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सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

८०) (श्री भक्तमाल
रघुकुल सदृश सुभाव, श्रेष्ठ गुण सदा धर्मरत।
सूर धीर ऊदार, दया पर दक्ष अनन्य व्रत॥
पद्मखण्ड पद्मा पद्धति, प्रफुलित कर सविता उदित।
तत्त्वा जीवा दक्षिण देश, वंशोद्धर राजत विदित॥ ६६॥
तत्त्वा जीवा भाई उभै विप्र साधु सेवा पन, मन धरी बात तातैं शिष्य नहीं भये हैं।
गाड्यौ एक ठूंठ द्वार होय अहो! हरी डार, सन्त चरनामृत को लै कै डारि दये हैं॥
जबही हरित देखैं ताकौं गुरु करि लेखैं, आये श्रीकबीर पूजी आस पाँव लये हैं।
नीठ-नीठ नाम दियौ, दियौ परिचाय धाम, काम कोऊ होय जोपै आवौ कहि गये हैं॥ ३१२॥
कानाकानी भई द्विज जानी जाति गई पाँति, न्यारी करि दई कोऊ बेटी नहीं लेत है।
चल्यो एक काशी जहाँ बसत कबीर धीर, जाय कही पीर जब पूछ्यौ कौन हेत है॥
दोऊ तुम भाई करौ आपु में सगाई होय, भक्ति सरसाई न घटाई चित चेत है।
आय वहै करी परी ज्ञाति खरभरी कहैं, कहा उर धरी कछू मतिहूँ अचेत है॥ ३१३॥
'करैं यही बात हमें और न सुहात' आये, सबै हा-हा खात यह छाँड़ि हठ दीजिये।
पूछिवे कौं फेरि गये करौ ब्याह जोपै नये, दण्ड करि नाना भाँति भक्ति दृढ़ कीजिये॥
तब दई सुता लई पाँति में प्रसन्न ह्वै कै, पाँति हरि भक्तनि सौं सदा मति भीजिये।
विमुख समूह देखि सबही बड़ाई करैं, धरैं हिय माँझ कहैं पन पर रीझिये॥ ३१४॥
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श्रीमाधवदासजी
बिनै व्यास मनो प्रगट ह्वै, जग को हित माधौ कियौ॥
पहिले वेद विभाग, कथित पुरान अष्टादस।
भारतादि भागौत, मथित उद्धार्यौ हरि जस॥
अब सोधे सब ग्रन्थ, अर्थ भाषा विस्तार्यौ।
लीला जै-जै जैति, गाय भवपार उतार्यौ॥
जगन्नाथ इष्ट वैराग्य सींव, करुणा रस भीज्यो हियौ।
बिनै व्यास मनो प्रगट ह्वै जग को हित माधौ कियौ॥ ७०॥