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सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 511 में से

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पृष्ठ 298

२६८ ] [ श्री शारदा तिलक
विद्यापङ्कजदर्पणं मणिमयं कुम्भं सरोजं गदां ।
शङ्खं चक्रममूनि विभ्रदमितां दिश्याच्छ्रियं वः सदा ।५१
वर्णलक्षं जपेदेनं तत्सहस्रं सरोरुहैः ।
होमं कुर्याद्विकसितैर्मधुरत्रयसंयुतैः ।५२
पूजा स्याद्वैष्णवीपीठे द्वादशाक्षरवर्त्मना ।
पायसेन कृतोहोमो लक्ष्मीवंश (वश्य) प्रदायकः ।५३
मधुराक्तैस्तिलैर्हुत्वा सर्वकार्याणि साधयेत् ।
तारो हृद्विष्णवे पश्चात् ङेन्तः सुरपतिर्भवेत् ।५४
महावलाय ठद्वन्द्वं मनुरष्टादशाक्षरः ।
ऋषिरिन्दुविराट्छन्दो देवता दधिवामनः ।५५
अब ध्यान कहा जाता है-विद्युल्लता और चन्द्र के सदृश-कमल
जा (लक्ष्मी) और वैकुण्ठ नारायण की एकता को स्नेह के वश से प्राप्त
हुआ-रत्नों से सुशोभित सुन्दर भूषणोंसे समलंकृत, विद्या, पंकज, दर्पण,
मणियों से परिपूर्ण कुम्भ, सरोज, गदा, शंख, चक्र, इनको धारण करने
वाला वपु आपकी अमित श्री को प्रदान करे ।५१। इस मंत्र का वर्ण
लक्ष अर्थात् जितने भी मंत्र में वर्ण होवें उतने ही लाख जप करना
चाहिये । जितने लाख जप होंवे उतनी ही सहस्र सरोरुहोंके द्वारा आहु-
तियां देकर होम करो । सरोरुह विकसित होवे और मधुर त्रय से अक्त
होने चाहिये ।५२। द्वादशाक्षर मंत्र के ही मार्ग के द्वारा वैष्णवी पीठ
पर पूजा होनी चाहिये । पायस के द्वारा किया हुआ होम लक्ष्मी के
वश्य का प्रदाता होता है ।५३। मधुर त्रय में अक्त किये हुये तिलों के
द्वारा होम करके सभी कार्यों का साधन किया करता है । अब दधि
वामन मंत्र का उद्धार कहा जाता है-तार-प्रणव, हृत्-नमः, फिर
विष्णव- यह पद, पीछे चतुर्थ्यन्त सुरपति पद होना चाहिये । इसके
पश्चात् 'महावलाय'यहपद और दो ठकार अर्थात् ठः-ठः होना चाहिये ।
यह मंत्र अठारह अक्षरों वाला होता है । इसका ऋषि इन्दु है और
विराट् छन्द है और इसका देवता दधि वामन होता है ।५४-५५।