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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 379, कुल 511 में से

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पृष्ठ 379

षोडष पटल ] [ ३७६
सद्यान्त--औ, इससे संयुक्त हो और मस्तक में बिन्दु अर्थात् अनुस्वार
से भूषित होवे । यह प्रासाद नाम वाला मन्त्र कहा गया है जो सेवन
करने वालोंको सब सिद्धियाँ प्रदान करने वाला होता है । ५२। षडगदीर्घ
युक्त बीज के द्वारा इस मन्त्र की षडङ्ग विधि कही गयी है । इस मन्त्र
का ऋषि वाम देव हैं और छन्द पंक्ति कहा गया है । देव इसका सदा-
शिव होते हैं । ५३। ईशानादि मूर्तियों का अंगुष्ठ आदि में न्यास
करे । ईशान नामक, तत्पुरुष, अघोर--वामदेव और सद्य इन मूर्तियों
के बीज क्रम से जान लेने चहिये । ओंकार आदि पाँच ह्रस्वों से विलोम
से संयुत विप्त् को उस-उस अंगुलियों से फिर उन-उन बीजादि का
न्यास करना चाहिये । शिर, मुख, हृदय, गुह्य, पाद, शेष में
क्रम के अनुसार न्यास करे । ऊर्ध्व, पूर्व, दक्षिण, उत्तर, पश्चिम
में मुखों में उनका विद्वान् फिर तनु में अड़तीस कलाओं का विन्यास
करे । ५ -५७।
ईशानाद्या ऋचः सम्यगंगुलीषु यथाक्रमम् ।
द्यङ्गुष्ठादिकनिष्ठान्तां न्यसेद्देशिकसत्तम । ५८
मूर्द्धास्यहृदयाम्भोजगुह्यपादेषु ता पुनः ।
वक्त्रैषूद्द्वादिष न्यस्येदभूयोऽङ्गानि प्रकल्पयेत् ५६
तारपञ्चकमुच्चार्यसर्वज्ञाय हृदीरितम् ।
अमृते तेजोमालिनि तृप्तायेति पदं पुनः । ६०
तदन्ते ब्रह्मशिरसे शिरोऽङ्गं ज्वलितं ततः ।
शिखि शिखाय परतोऽनादिबोधाय तच्छिखा । ६१
वज्रिणे वज्रहस्ताय स्वतन्त्राय तनुच्छतम् ।
मौं वौ हौंमिति संभाष्य पुरतोऽलुप्तशक्तये । ६२
नेत्रमुक्तं श्लींपशूहूँ फडन्तेऽनन्तशक्तये ।
अस्त्रमुक्तं षडंगानि कुर्याद्देशिकसत्तमः । ६३
श्रेष्ठ आचार्य को चाहिए कि वह ईशा नाद्य ऋचाओं का भली
भांति क्रम के अनुसार अंगुष्ठ से आदि लेकर कनिष्ठिका के अन्त पर्यन्त