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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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चतुर्थ पटल ] [ ८१
आज्यन्दधिमधून्मिश्रमेतदुक्तं मनीषिभिः ।
तेनैव मनुना कुर्यादिभिराचमनीयकम् ।६७
गन्धाद्भि कारयेत्स्नानं वाससी परिधापयेत् ।
दद्याद्यज्ञोपवीतं च हाराद्याभरणैः सह ।६८
इसके अनन्तर मन्त्र का ज्ञाता पुरुष स्वागत आदि उपचारों का
समाचरण करे । गुरु आगे स्वागत और कुशल प्रश्नका कथन करो।६२।
हृदयाणु के द्वारा देव के चरण कमल में पाद्य देवे । यह श्यामाक दूर्वा-
कमल और विष्णु कान्ता से कहा है ।६३। सुधामन्त्र के द्वारा मुख
में आचमनीय अर्पितकरे । वह आमचनीयजाती फल लौंग और ककोलसे
युक्त तन्त्र के वेत्ताओं के द्वारा कही गयी है ।६४। इसके उपरान्त
देशिक (आचार्य) शिरोमन्त्र के द्वारा मूर्धा में अर्घ्य देवे। गन्ध-पुष्प-
अक्षत-यव कुशाग्र-तिल-सर्षप-दूर्वा से सभी देवों का अर्घ्य कहा गया है ।
सुधामन्त्र के द्वारा मुख कमल में मधुपर्क समर्पित करना चाहिये ।६५।
।६६। उस मधुपर्क को मनीषियों ने यही बतलाया है कि वह आज्य-
दधि और मधु संमिश्रित होता है । उसी मन्त्र के द्वारा जल से आच-
मन करे ।६७। गन्ध आदि से मिश्रित जल से स्नान करावे और फिर
वस्त्रोंका परिधापन करना चाहिये । हार अदि आभरणोंके सहित यज्ञो-
पवीत का समर्पण करे ।६८।
न्यासक्रमेण मनुना पुटितैर्मातृकाक्षरैः ।
अभ्यर्च्य देवीं गन्धाद्यैरङ्गादीन्पूजयेत्ततः ।६६
गन्धश्चन्दनकर्पूरकालागुरुभिरीरितः ।
कमलेकरवीरे द्वे कुमुदे तुलसीद्वयम् । १००
जातीद्वयं केतके द्वे कह्लारं चम्पकोत्पले ।
कुन्दमन्दारपुन्नागपाटलानागचम्पकम् ।१०१
आरग्वधं कर्णिकारं पारन्ती नवमल्लिका ।
सौगन्धिकं सकोरण्टं पलाशशोकमल्लिकाः । १०२