शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदश पटल ] [ २६६
हृदयेन शिरोद्वाभ्यां शिखा त्रिभिरुदीरिता ।
कवचं पञ्चभिः प्रोक्तं नेत्रं तावद्भिरक्षरैः ।५६
द्वाभ्यामस्त्रमिति प्रोक्तः प्रकारोऽङ्गस्य सूरिभिः ।
मूर्द्धनि भाले दृशोर्युग्मे कर्णनासोष्ठतालुषु ।५७
कण्ठे बाहुद्वये पृष्ठे हृदयोदरनाभिषु ।
गुह्योरुजानुयुग्मेषु जङ्घयोः पादयोर्न्यसेत् ।
अष्टादश मनोर्वर्णान् पश्चादेनं विचिन्तयेत् ।५८
मुक्तागौरं नवमणिलसद्भूषणं चन्द्रसंस्थम् ।
भृङ्गाकारैरलकनिकरैः शोभिवक्त्रारविन्दम् ।
हस्ताब्जाभ्यां कनककलशं शुद्धतोयाभिपूर्णम् ।
दध्यन्नाढ्यं कनकचषकं धारयन्तं भजामः ।६०
हृदय से शिर-दो से, शिखा तीन से कही गयी है । कवच पाँच
से कहा गया है । यह अङ्ग का प्रकार सूरियों के द्वारा कहा गया है ।
तथा नेत्र भी उतने ही अक्षरों से होता है तथा दो से अस्त्र बताया
गया है। इसके न्यास का क्रम यह है कि-मूर्धा, भाल, दोनों नेत्र,
कान, नासिका, ओष्ठ, तालु, कण्ठ, दोनों बाहु, पृष्ठ दोनों जाँघ, और
दोनों पदों में न्यास करना चाहिये । ये मंत्र के अठारह वर्णों का न्यास
है। इसके पश्चात् इनका चिन्तन करे ।५६-५८। अब ध्यान बताया
जाता है—मुक्ता के समान गौर वर्ण से अन्वित नौ प्रकार की मणियों
से कान्ति युक्त भूषण वाले-चन्द्र में विराजमान, भ्रमरों के आकार
वाले अलकों (केशों) के समूहों से परम शोभा युक्त मुख कमल से सम-
न्वित-दोनों करकमलों से शुद्ध जल से परिपूर्ण दो कलशों को धारण
किये हुये -- दधि अन्न से युक्त सुवर्ण के चषक को धारण करने वाले का
हम भजन करते हैं ।६०।
गुणलक्षं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशं घृतप्लुतैः ।
पायसान्नैः प्रजुहुयाद्दध्यन्नं वा यथाविधि ।६१