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सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 511 में से

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पृष्ठ 297

त्रयोदश पटल ] [ २६७
दूसरी वासुदेव आदि के द्वारा करे । शक्ति आदिके सहित द्वादश मूर्तियों
से तीसरी आवृत्ति होती है । सुरनाथादि के द्वारा चौथी और वज्रादि
द्वारा पाँचवीं आवृत्ति की जाती हैं ।४५। इस तरह से पूजित किया
गया अपना अभीष्ट प्रदान कर दिया करते हैं ।४६।
पायसेन घृताक्तेन मन्त्रवर्णसहस्रकम् ।
जुहुयान्मनसः शुद्धयै समिद्भिः क्षीरभूरुहाम् ४७
तत्संख्यया यथोक्ताभिः सर्वपापविमुक्तये ।
हृल्लेखाबीजयुगलं रमाबीजयुगं पुनः ।४८
लक्ष्म्यन्ते वासुदेवाय हृदन्तः प्रणवादिकः ।
चतुर्दशाक्षरोमन्त्रः प्रोक्तोऽयं सुरपादपः ।४६
हृदयं शक्तिबीजाभ्यां रमाभ्यां शिर ईरितम् ।
लक्ष्म्यै प्रोक्ता शिखा वर्म वासुदेवाय कीर्त्तितम् ।
नमसास्त्रं समुद्दिष्टं सर्वं तारादि कल्पयेत् ।५०
घृत में अक्त पायस से मन्त्रके वर्ण जितने हैं उतने ही सहस्र आहू
तियाँ देनी चाहिये । यह हवन मन की शुद्धि के लिए दूध वाले वृक्षों की
समिधाओंसे करना चाहिये ।४७। सब पापों की विमुक्तिके लिये यथोक्त
संख्या में होम करे । अब लक्ष्मी वासुदेव मन्त्र का उद्धार बताया जाता
है-हृल्लेखा, भुवनेशी बीज रमा—श्री बीज ये दोनों के बीजों का
युगल होना चाहिये । लक्ष्मी पद के अन्त में ‘वासुदेवा’ यह पद होवे
अन्त में ‘नमः’-यह पद और आदि में प्रणव होना चाहिए । यह चौदह
अक्षरों वाला मन्त्र कल्पवृक्ष जैसा ही कहा गया है । जैसे कल्पवृक्ष सब
मनोरथों को पूर्ण करता है वैसे यह भी मनोभीप्सितों को पूर्ण किया
करता है ।४८-४६। शक्ति बीजों से हृदय और रमा के बीजों से शिर
कहा गया है । लक्ष्म्यै शिखा और वासुदेवाय वर्म कहा गया है । नम-
स् से अस्त्र उद्दिष्ट किया है और तारादि से सबकी कल्पना करे ।५०।
विद्युच्चन्द्रनिभं वपुः कमलजावैकुण्ठयोरेकतां ।
प्राप्तं स्नेहवशेन रत्नविलसद्भूषाभिरालङ्कृतम् ।