शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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आरोप्य दर्शयेद्दीपानुच्चैः सौरभशालिनः ।
स्वाद्वूपदंशं विमलं पायसं सहशर्करम् । १०८
कदलीफलसंयुक्तं साज्यं मन्त्री निवेदयेत् ।
तत्रतत्र जलं दद्यादुपचारान्तरान्तरे । १०६
अङ्गादिलोकपालान्तं यजेदावरणान्यपि ।
केसरेष्वग्निकोणादिहृदयादीनि पूजयेत् । ११०
नेत्रमग्ने दिजास्त्रस्त्रं ध्यातव्या अङ्गदेवताः ।
तुषारस्फटिवश्यामनीलकृष्णारणार्चिषः । १११
वरदाभयधारिण्यः प्रधानतनवः स्त्रियः ।
पश्चादभ्यर्चनीयाः स्युः कल्पोक्ताऽऽवृत्तवः क्रमात् । ११२
पूजा के समय में देवता के ऊपर हाथ को भ्रामित नहीं करना
चाहिये । देशिकवर को चाहिये कि अगरु, शीर, गुग्गुलु-शर्करा, मधु,
चन्दन आज्य से सम्मिश्रित करके देवताके नीचे धूप देवे । कर्पूर गर्भित
वत्ती से-घृत अथवा तिलों के तैल से आरोपित करके सौरभ शाली
दीपों को दर्शित करना चाहिये । मन्त्रधारी पुरुषको चाहिये कि स्वादू-
पदंश, विमल, शर्करा से युक्त पायस, कदली के फलों से संयुत तथा
आज्य में समन्वित निवेदन करे । उपचारों के बीच-बीच में वहाँ पर
जल निवेदित करना चाहिए ।१०६-१०६। अङ्गों से आदि लेकर लोक
पालों के-अन्त पर्यन्त आवरणों का यजन करे । केसरों में अग्निकोण से
आदि हृदय प्रभृति का पूजन करना चाहिए । ११०। आगे नेत्र-दिशाओं
में अस्त्र और अङ्ग देवता का ध्यान करना चाहिए । तुषार, स्फटिक,
श्याम,नील,कृष्ण और अरुण अर्चियों से संयुत,वरदान और अभयदानको
धारण करन वाली प्रधान तनु स्त्रियाँ क्रम से कल्पोक्त आवृत्तियों
से युक्त पश्चात् अभ्यर्चन करने के योग्य है । १११-११२।
अन्ते यजेल्लोकपालान्मूलपारिषदन्वितान् ।
हेतिजात्यधिगोपेतान्दिक्षु पूर्वांदितः क्रमात् । ११३