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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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हुए सुगन्धमय पराग से मनोहर, परम शोभा के धाम श्री
शिवजी के अंगों की सुन्दरतायें परमानन्दयुक्त हमारे मन की
प्रसन्नता को सर्वदा बढ़ाती रहें ॥१४॥
प्रचंडवाडवानलप्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनीजनाबहूतजल्पना ।
विमुक्तवामलोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषणो जगज्जयाय जायताम् ॥१५॥
प्रचण्ड बड़वानल की भांति पापों को भस्म करने में स्त्री
स्वरूपिणी [अणिमादिक अष्ट महासिद्धियों तथा चंचल नेत्र
वाली देवकन्याओं से शिव विवाह के समय में गान की गई
मंगलध्वनि सब मन्त्रों में परम श्रेष्ठ शिव मन्त्र से पूरित,
सांसारिक दुःखों को नष्ट कर विजय पावें ॥१५॥
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पटन्स्मरबन्धु वन्नरो विशुद्धमेति सन्ततम् ।
हरे गुरौ स भक्तिमाशु याति नान्यथा गति
विमोहनं हि देहिना तु शंकरस्य चिन्तनम् ॥१६॥