श्रीमन्मोहरदासजी
महाराज थे। आप श्री राधा रमण लाल जी के प्राकट्यकर्ता श्रीमद् गोपालभट्ट जी के चरणाश्रित श्रीनिवासाचार्य जी
के शिष्य थे।
श्री भक्तमाल जी की टीका के सम्बन्ध में स्वयं प्रियादासजी ने कहा है "टीका अरु भूल नाम मूल जात
सुनै जब"। उन्होंने स्वयं को टीकाकार नहीं माना है “नाभा जू कहाई याते प्रौढ़ि के सुनाई है।” पुनः “नाभाजू कौ
अभिलाष पूरन लै कियौ मैं तौ" वस्तुतः “टीका को चमत्कार जानौगे विचार मन" अर्थात् प्रियादास जी की
भक्तिरसबोधिनी टीका अपने वैशिष्ट्य के कारण भक्तमाल का अभिन्न अंग बन गई है। अतः श्री नाभा जी के
छप्पय तथा प्रियादास जी के मनहरन कवित्त दोनों को मिला कर भक्तमाल संज्ञा हुई है।
श्री भक्तमाल जी के मूल में १७ दोहे एवं १९७ छप्पय कुल २१४ छन्द है। भक्तिरसबोधिनी टीका के
कवित्तों की संख्या ६३४ है। कुछ विद्वानों के मत मे एकाध छन्द प्रक्षिप्त है।
श्रीभक्तमाल जी का अध्ययन, अध्यापन, समाजगायन कार्य श्री अयोध्या एवं श्री वृन्दावन में विशेष रूप से
होता है। श्री टोपी कुंज वृन्दावन के बाबा श्री माधवदास जी "भक्तमाली" से अधिकांश भक्तिमालियों ने अध्ययन
किया है। उनमें महामहिम श्री जगन्नाथ प्रसाद जी भक्तमाली श्री भक्तमाल जी के परम मर्मज्ञ थे। वे श्री भक्तमाल
जी के मूर्तिमान स्वरूप थे। श्री सुदामादास जी और श्री नारायण दास जी "मामाजी" नेहनिधि आप ही के शिष्य थे।
श्री गणेशदासजी कृत भक्तवल्लभा टिप्पणी को समाहत कर आपने भक्तगाल की पाठ्यपुस्तक की संज्ञा दी। पुनः
जन-जन में श्री भक्तमाल जी के प्रचार प्रसार को लक्ष्य कर संत श्री सुदामादास जी को प्रेरित कर श्री गणेशदास
जी को विस्तृत टीका करने को वृन्दावन बुलाया। सद्गुरुदेव भक्तमाली कृत श्री गणेशदासजी टीका एवं श्री
रामेश्वरदास रामायणी की व्याख्या से यह ग्रन्थ चार खण्डों में सम्पन्न हुआ।
श्री भक्तमाल जी की रचना विक्रम संवत १६८० के लगभग गलतागादी जयपुर में हुई है। श्री प्रियादास
जी ने मनहरण कवित्त छन्दों में भक्तिरसबोधिनी टीका फाल्गुन वदी सप्तमी वि. संवत १७६९ में पूर्ण की।
श्री भक्तमाल पाठ का आधार श्री गणेशदास भक्तमाली संपादित भक्तवल्लभा टिप्पणी है। मूल पाठ की
प्रणाली में श्री भक्तमाल के छप्पयों की अंतिम तुक आदि में पढ़ी जाती है। यह प्राचीन परम्परा है। कुछ लोग कहते हैं
कि यह तो केवल गायन को ललित बनाने के लिये है, पर ऐसा नहीं है। सन्त भीखा साहब आदि प्राचीन हिन्दी कवियों
ने भी छप्पयों का निर्माण इसी ढंग से किया है कि अंत के चरण को प्रथम पढ़ना अनिवार्य है। जैसे बक्ता श्रोता को
आरम्भ में ही सम्बोधित करता है न कि प्रसंग समाप्ति के पश्चात् मू. छ. २६ "श्वेत द्वीप के दास जे श्रवण सुनौ
तिनकी कथा" इसी प्रकार "प्रसाद अवज्ञा जान के पाणि तजौ एकै नृपति" इस चरण का सम्बन्ध है। "कथा कहौं
बनाय" से है। इसी प्रकार मू. छ. ५४ 'वच्छ हरन'। मू. छ. ५१ में "आशै अगाध" का सम्बन्ध "श्री रंगनाथ" चरन से
है। प्रायः अन्तिम चरण में ही भक्त का नाम और उनकी विशेषता आई है बिना उसके पढ़े क्रम नहीं बनेगा और न ही
रस का आस्वादन होगा, अतः अंतिम चरण को आदि में ही पढ़ना चाहिए।
पाठ भेद या संख्या भेद को लेकर जो भी विचार हो, उसे नाभा जी के उदार दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर
ही समझना चाहिए न कि साम्प्रदायिक पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण से। वैसे आदि काल से मूल २१४ छन्द तथा टीका
६३२ कवित्त प्रसिद्ध है। किसी प्रति में चरण चिह्न के चार कवित्त नहीं है। किसी ने दिग्विजयी के चार कवित्त श्री
चैतन्य महाप्रभु के चरित्र में रखे हैं। समीक्षा करने पर उक्त चारों कवित्त श्री केशवकाश्मीरी के चरित्र में ही उचित
प्रतीत होते हैं। इसी प्रकार चरण चिह्नों के चार कवित्त छोड़ने के सम्बन्ध में कोई तर्क नहीं दिया गया है। अतः उन्हें
स्थान दिया गया है।
उपरोक्त समीक्षा के आधार पर श्री गणेशदास जी महाराज कृत भक्तवल्लभा टिप्पणी, जो संतों द्वारा
मान्य है, उसी के पाठ का अनुसरण किया गया है। पाठ की सुविधा से सप्ताह परायण, नवाह्न परायण तथा मास
परायण का भी संकेत दिया गया है।
श्री भक्तमाल के समाज गायन की तथा पाठ की प्राचीन परम्परा है उसकी उपादेयता को देखते हुए भक्तों
के आग्रह से श्री मूल भक्तमाल तथा श्री प्रियादास जी की कवित्तमयी टीका का प्रकाशन श्री मलूकपीठ सेवा संस्थान
से किया जा रहा है। आशा है कि पाठकगण संतुष्ट होकर भक्तभक्ति की सद्भावनायें प्रेषित करेंगे।
प्रार्थी
राजेन्द्र दास, मलूकपीठ वृन्दावन
सूची-पत्र
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| भूमिका | श्री सुदामा जी | २० | श्रीकृष्णजी के षोडश सखा | ३२ | |
| श्री भक्तमाल-नामावली | १ | श्री चन्द्रहास जी | २० | सप्तद्वीप के भक्त | ३२ |
| प्रसाद महिमा | २ | श्री मैत्रेय जी | २२ | जम्बूद्वीप के भक्त | ३३ |
| श्री भक्तमाल-माहात्म्य | ३ | श्री कुन्ती जी | २२ | श्वेतद्वीप के भक्त | ३३ |
| भक्त चतुष्टय लक्षण | ७ | श्री द्रोपदी जी | २२ | अष्टकुल नाग भक्त | ३४ |
| श्री भक्तमाल-वन्दना | ८ | श्री श्रुतिदेव जी | २३ | ।। इति पूर्वार्द्ध ।। | |
| सन्त-वन्दना | ८ | महर्षि श्रीवाल्मीकि जी | २४ | -अथ उत्तरार्ध- | |
| मंगलाचरण | ६ | श्वपच श्रीवाल्मीकि जी | २४ | श्री चतुःसम्प्रदायाचार्य | ३४ |
| टीका का नाम स्वरूप वर्णन | ६ | श्री रुक्मांगद जी | २५ | श्री निम्बार्काचार्य जी | ३५ |
| श्री भक्ति स्वरूप वर्णन | ६ | श्री रुक्मांगद जी की पुत्री | २५ | श्री सम्प्रदाय | ३५ |
| श्री भक्ति पंचरस वर्णन | ६ | टीका समुदाय की ... | श्रीरामानुजाचार्य जी | ३५ | |
| भगवद् प्रियता | १० | श्री हरिश्चन्द्र जी | २५ | चार दिग्गज महन्त | ३७ |
| सत्संग प्रभाव वर्णन | १० | श्री सुरथ-सुधन्वा जी | २५ | श्री लालाचार्य जी | ३७ |
| श्रीनाभाजी का वर्णन | १० | श्री शिवि जी | २६ | श्री पादपदमाचार्य जी | ३८ |
| श्री भक्तमाल स्वरूप वर्णन | १० | श्री दधीचि जी | २६ | श्री सम्प्रदाय | ३६ |
| मूल-मंगलाचरण | ११ | श्री विन्ध्यावलीजी | २६ | श्रीरामानन्दाचार्य जी | ३६ |
| आज्ञा-निरूपण | ११ | श्रीमौरध्वजजी, व श्रीताम्रध्वजजी | २६ | श्री अनन्तानन्द जी | ३६ |
| श्रीनाभाजीकी आदि अवस्था | १२ | श्री अलर्क जी | २७ | श्री रंग जी | ४० |
| चौबीस अवतार | १२ | श्री रन्तिदेवजी | २७ | पयहारी श्रीकृष्णदास जी | ४० |
| श्रीचरण-चिह्न | १२ | श्री गुह निषादजी | २७ | पयहारी जी के शिष्यगण | ४१ |
| द्वादश महाभागवत | १३ | श्री परीक्षित जी | २८ | श्री कील्हदेव जी | ४१ |
| श्रीशंकरजी | १४ | परमहंस श्रीशुकदेवजी | २८ | श्री अग्रदास जी | ४२ |
| अजामिलजी | १४ | श्री प्रह्लाद जी | २६ | श्री शंकराचार्य जी | ४२ |
| षोडश पार्षद | १५ | श्री अक्रूर जी | २६ | श्री नामदेव जी | ४३ |
| श्रीहरिवल्लभ | १५ | श्री बलि जी | २६ | श्री जयदेव जी | ४६ |
| श्रीहनुमानजी | १६ | श्री भगवद् प्रसादानिष्ठ भक्त | २६ | श्री श्रीधराचार्य जी | ४६ |
| श्रीविभीषणजी | १६ | ध्याननिष्ठ भक्त | ३० | श्री विल्वमंगल जी | ४६ |
| श्रीशबरीजी | १६ | अठारह महापुराण | ३० | श्री विष्णुपुरी जी | ५१ |
| श्रीजटायुजी | १७ | अठारह स्मृतियाँ | ३० | श्री ज्ञानदेव जी | ५२ |
| श्रीअम्बरीषजी | १७ | श्रीराम सचिव | ३१ | श्री त्रिलोचन जी | ५३ |
| श्रीअम्बरीषजी की छोटी रानी | १८ | श्रीराम सहचरवर्ग | ३१ | श्री वल्लभाचार्य जी | ५४ |
| श्री विदुरानी जी | १६ | नवनन्द | ३१ | श्री कुलशेखर जी | ५४ |
| श्री विदुर जी | १६ | समस्त ब्रजवासीगण | ३२ | श्री लीलानुकरण जी | ५५ |
(श्री भक्तमाल)
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| श्री रतिवन्ती बाईजी | ५५ | श्री पदमनाभ जी | ७६ | श्री मधु गोसाँई जी | १०० |
| प्रसावनिष्ठ श्रीपुरुषोत्तमजी नृपति | ५५ | श्री तत्त्वा जी, श्री जीवा जी | ७६ | श्री कृष्णदासजी ब्रह्मचारी | १०० |
| श्री कर्माबाईजी | ५६ | श्री माधवदास जी | ८० | श्री कृष्णदास जी पण्डित | १०० |
| श्री सिलपिल्ले भक्ता उभयबाई जी | ५६ | श्री रघुनाथदास गोस्वामी | ८२ | श्री भूगर्भ गोसाँई जी | १०० |
| सुत विषदा बाई | ५७ | श्री नित्यानन्द जी | ८३ | श्री रसिकमुरारी जी | १०० |
| मामू-भानजा | ५८ | श्री कृष्णचैतन्य जी | ८३ | श्री सदन (श्री सधनजी) | १०२ |
| हंस भक्त | ५६ | श्री सूरदास जी | ८४ | श्री काशीश्वर गोसाँईजी | १०३ |
| श्री सदाव्रती जी महाजन | ६० | श्री परमानन्ददास जी | ८४ | श्री कलिकल्पवृक्ष भक्त | १०३ |
| श्री भुवन सिंहजी चौहान | ६१ | श्री केशव भट्ट जी | ८५ | श्री खोजीजी | १०४ |
| श्री देवापण्डा जी | ६१ | श्री श्रीभट्ट जी | ८६ | श्री राँकाजी-श्री बाँकाजी | १०४ |
| श्री कामध्वज जी | ६२ | श्री हरिव्यासदेव जी | ८७ | कलि कामधेनु भक्त | १०४ |
| श्री जयमल जी | ६२ | श्री दिवाकर जी | ८७ | श्री लड्डू भक्तजी | १०५ |
| श्री ग्वाल भक्तजी | ६२ | श्री विट्ठलनाथ गोसाँईजी | ८८ | श्री सन्तजी | १०५ |
| श्री श्रीधरस्वामी जी | ६२ | श्री त्रिपुरदास जी | ८८ | श्री तिलोकजी सुनार | १०५ |
| श्री हरिपाल जी | ६३ | श्री विट्ठलनाथ जी के सुत | ८६ | अभिलाषपूरक भक्त | १०६ |
| श्री साक्षीगोपालजी के भक्त | ६३ | श्री कृष्णदास जी | ८६ | दिग्गज भक्त | १०६ |
| श्री रामदास जी | ६४ | श्री वर्द्धमान जी, श्री गंगल जी | ६० | श्री हरिभजन परायण भक्त | १०६ |
| श्री जरुस्वामी जी | ६५ | श्री खेम गोसाँई जी | ६० | श्री रुद्रप्रताप गजपति | १०७ |
| श्री नन्ददासजी वैष्णवसेवी | ६५ | श्री विट्ठलदास जी | ६१ | श्री हरिसुयश प्रचारक भक्त | १०७ |
| श्री अल्ह जी | ६५ | श्री हरिरामजी हठीले | ६२ | श्री गोविन्द स्वामी जी | १०७ |
| भक्ता बारमुखी जी | ६५ | श्री कमलाकर भट्ट जी | ६३ | श्री मथुरामण्डलवासी भक्त | १०८ |
| ब्राह्मण-दम्पत्ति | ६६ | श्री नारायण भट्टजी | ६३ | श्रीगुज्जामालजी एवं उनकी पुत्रवधू | १०८ |
| भेषनिष्ठ राजा | ६७ | श्री ब्रजवल्लभ जी | ६४ | श्री भक्तराज युवतीजनजी | १०६ |
| अन्तर्निष्ठ राजा | ६७ | श्री रूप-सनातन जी | ६४ | श्री गणेशदेई रानी | १०६ |
| श्री गुरुनिष्ठ भक्त | ६८ | श्री हितहरिवंश गोसाँईजी | ६५ | श्री नरवाहन जी | ११० |
| श्री रैदास जी | ६८ | स्वामी श्री हरिदासजी | ६६ | श्री गोपालदास जी जोबनेरी | ११० |
| श्री कबीर जी | ७० | श्री हरिराम व्यास जी | ६७ | श्री लाखा जी | १११ |
| श्री पीपाजी | ७२ | श्री जीव गोस्वामी जी | ६८ | श्री नरसी जी | ११२ |
| श्री धना जी | ७६ | श्री वृन्दावनवासी भक्त | ६८ | श्री यशोधर जी | ११६ |
| श्री सेन जी | ७७ | श्री गोपाल भट्ट गोसाईं जी | ६६ | श्री नन्ददास जी | ११७ |
| श्री सुखानन्द जी | ७८ | श्री अलिभगवान जी | ६६ | श्री जनगोपाल जी | ११७ |
| श्री सुरसुरानन्द जी | ७८ | श्री बीठलविपुल जी | ६६ | श्री माधवदास जी | ११७ |
| श्री सुरसुरी जी | ७८ | श्री जगन्नाथ थानेश्वरी | ६६ | श्री अंगद जी | ११८ |
| श्री नरहरियानन्द जी | ७६ | श्री लोकनाथ गोसाँई जी | ६६ | श्री चतुर्भुज नृपति | ११६ |
सूची पत्र)
विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ
श्री मीरा जी १२० श्री नारायणदास जी नृतक १४४ श्री हरिदास जी १६३
श्री पृथ्वीराजजी आमेर नरेश १२२ श्री भूरिदा भक्तजन १४५ श्री गोविन्ददास जी १६४
श्री जयमल जी १२४ संसार से निवृत भक्तजन १४५ श्री कृष्णदास जी १६५
श्री मधुकर शाह जी १२४ श्री जयतारन विदुर जी १४६ परमधर्म पोषक सन्यासी भक्त १६५
श्री खेमाल रत्न जी १२४ स्वामी चतुरोनगन जी १४६ श्री प्रबोधानन्द जी १६६
श्री रामरयन जी १२५ भक्तसेवी मधुकरिया भक्तजी १४७ श्री द्वारकादास जी १६६
श्री रामरयन जी की धर्मपत्नी १२५ श्री कूबा (केवलदासजी) १४७ श्री पूर्ण जी १६६
श्री किशोर सिंह जी १२६ श्री अग्रदेवजी के शिष्य १४६ श्री लक्ष्मण भट्ट जी १६६
श्री हरीदास जी १२६ श्री टीलाजी का वंश १४६ श्री कृष्णदास जी पयहारी १६७
श्री चतुर्भुजदास जी कीर्तननिष्ठ १२७ श्री कान्हरदास जी १४६ श्री गदाधरदास जी १६७
श्री कृष्णदास जी चालक १२७ श्री नीवाँ जी १५० श्री नारायणदास जी १६८
श्री सन्तदास जी १२८ श्री तूँवर भगवान जी १५० श्री भगवानदास जी १६६
श्री सूरदासजी मदनमोहन १२८ श्री जसवन्त जी १५१ श्री कल्याणदास जी १६६
श्री कात्यायिनीजी १२६ श्री हरिदास जी १५१ श्री सन्तदास जी १७०
श्री मुरारिदास जी १३० श्री गोपालदास जी १५२ श्री माधवदास जी १७०
गोस्वामी श्री तुलसीदारा जी १३१ श्री विष्णुदास जी १५२ श्री जरावन्त जी १७०
श्री मानदास जी १३३ श्री कील्हदेवजी के शिष्यजन १५३ श्री गोविन्ददास जी 'भक्तमाली' १७०
श्री गिरिधर जी १३३ श्री नाथभट्ट जी १५३ श्री जगतसिंह जी १७१
श्री गोकुलनाथ जी १३३ श्री करमैती जी १५३ श्री गिरिधर ग्वाल जी १७१
श्री वनवारीदास जी १३४ श्री खंगसेन जी कायस्थ १५५ श्री गोपाली जी १७२
श्री नारायण मिश्र जी १३५ श्री गंगग्वाल जी १५५ श्री रामदास जी १७२
श्री राघवदास जी १३५ श्री सोती जी १५६ श्री रामराय जी १७३
श्री बावन जी १३५ श्री लालदास जी १५६ श्री भगवन्तमुदित जी १७३
श्री परशुराम जी १३६ श्री माधवग्वाल जी १५६ श्री लालमती जी १७४
श्री गदाधर भट्ट जी १३६ श्री प्रयागदास जी १५७ भक्त-परत्व १७५
श्री चारण भक्त १३८ श्री प्रेमनिधि जी १५७ सन्त-उत्कर्ष १७५
श्री करमानन्द जी १३८ श्री राघवदास जी दूबलो १५८ अन्तिम मंगलाचरण १७६
श्री कोल्ह जी, श्री अल्ह जी १३८ श्री कान्हरदास जी १५६ कथन-श्रवण की महिमा १७७
श्री नारायणदास जी १३६ श्री केशवजी लटेरा १६० टीकाकार के श्रीगुरुदेव १७८
श्री पृथीराज जी १३६ श्री केवलराम जी १६० टीका का उपसंहार १७८
श्री सींवा जी १४० श्री आशकरण जी १६१ टीकाकार की विज्ञप्ति १७८
श्री रत्नावतीजी १४१ श्री हरिवंश जी १६२ नमामि भक्तमाल को १७६
श्री जगन्नाथ जी पारीष १४३ श्री कल्याण जी १६२ श्रीनामा जी की प्रार्थना १७६
श्री मथुरादास जी १४४ श्री बीठलदास जी १६२ श्री भक्तमाल जी की आरती १८०
१) (श्री भक्तमाल
श्रीभगवतरसिकजी महाराज कृत –
श्रीभक्त-नामावली
हम सौं इन साधुन सौं पंगति।
जिनको नाम लेत दुख छूटत, सुख लूटत तिन संगति।।
मुख्य महन्त काम रति गणपति, अज महेश नारायण।
सुर नर असुर मुनी पक्षी पशु, जे हरि भक्त परायन।।
बाल्मिकी नारद अगस्त्य शुक, व्यास सूत कुल हीना।
शबरी स्वपच वशिष्ठ विदुर, विदुरानी प्रेम प्रबीना।।
गोपी गोप द्रोपदी कुन्ती, आदि पण्डवा ऊधो।
विष्णु स्वामी निम्बारक माधो, रामानुज मग सूधो।।
लालाचारज धनुर्दास, कुरेश भाव रस भीजे।
ज्ञानदेव गुरु शिष्य त्रिलोचन, पटतर को कहि दीजे।।
पद्मावती चरन को चारन, कवि जयदेव जसीलो।
चिन्तामनि चिद्रूप लखायो, विल्वमंगलहिं रसीलो।।
केशव भट्ट श्रीभट्ट नरायन, भट्ट गदाधर भट्टा।
विट्ठलनाथ वल्लभाचारज, ब्रज के गूजर जट्टा।।
नित्यानन्द अद्वैत महाप्रभु, शची सुवन चैतन्या।
भट्ट गुपाल रघुनाथ जीव, अरु मधू गुसाँई धन्या।।
रूप सनातन भज वृन्दावन, तजि दारा सुत सम्पति।
व्यास दास हरिवंश गुसाँईं, दिन दुलराई दम्पति।।
श्रीस्वामी हरिदास हमारे, विपुल विहारिनि दासी।
नागरि नवल माधुरी वल्लभ, नित्य विहार उपासी।।
तानसेन अकबर करमैती, मीरा करमाबाई।
रत्नावती मीर माधव, रसखानि रीति रस गाई।।
अग्रदास नाभादि सखी ये, सबै राम सीता की।
सूर मदनमोहन नरसी अलि, तस्कर नवनीता की।।
(श्री भक्तमाल नामावली २)
माधोदास गुसाँई तुलसी, कृष्णदास परमानन्द।
विष्णुपुरी श्रीधर मधुसूदन, पीपा गुरु रामानन्द॥
अलि भगवान मुरारि रसिक, श्यामानन्द रंका बंका।
रामदास चीधर निष्किंचन, सम्हन भक्त निशंका॥
लाखा अंगद भक्त महाजन, गोविन्द नन्द प्रबोधा।
दास मुरारि प्रेमनिधि विट्ठल, दास मथुरिया योधा॥
लालमती सीता प्रभुता झाली, गोपाली बाई।
सुत विष दियौ पूजि सिलपिल्ले, भक्ति रसीली पाई॥
पृथीराज खेमाल चतुर्भुज, राम रसिक रस रासा।
आशकरन जयमल मधुकर नृप हरीदास जन दासा॥
सेना धना कबीरा नामा, कूबा सदन कसाई।
वारमुखी रैदास सभा में, सही न श्याम हँसाई॥
चित्रकेतु प्रह्लाद विभीषण, बलि ग्रह बाजैं बावन।
जामवन्त हनुमन्त गीध गुह, किये राम जे पावन॥
प्रीति प्रतीति प्रसाद साधु सौं, इन्हें इष्ट गुरु जानौं।
तजि ऐश्वर्य मरजाद वेद की, इनके हाथ बिकानौं॥
भूत भविष्य लोक चौदह में, भये होहिं हरि प्यारे।
तिन तिन सौं व्यवहार हमारो, अभिमानिन ते न्यारे॥
‘भगवतरसिक’ रसिक परिकर कर, सादर भोजन पावैं।
ऊँचो कुल आचार अनादर, देखि ध्यान नहिं लावैं।
प्रसाद-महिमा
यह दिव्य प्रसाद प्रिया-प्रिय को।
दरसत ही मन मोद बढ़ावत परसत पाप हरत हिय को॥
पावत परम प्रेम उपजावत भुलवत भाव पुरुष तिय को।
‘भगवतरसिक’ भावतो भूषण तिहि क्षण होत युगल जिय को॥
३) (श्री भक्तमाल
अथ श्रीवैष्णवदासजी कृत
श्रीभक्तमाल-माहात्म्य
-दोहा-
श्रीनारायनदास जी कृत भक्तन्ह की माल।
पुनि ताकी टीका करी प्रियादास सु रसाल॥
ताकौ साधुन के कहे कहौं महातम बानि।
लै ग्रन्थनि मत आधुनिक परिचै रस की खानि॥
भक्तन की महिमा कही कपिलदेव भगवान।
नारायण आधीन हैं मैं कह कहौं बखान॥
सब संसार सुआरसी जन महिमा प्रतिबिम्ब।
रति दृग बिन सूझै नहीं अन्धे को वह बिम्ब॥
वेद शास्त्र के श्रवण को अति फल हरि निरधार।
सो याके श्रोता अहैं महिमा अगम अपार॥
भयौ चहै हरि पाँति को सुनै सोइ हरषाय।
तहाँ दोय इतिहास हैं सुनिये चित्त लगाय॥
-चौपाई-
प्रियादास जू के सुमित्र वर। श्रीगोवर्धननाथ नाम कर॥
ते श्रीभक्तमाल रंग छाये। पढ़ि साँभरि की रमति आये॥
मग में श्रीगोविन्ददेव जो। तिनके दर्शन को गमने सो॥
तहँ श्रीराधारमन पुजारी। हरिप्रिय रसिक अनन्य सु भारी॥
तिन तिनकौं राखो अटकाई। भक्तमाल सुनिवे के ताईं॥
होन लगी तहँ भक्त सुमाला। जहाँ विराजत गोविन्द लाला॥
जयपुर वासी सुनिवे आवैं। प्रेम मुदित ह्वै अश्रु बहावैं॥
कछु दिन बाँचि बन्द करि दीनी। श्रोतन ते निश्चय यह कीनी॥
साँभरि की रमति करि आऊँ। तब ही पूरी कथा सुनाऊँ॥
रमति गये बगदि फिरि आये। कथा कहन को फिरि बैठाये॥
(श्री भक्तमाल-माहात्म्य ४)
कहँ तक भई सँभार सु नाहीं। श्रोता अरु वक्ता भ्रम माहीं॥
श्रीगोविन्ददेव विख्याता। कही पुजारी सौं यह बाता॥
श्रीरैदास भक्त की गाथा। भई कहो आगे अब नाथा॥
-दोहा-
सुनि सु पुजारी के दृगन पानी बह्यौ अपार।
याके श्रोता आप हैं यह कीनी निरधार॥
-चौपाई-
पुनि दूजौ इतिहास सुनौ अब। प्रियादास टीका कीनी जब॥
तब ब्रज परिकरमा महँ आये। फिरत फिरत होड़ल जा छाये॥
लालदास तहँ रहे महन्ता। जनसेवी अनन्य रसवन्ता॥
सब समाज तिन रोकि सु लीनो। बाँचो भक्तमाल हठ कीनो॥
भक्तमाल तहँ होन सु लागी। सुनन लगे सब लोग सुभागी॥
इक दिन निसि तहँ आये चोरा। सबै वस्तु लीनी टकटोरा॥
ठाकुर हू को ते लै गये। हरि ही के ये कौतुक नये॥
प्रात भये सबही दुख छाये। प्रियादास हू अति अकुलाये॥
कही कथा न रसोई कीनी। महादुक्ख में मति अति भीनी॥
ठाकुर को ये चरित न प्यारे। ताते चोरन संग पधारे॥
श्रीमहन्त बोले कर जोरी। हम कहँ तजि ठाकुर गे चोरी॥
तुमहू त्याग करोगे जोपै। मेरी कुगति होयगी तोपै॥
ताते हरि इच्छा मन दीजै। कहिये कथा रसोई कीजै॥
प्रियादास बोले यों सुनहू। अब मैं कथा न कहिहौं कबहू॥
श्रीनाभा यों वचन उचारे। हरि को जन चरित्र ये प्यारे॥
सो. झूठी अब भई यहाँ ई। कथा त्याग हरि गये पराई॥
-दोहा-
यों कहिकै भूखे रहे काहुहिं परी न चैन।
सुपने चोरन ते कहें ठाकुर जू यों बैन॥
-चौपाई-
मोहि जहाँ को तहँ करि आवौ। ना तर तुम बहुतै दुख पावौ॥
इक दुख भक्त रहे दुख माही। भक्तमाल पुनि सुनी सु नाहीं॥
(५ (श्री भक्तमाल
दुहरे दुख परे हैं हम पर। चौहर दुख डारूँगो तुम पर॥
सुनिकै चोर उठे अधराता। ठाकुर को लै हरषित गाता॥
गावत बजवत नाचत आये। संग सकल सामग्री लाये॥
प्रातःकाल होन नहिं पायो। समाचार द्विज एक सुनायो॥
चोर तिहारे ठाकुर ल्यावत। नाचत गावत बजवत आवत॥
सुनि सब साधु निपट हरषाये। करत कीरतन सनमुख धाये॥
सुधि-बुधि गई प्रेम में छाये। जाय परस्पर लपटत भाये॥
चोरहु कुछ कहि सकै न बतियाँ। दृग भरि आवत फाटत छतियाँ॥
आँसू पोंछत गद्गद बानी। सपने की सब कथा बखानी॥
सुनि सबने अति ही सुख पायौ। प्रेम मग्न मन दुख नसायौ॥
मन्दिर में प्रभु को पधरायौ। बहु मंगल उच्छव करवायौ॥
भक्तमाल की कथा सुहाई। नाम कीरतन सहित कहाई॥
याके श्रोता श्रीहरि अहहीं। पुनि-पुनि साधु प्रेमवश कहहीं॥
-दोहा-
हाथ कंकनहिं आरसी कहा दिखाये माहि।
हरि श्रोता बिन सबन के यों मन अटकत नाहिं॥
-चौपाई-
श्रोता वक्ता को फल जोई। कापै कहि आवत है सोई॥
जो लिखाय राखै उर मोहिं। अन्त समै हरि प्राप्ति कराहीं॥
तहाँ एक सुनिये इतिहासा। क्वौ जन प्रियदासा के पासा॥
आय कही मोहि देहु लिखाई। भक्तमाल सुन्दर सुखदाई॥
प्रियादास पूछी सुखरासा। कहन सुनन कछु है अभ्यासा॥
तिन कह मैं कछु कहि नहिंजानौ। सुनिवे हू की गति न पिछानौं॥
आपु कही तब करिहौं काहा। बात सुनाय दिखाई चाहा॥
महाराज मैं जग व्यौहारी। गृह कामन में अटक्यौ भारी॥
साधु संग को अवसर नाहीं। ताते मैं सोची मन माही॥
मरती बार हिये पर धरिहौं। इतने साधु संग उबरिहौं॥
सुनि यह बात नेत्र भरि आये। बहुत बड़ाई करि सुख छाये॥
ताको पोथी दई लिखाई। सो लै घर गवन्यौ सुख पाई॥
(श्री भक्तमाल महात्मय ६)
घर कारज में अटक्यौ भारी। आई ताहि मीच भयकारी॥
यम के दूतन आय दबायौ। दई त्रास अरु कण्ठ रुकायो॥
बेटा पोते ढिंग बिललाता। नैन सैन दै कही सुबाता॥
भक्तमाल की पोथी लाई। मम छाती ते देहु लगाई॥
ते उठाये पोथी लै आये। धरि छाती पर अचरज छाये॥
धरतहिं यम के दूत भजे यों। सूरन के आगे कायर ज्यों॥
कण्ठ खुल्यौ नैननि जल ढार्यौ। हरे कृष्ण गोविन्द उचार्यौ॥
बहु भक्तन के दर्शन पायौ। हिये माँझ आनन्द समायौ॥
सुत हरषित सब पूछत बाता। कहा भयौ सो कहिये ताता॥
तिन कह यमदूतन दुख दीनौ। भक्तनि अब उबार मैं लीनो॥
नामदेव रैदास कबीरा। सेन धना पीपा अति धीरा॥
ठाढ़े सकल कहत है बाता। हमरे संग चलो अब ताता॥
सो मैं अब इनके संग जैहौं। यमदूतन के मुख न चितैहौं॥
यह कहि राम-कृष्ण उच्चारत। नैन मूँदि हरि को उर धारत॥
प्रान त्यागि हरि धाम सिधायौ। बेटन के उर अति सुख छायौ॥
तबते तिनने नेम करे हैं। अन्त समय उर ग्रन्थ धरे हैं॥
तिनको कुटुम वनहिं को आयौ। तिननि सबै यह चरित सुनायौ॥
सो हम लिखन कियो है सही। सब दिन भक्तनि महिमा रही॥
शेष महेश जासु गुन गावैं। तेऊ चरण रेणु मन लावैं॥
आपु ते अधिक दास को गावै। जन की महिमा कहि नहिं आवै॥
प्रियादास अति ही सुखकारी। भक्तमाल टीका विस्तारी॥
तिनकौ पौत्र परम रँग भीनौ। वैष्णवदास महात्म् कीनौ॥
-दोहा-
श्री भक्तमाल की गंध को लेत भक्त अलि आय।
भेक विमुख ढिंगहीं बसैं रहे कीच लपटाय॥
।। इति भक्तमाल-माहात्मय सम्पूर्णम् ।।
मिति माह वदी ६ संवत् १८८६ वृन्दावन
१. प्राचीन भक्त-चरित्र (ध्रुव, प्रह्लाद, अम्बरीष, जनक, विभीषण)
(७ (श्री भक्तमाल
भक्त चतुष्टय लक्षण
भक्त भक्ति भगवन्त गुरु चतुर नाम वपु एक।
इनके पद वन्दन किये नाशहिं विघ्न अनेक॥
-भक्त-
तितिक्षवः कारुणिकाः सुहृदः सर्वदेहिनाम्।
अजातशत्रवः शान्ताः साधवः साधुभूषणाः॥ १॥
मय्यनन्येन भावेन भक्तिं कुर्वन्ति ये दृढाम्।
मत्कृते त्यक्तकर्माणस्त्यक्तस्वजनबान्धवाः॥ २॥
मदाश्रयाः कथा मृष्टाः शृण्वन्ति कथयन्ति च।
तपन्ति विविधास्तापा नैतान्मद्गतचेतसः ॥ ३॥
-भक्ति-
अन्याभिलाषिता शून्यं ज्ञान कर्माद्यनावृतम्।
आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा॥ ४॥
द्रुतस्य भगवद् धर्माद्धारा वाहिकतां गता।
सर्वेशे मनसो वृत्तिर्भक्तिरित्यभि धीयते॥ ५॥
अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी।
जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा॥ ६॥
-भगवन्त-
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः।
ज्ञान वैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा॥ ७॥
उत्पत्तिं प्रलयञ्चैव भूतानामागतिं गतिम्।
वेत्तिविद्यामविद्यांच स वाच्यो भगवानिति॥ ८॥
पोषणं भरणाधारं शरणं सर्वव्यापकम्।
कारुण्यं षड्भिः पूर्णो रामस्तु भगवान् स्वयम्॥ ६॥
-गुरु-
आचार्य मां विजानीयात् नावमन्येत् कर्हिचित्।
न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरूः॥१०॥
गु शब्दस्त्वन्धकारोऽस्ति रु शब्दस्तन्निरोधकः।
अन्धकार निरोधित्वात् गुरुरित्यभिधीयते॥११॥
तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासु श्रेय उत्तमम्।
शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम्॥१२॥
(श्री भक्तमाल वन्दना (८
श्रीभक्तमाल-वन्दना
नमो नमो श्रीभक्त सुमाल।
जाके सुनत महातम नाशत, उर झलकत राधा नँदलाल।।
गद्गद स्वर पुलकत अंग अंगनि, लोचन बरषत अँसुवन जाल।
उतरि जात अभिमान व्याल विष, लेत जिवाय सुरस तिहिं काल।।
होत प्रीति हरि भक्तजनन सौं, लेत शीघ्र हठि चरण प्रछाल।
तजत कुसंग लेत सत् संगति, भाग जगत कोउ अद्भुत भाल।।
निसि वासर सोवत अरु जागत, रोम-रोम ह्वै करत निहाल।
श्रीअग्र-नारायणदास प्रिया प्रिय, प्रगटी जीवन रसिक रसाल।।
सन्त-वन्दना
वांछाकल्पतरुभ्यश्च, कृपासिन्धुभ्य एव च।
पतितानां पावनेभ्यो, वैष्णवेभ्यो नमो नमः ।।
प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक, व्यासाम्बरीषशुकशौनकभीष्मदाल्भ्यान्।
रुक्मांगदार्जुनवशिष्ठविभीषणादीन्, एतानहं परमभागवत्तान्नमामि।।
सन्त सरल चित जगत हित, जानि सुभाउ सनेहु।
बाल विनय सुनि करि कृपा, राम चरण रति देहु।।
वन्दौं सन्त समाज चित, हित अनहित नहिं कोय।
अंजलिगत शुभ सुमन जिमि, सम सुगन्ध कर दोय।।
बार बार पद वन्दौं, (श्री) नाभा आभा ऐन।
(जिन) काढ्यौ गाथा वेद को, भक्तमाल रस दैन।।
प्रियादास के पद कमल वन्दौं बारम्बार।
कीनि भक्तिरसबोधिनी टीका अति सुखसार।।
सन्त है अनन्त गुन अन्त कौन पावै जाकौ, जानै रतिवन्त कोऊ रीझै पहिचानिकै।
औगुन न दीठि परै देखत ही नैन भरै, ढरै पग ओर उर प्रेम भर आनिकै।।
जोपै घटि क्रिया कछु देखियत इन माँझ, करिलै विचार हरि ही की इच्छा मानिकै।
बालक सिंगारिकै निहारि नेहवती माता, देत जो दिठौना कारौ दीठि डर जानिकै।।
-(श्रीप्रियादास कृत अनन्यमोदिनी से)
8-1
प्रह्लाद
विभीषण नारद
वशिष्ठ पराशर
अर्जुन पुण्डरीक
रुक्माङ्गद व्यास
दाल्भ्य अम्बरीष
भीष्म शुकदेव
शौनक
पुण्यानिमान् परमभागवतान् स्मरामि
8-2
श्रीनाभाजी एवं सद्गुरुदेव श्रीअग्रदेवाचार्य जी महाराज
६) (श्री भक्तमाल
॥ श्रीहरिः॥
॥ श्रीमद्भगवद्भक्तेभ्यो नमः॥
श्रीभक्तमाल
॥ श्रीप्रियादासजी कृत आज्ञानिरूपण मंगलाचरण॥
॥ भक्तिरसबोधिनी टीका॥
मनहरण कवित्त
महाप्रभु श्रीकृष्ण-चैतन्य मनहरन जू के चरन कौ ध्यान मेरे नाम मुख गाइयै।
ताही समय नाभा जू ने आज्ञा दई, लई धारि, टीका विस्तारि भक्तमाल की सुनाइयै ।।
कीजिये कवित्त वन्द छन्द अति प्यारो लगै, जगै जग माँहि कहि वाणी बिरमाइयै।
जानौं निज मति, ऐपै सुन्यौं भागवत शुक द्रुमनि प्रवेश कियौ, ऐसेई कहाइयै ॥१॥
टीका का नाम स्वरूप वर्णन
रची कविताई सुखदाई लागै निपट सुहाई औ सचाई पुनरुक्ति लै मिटाई है।
अक्षर मधुरताई अनुप्रास जमकाई, अति छबि छाई मोद झरी-सी लगाई है।।
काव्य की बड़ाई निज मुख न भलाई होति नाभा जू कहाई याते प्रौढ़िकै सुनाई है।
हृदै सरसाई जोपै सुनिये सदाई, यह 'भक्तिरसबोधिनी' सुनाम टीका गाई है॥२॥
श्रीभक्ति स्वरूप वर्णन
श्रद्धा ई फुलेल औ उबटनौ श्रवन कथा मैल अभिमान अंग-अंगनि छुड़ाइये।
मनन सुनीर अन्हवाइ 'अँगु छाइ' दया नवनि वसन पन सौंधो लै लगाइये ।।
आभरन नाम हरि साधुसेवा कर्णफूल मानसी सुनथ संग अंजन बनाइये।
भक्ति महारानी कौ सिंगार चारु बीरी चाह रहै जो निहारि लहै लाल प्यारी गाइये ।।३।।
श्रीभक्ति पंचरस वर्णन
शान्त दास्य सख्य वात्सल्य औ श्रृंगार चारु, पाँचौ रस सार विस्तार नीके गाये हैं।
टीका को चमत्कार जानौगे विचारि मन, इनके स्वरूप मैं अनूप लै दिखाये हैं।।
जिनके न अश्रुपात पुलकित गात कभूँ, तिनहूँ को भावसिन्धु बोरिकै छकाये हैं।
जोलौं रहैं दूर रहैं विमुखता पूर हियो, होय चूर-चूर नेकु श्रवण लगाये हैं ॥४॥