शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 377, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंषोडष पटल ] [ ३७७
प्रभा से युक्त हैं ॥४१॥ ऐसे तीन नेत्रधारी और दिगम्बर (नग्न) क्षेत्र-
पाल का अर्चन करे ।४२।
क्षेत्रपालं त्रिनयनं दिगम्बरमथार्चयेत् ।
शूलटङ्काक्षवलयक्रमण्डलूल्लसत्करम् ।४३
रक्ताकारं त्रिनयनं चण्डेशमथ पजयेत् ।
चक्रशंखभयाभीष्टकरां मरकतप्रभाम् ।४४
दुर्गा प्रपूजयेत्सौम्यां त्रिनेत्रां चारुभूषणाम् ।
कल्पशाखा रत्नघण्टां दधानं द्वादशेक्षणम् ।४५
बालार्कभं शिशुं कान्तं षण्मुख पूजयेत्ततः ।
नन्दिनं पूजयेत्सौम्यं रत्नभूषणमण्डितम् ।४६
परश्वेणवराभीतिप्रारिणं श्यामविग्रहम् ।
पाशांकुशवराभीष्टधारिणं कुंकुमप्रभम् ।४७
विघ्ननायकमभ्यर्च्यच्चन्द्रार्द्ध कृत्तशेखरम् ।
श्यामरक्तोत्पलकरं बामाङ्गन्यस्ततत्करम् ।४८
त्रिनेत्रं रक्तावस्त्राढ्यं सेनापतिमर्चयेत् ।
ततोष्टमातरः पूज्या ब्राह्मयाद्याः प्रोक्तलक्षणाः ।४६
त्रिशूल-टङ्क-अक्षवलय--और कमण्डल से सुशोभित करो वाले
।४३। रक्त वर्ण से युक्त आकार वाले तीन नेत्रों को धारण किये हुए
चण्डेश का पूजन करे । शंख, चक्र, अभय और अभीष्ट को करों में
धारिणी--मरकतमणि की प्रभा से समन्वित--तीन नयनों वाली तथा
मनोहर भूषणों से विभूषिता सौम्य स्वरूप वाली दुर्गा का अभ्यर्चन
करना चाहिए । कल्प शाखा अर्थात् कल्प वृक्षकी डाली और रत्न घण्टा
को धारण करने काले बारह नेत्रों से युक्त, बालार्क सूर्यके समान आभा
वाले-परम कान्त शिशु षण्मुखका इसके अनन्तर अर्चन करना चाहिए ।
परम सौम्य और रक्त वर्ण के भूषणों से भूषित नन्दी का यजन करे ।
।४६। परशु--वर--अभीति के धारी--कुंकुम के समान प्रभा
से युक्त तथा अर्ध चन्द्रसे अपना मुकुट बनाये हुए भगवान् विघ्न नायक