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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 511 में से

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पृष्ठ 378

३७८ ] [ श्रीशारदा तिलक
का अभ्यर्चन करे । श्याम--रक्त उत्पल को कर में लिये हुये--उस
कर को वामाङ्ग में न्यस्त करने वाले--तीन नेत्रों से युक्त तथा रक्त
वर्णं के वस्त्रों से आवृत उमापति का अर्चन करना चाहिए । वहाँ पर
ब्रह्माणी आदि आठ माताओं का पूजन करे जिनके लक्षण बताये जा
चुके हैं ।४७-४६।
इन्द्रादिकांल्लोकपालान् स्वस्वदिक्षु समर्चयेत् ।
वज्रादीनि तदस्त्राणि तद्बहिः क्रमशोऽर्चयेत् ।५०
एव योभजते मन्त्री देवेश तमुमापतिम् ।
स भवेत्सर्वलोकानां प्रियः सौभाग्यसम्पदाम् ।५१
सान्तःसद्यान्तसंयु क्तो बिन्दुभूषितमस्तकः ।
षड्दीर्घयुक्तवीजेन षडङ्गविधिरीरितः ।
वामदेवो मुनिश्चन्दः पँक्तिदेवः सदाशिवः ।५३
ईशानादीर्घ्यं सेन्मूर्त्तिरङ्गुष्ठादिषु देशिकः ।
ईशानाख्यं तत्पुरुषमघोर तदनन्तरम् ।५४
वामदेवाह्वायं सद्यमासां वीजं क्रमाद्विदुः ।
ओकाराद्यैः पञ्चह्रस्वैर्विलोमात्संयु त वियत् ।५५
तत्तदङ्ग॰ लिभिर्भू यस्तत्तद्वीजादिकान्यसेत् ।
शिरोवदनहृद्गुह्यपादशेषे यथाक्रमम् ।५६
ऊर्ध्वप्राग्दक्षिणोदीच्यपश्चिमेषु मुखेषु ताः ।
ततः प्रविन्धसेद्विद्वानष्टत्रिंशत्कलास्तनौ ।५७
इन्द्र देव आदि लोकपालों का अपनी-अपनी दिशाओं में समर्चन
करे । वज्र आदि जो उनके आयुध हैं उनके बाहर उनका क्रम से पूजन
करना चाहिए । जो मन्त्र के धारण करने वाला पुरुष इस प्रकार
से देवेश्वर उमापति का सेवन किया करता है वह पुरुष सब लोकों का
प्रिय और सौभाग्य--सम्पदाओं का स्थान हों जाया करता है ।५१।
अब प्रसाद मन्त्र को उद्धार के सहित बताया जाता है--सान्त--हः,