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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 511 में से

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पृष्ठ 94

६० ] [ श्रीशारदा तिलक
धत्तूरं सर्जकं बिल्वममणं मुनिपत्रकम्।
अन्यान्यपि सुगन्धान पत्रपुष्पाणि देशिकैः ।१०३
उपदिष्टानि पूजायामाददीत विचक्षणः ।
मलिनं भूमिसंस्पृष्ट कृमिकेशादिदूषितम् १०४
अङ्गरस्पृष्टं समाघ्रातं त्यजेत्पर्युषित गुरुः ।
देवस्य मस्तकं कुर्यात्कुसुमोपहितं सदा ।१०५
न्यास क्रम से मंत्र के द्वारा सम्पुटित मातृका के अक्षरों से देवी का
अभ्यर्चन करके गन्ध आदि उपचारों के द्वारा फिर अङ्ग आदिका पूजन
करे ।६६। जोपूजन गन्ध चंदन, कपूर, कालागुरु,से बतलाता गया है ।
पूजन में कौन-कौन से पुष्पों का ग्रहण करना चाहिये-यह बत-
लाया जाता है-दो कमल दो करवीर दो कुमुद, दो तुलसीदल,
जाती के दो पुष्प, दो केतकी पुष्प, कल्हार, और चम्पा, उत्पल कुन्द,
मन्दार, पुन्नाग, पाटला, नाग चम्पा, आरग्वध, कर्णिकार, पारन्ती, नव
मल्लिका, सौगन्धिक, कोरण्ट,पलाश, अशोक, मल्लिका, धतूर, सर्जक,
बिल्व, पत्र, मुनिपत्रक ये तथा अन्य भी सुगन्धित पत्र पुष्प आचार्यों के
द्वारा पूजामें उपदिष्ट किये गये हैं । विचक्षण पुरुष इनका आदान करे ।
गुरुदेव ऐसे पुष्पों का त्याग कर देवे जो मलिन अर्थात् मुर्झाया हुआ हो
जिस पुष्प को भूमि का स्पर्श हो गया हो अर्थात् जो वृक्ष से टूटकर
भूमि पर गिर गया हो-तो कृमि और केशादि के द्वारा दूषित हो गया
हो-जिस पुष्प का किमी भी अङ्ग द्वारा स्पर्श हो गया हो-जिसका
अवघ्राण कर लिया हो गया और जो पर्युषित अर्थात् वासी हो, उस
पुष्प का परित्याग कर देना चाहिये । सदा ही कुसुमों को देवता के
मस्तक पर उपहित करे ।१००-१०५।
पूजाकाले देवतया नोपरि भ्रामयेत्करम् ।
अगूरूशीरगुग्गुलशर्करामधुचन्दनैः ।१०६
धूपयेद्वाज्यसंमिश्रैर्नार्चिर्देवस्य देशिकः ।
वर्त्या कर्पूरभिण्या सर्पिषा तिलजेन वा ।१०७