श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीसेनजी) (७७
बार-बार पाँव परै अरै भूख-प्यास तजी, धरै हिये साँचौ भाव पाई प्रभु प्यारियै।
छाक नित आवै नीके भोग कौ लगावै जोई, छोड़ैं सोई पावैं प्रीति रीति कछु न्यारियै।।
जाकौ कोऊ खाय ताकी टहल बनाय, करै ल्यावत चराय गाय हरि उर धारियै।
आयौ फिरि विप्र नेह खोजहूँ न पायौ कहूँ, सरसायौ बातै लै दिखायौ श्याम ज्यारियै।।३०७।।
द्विज लखि गायनि में चायनि समाज नाहिं, भायनि की चोट दृग लागी नीर झरी है।
जायकै भवन सीतारवन प्रसन्न करैं, बड़े भाग मानि प्रीति देखी जैसी करी है।।
धना को दयाल ह्वै कै आज्ञा प्रभु दई ठरौ, करौ गुरु रामानन्द भक्ति मति हरी है।
भये शिष्य जाय आप छाती सौं लगाय लिये, किये गृह काम सबै सुनी जैसी धरी है।।३०८।।
श्रीसेनजी
विदित बात जग जानियै हरि भये सहायक सेन के।।
प्रभू दास के काज रूप नापित कौ कीनौ।
छिप्र छुड़हरी गही, पानि दर्पन तँह लीनौ।।
तादृश ह्वै तिहिं काल, भूप के तेल लगायौ।
उलटि राव भयो शिष्य, प्रगट परचौ जब पायौ।।
श्याम रहत सनमुख सदा ज्यौं बच्चा हित धेन के।
विदित बात जग जानियै हरि भये सहायक सेन के।।६३।।
बाँधौगढ़ वास हरि साधु सेवा आस लगी, पगी मति अति प्रभु परचौ दिखायौ है।
करि नित्त नेम चल्यौ भूप कौ लगाऊँ तेल, भयौ मग मेल सन्त फिरि घर आयौ है।।
टहल बनाय करी नृप की न शंक धरी, धरि उर श्याम जाय भूपति रिझायौ है।
पाछे सेन गयौ पन्थ पूछै हिये रंग छायौ, भयौ अचरज राजा वचन सुनायौ है।।३०६।।
फेरि कैसे आये? सुनि अति ही लजाये कही, 'सदन पधारे सन्त भई यों अबार है।
आवन न पायौँ वाही सेवा अरुझायौं', राजा दौरि सिर नायौ देखि महिमा अपार है।।
भीजि गयौ हियौ दास भाव दृढ़ लियौ पियौ, भक्तिरस शिष्य ह्वै कै जान्यौ सोई सार है।
अबलौं हूँ प्रीति सुत नाती वही रीति चलैं, होय जौ प्रतीति प्रभु पावै निरधार है।।३१०।।