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श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 93

७८) (श्री भक्तमाल)
श्रीसुखानन्दजी
भक्ति दान भय हरन भुज, सुखानन्द पारस परस।।
सुखसागर की छाप, राग गौरी रुचि न्यारी।
पद रचना गुरु मन्त्र, मनौं आगम अनुहारी।।
निसिदिन प्रेम प्रवाह, द्रवत भूधर ज्यौं निर्झर।
हरिगुन कथा अगाध, भाल राजत लीला भर।।
संत कंज पोषन विमल, अति पीयूष सरसी सरस।
भक्ति दान भय हरन भुज, सुखानन्द पारस परस।। ६४ ।।
श्रीसुरसुरानन्दजी
महिमा महा प्रसाद की, सुरसुरानन्द साँची करी।।
एक समै अध्वा चलत, बरा वाक् छल पाये।
देखा-देखी शिष्य, तिनहुँ पाछैं ते खाये।।
तिन पर स्वामी खिजे, वमन करि बिन विश्वासी।
तिन तैसें परतच्छ, भूमि पर कीनी रासी।।
सुरसुरी सुवर पुनि उद्गले, पुहुप रेनु तुलसी हरी।
महिमा महा प्रसाद की सुरसुरानन्द साँची करी।। ६५।।
श्रीसुरसुरीजी
महासती सत ऊपमा, त्यौं सत्त सुरसुरी कौ रह्यौ।।
अति उदार दम्पति, त्यागि गृह वन को गमने।
अचरज भयो तँह एक, सन्त सुनि जिन हो बिमने।।
बैठे हुते एकान्त, आय असुरनि दुख दीयौ।
सुमिरे सारँगपाणि, रूप नरहरि कौ कीयौ।।
सुरसुरानन्द की घरनि कौ सत राख्यो नरसिंह जह्यौ।
महासती सत ऊपमा त्यौं सत्त सुरसुरी कौ रह्यौ।। ६६।।
नवाह परायण चतुर्थ विश्राम