शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shiva Tandava Stotram of Ravana
दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा
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हे भगवन ! तृणतुल्य त्रिपुरासुर को जलाने के लिए आपने
इतना आडम्बर अर्थात् पृथ्वी का रथ; सारथी ब्रह्मा जी, हिमा-
लय पर्वत का धनुष, रथ के पहिये चन्द्रमा और सूर्य, श्रीविष्णु-
रूपी बाण रचा है। तो क्या त्रिपुरासुर रूपी तृण तोड़ने को भी
इतने कठिन कार्य आपने किये ? जबकि संसार का संहार क्षण-
मात्र में ही कर सकते हैं। समर्थ लोग अपने अधीनों के साथ
खेलने से पराधीन नहीं माने जाते हैं ॥१८॥
हरिस्ते साहस्रं कमलबलिमाधाय पदयो
र्यदेकोने तस्मिन्निजमुदहरन्नेत्रकमलम्
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर ! जागर्ति जगताम् ॥१९॥
सहस सरोजन उपायन लै रोज रोज
पाँयन मैं रावरे चढ़ायो हरि नेम सौं
ऊन लखि एक एक दिन दुनौ मानि
निज नैन कजहू निकाशी धरयो प्रेम सौं
वाई भक्ति भूरि फरी कर में सुदर्शन है
दीपै जो समीप सदा श्रीपति के हेम सौं
सोक हरिबे कौं, भरिबे कौं तीन लोकन कौं
सोई त्रिपुरारि चक्र जागै सदा क्षेम सौं ॥१९॥