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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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इस उत्तमोत्तम शिवताण्डव श्लोक को नित्य प्रति मुक्त
कण्ठ से पढ़ने से या श्रवण करने से सन्तति वगैरह से पूर्ण हरि
और गुरु में भक्ति बनी रहती है जिसकी दूसरी गति नहीं होती
शिव की ही शरण में रहता है ॥१६॥
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शंभुः ॥१७॥
शिव पूजा के अन्त में इस रावणकृत शिवताण्डव स्तोत्र
का प्रदोष समय में गान करते से पढ़ने से लक्ष्मी स्थिर रहती
है । रथ, गज, घोड़ा से युवत सर्वदा रहता है ॥१७॥
इति श्रीरावणविरचितं शिवतांडवस्तोत्रं भाषाटीका सहितं संपूर्णम
॥ श्रीशिवार्पणमस्तु ॥