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शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)

Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary

गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित द्वारा

DevanagariSanskritpublished35 पृष्ठ

३. त्रिपुरासुर-वध, गङ्गावतरण व रावण-अनुग्रह (श्लोक २१-३०)

२० शिवमहिम्नस्तोत्रम्
हे महेश्वर ! मैं नहीं जानता कि आप कैसे हैं ? आप चाहे जैसे
हों, आपके लिये मेरा नमस्कार है ॥ ४१ ॥
एकाकालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते ॥४२॥
हे प्रभु ! प्रातःकाल या दोपहर या सायंकाल में या तीनों काल में
जो आपकी महिमा का गान करेगा, वह सब पापों से छूटकर आपके
लोक में सुख पूर्वक निवास करेगा ॥ ४२ ॥
इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्करपादयोः ।
अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः ॥४३॥
इस प्रकार इस वाङ्मयी पूजा को मैं श्रीशङ्करजी के चरणों में
अर्पण करता हूँ, जिससे श्रीमहादेवजी मुझपर प्रसन्न रहें ॥ ४३ ॥
॥ इति भाषाटीकोपेतं श्रीशिवमहिम्नस्तोत्रं समाप्तम् ॥

अथ रावण कृत-
शिवताण्डव-स्तोत्रम्
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां मुजंगतुं गमालिकाम् ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ।१।
जिन्होंने जटारूप अटवी (वन) से निकलती हुई गंगाजी के
गिरते हुए प्रवाहों से पवित्र किये गये गले में सर्पों की लटकती हुई
विशाल माला को धारणकर, डमरूके डम-डम शब्दोंसे मण्डित प्रचण्ड
ताण्डव (नृत्य) किमा, वे शिवाजी हमारे कल्याणका विस्तार करें ।१।
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ।२।
जिनका मस्तक जटारूपी कड़ाह मै वेगसे घूमतीहुई गंगाकी चंचल
तरंग, लताओंसे सुशोभित हो रहा है, ललाटाग्नि धक्-धक् जल रही है

२२ शिवताण्डवस्तोत्रम्
सिर-पर बाल चन्द्रमा विराजमान हैं, उन (भगवन् शिव) में मेरा
निरन्तर अनुराग हो ॥ २ ॥
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासन्धुबन्धुर-
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
कचिद्दिगम्बरे मनो विनोद मेतु वस्तुनि । ३ ।
गिरिराजकिशोरी पार्वती के विलासकालोपयोगी शिरोभूषण
से समस्त दिशाओं को प्रकाशित होते देख जिनका मन आनन्दित हो
रहा है, जिनकी निरन्तर कृपादृष्टिसे कठिन आपत्ति का भी निवारण
हो जाता है; ऐसे किसी दिगम्बर तत्त्वमें मेरा मन विनोद करे ॥ ३ ॥
जटाभुजंगंपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदम्बकुंकुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ।४।
जिनके जटाजूटवर्ती भुजंगमों के फणों की मणियों
का फैलता हुआ पिंगल प्रभापुञ्ज दिशारूपिणी अंगनाओंके मुखपर
कुंकुमरागका अनुलेप कर रहा है, मतवाले हाथी के हिलते हुए चमड़े
का उत्तरीय वस्त्र (चादर) धारण करने से स्निग्धवर्ण हुए उन भूत-
नाथमें मेरा चित्त अद्भुत विनोद करे ॥ ४ ॥
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।

भाषा-टीका-सहितम् २३
भुजंगराजमालया निबद्धजट जूटकः
श्रियैचिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ।५।
जिनकी चरणपादुकाएँ इन्द्र आदि समस्त देवताओंके (प्रणाम
करते समय) मस्तकवर्ती कुसुमों की धूलिसे धूसरित हो रही हैं,
नागराज (शेष) के हार से बँधी हुई जटावाले वे भगवान चन्द्रशेखर
मेरे लिए चिरस्थायिनी सम्पत्ति के साधक हों ॥ ५ ॥
ललाटचत्वरज्वलद्धनंजयस्फुलिंगभा-
निपीतपंचसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः ।६।
जिसने ललाट-वेदीपर प्रज्वलित हुई अग्नि के स्फुलिंगों
के तेज से कामदेव को नष्ट कर डाला था, वह (श्रीमहादेवजीका)
उन्नत विशाल ललाटवाला जटिल मस्तक हमारी सम्पत्ति का साधक
हो ॥ ६ ॥
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्वनंजयाहुतीकृतप्रचण्डपंचसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्प नैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ।७।
जिन्होंने अपने विकराल भालपट्ट पर धक्-धक् जलती
हुई अग्नि में प्रचण्ड कामदेव को हवन कर दिया था, गिरिराज-

२४ शिवताण्डवस्तोत्रम्
किशोरीके स्तनों पर पत्रभंग-रचना करने के एकमात्र कारीगर उन
भगवान् त्रिलोचन में मेरी धारणा लगी रहे ॥ ७ ॥
नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुर-
त्कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ।८।
जिनके कण्ठमें नवीन मेघमालासे घिरीहुई अमावस्याकी आधी
रातके समय फैलते हुए दुरूह अन्धकारके समान श्यामता अंकित है;
जो गजचर्म लपेटे हुए हैं, वे संसारभार को धारण करने वाले चन्द्रमा
(केसम्पर्क) से मनोहर कान्तिवाले भगवान् गंगाधर मेरी सम्पत्ति का
विस्तार करें ॥ ८ ॥
प्रफुल्लनीलपंकजप्रपंचकालिमप्रभा-
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ।६।
जिनका कण्ठदेश खिले हुए नीलकमल समूह की श्यामप्रभा
का अनुकरण करने वाली हरिणीकी-सी छवि वाले चिन्ह से सुशोभित
है तथा जो कामदेव, त्रिपुर, भव (संसार), दक्ष-यज्ञ, हाथी, अन्धका-
सुर और यमराजका भी उच्छेदन करनेवाले हैं उन्हें मैं भजता हूँ॥६॥
अखर्वसर्वमंगलाकलाकदम्बमंजरी-

भाषा-टीका-सहितम् २५
रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम् ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥
जो अभिमानरहित पार्वतीकी कलारूप कदम्बमंजरी के मकर
न्दस्रोतकी बढ़ती हुई माधुरीकोपान करनेवाले मधुप हैं तथा कामदेव,
त्रिपुर, भव, दक्ष-यज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराज का भी अन्त
करने वाले हैं, उन्हें मैं भजता हूँ ॥ १० ॥
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजंगमश्वस-
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदंगतुंगमंगल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥
जिनके मस्तक पर बड़े वेग के साथ घूमते हुए भुजंग के फुफ-
कारने से ललाट की भयंकर अग्नि क्रमशः धधकती हुई फैल रही है,
धिम-धिम बजते हुए मृदंग के गम्भीर मंगल घोष के क्रमानुसार
जिनका प्रचण्ड ताण्डव हो रहा है, उन भगवान् शंकरकी जय हो ॥११॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंगमौक्तिकस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदासदाशिवं भजाम्यहम् ॥१२॥

२६ शिवताण्डवस्तोत्रम्
पत्थर और सुन्दर बिछौनों में, सांप और मुक्ता की माला में,
बहुमूल्य रत्न तथा मिट्टी के ढेले में, मित्र या शत्रुपक्षमें, तृण अथवा
कमललोचना तरुणी में, प्रजा और पृथ्वी के महाराज में समानभाव
रखता हुआ मैं कब सदाशिव को भजूँगा ॥ १२ ॥
कदानिलिम्पनिर्झरीनिकुंजकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन् ।
विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवःम्यहम् ।१३।
सुन्दर ललाटवाले भगवान् चन्द्रशेखर में दत्तचित्त हो अपने
कुविचारों को त्यागकर गंगाजी के तटवर्ती निकुंज के भीतर रहता
हुआ सिरपर हाथ जोड़ डबडबाई हुई विह्वल आंखों से 'शिव' मन्त्र
का उच्चारण करता हुआ मैं कब सुखी होऊँगा ? ॥ १३ ॥
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम् ।
हरे गुरौसुभक्तिमाशु यातिनान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहनां सुशंकरस्य चिन्तनम् ।१४।
जो मनुष्य इस प्रकार से उक्त उत्तमोत्तम स्तोत्रका नित्य
पाठ, स्मरण और वर्णन करता रहता है, वह सदा शुद्ध रहता है और
शीघ्र ही सुरगुरु श्रीशंकरजीकी अच्छी भक्ति प्राप्त कर लेता है, वह
विरुद्धगति को नहीं प्राप्त होताः क्योंकि श्रीशिवजी का अच्छी प्रकार
चिन्तन प्राणिवर्गके मोह का नाश करने वाला है ॥ १४॥