शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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पाँच वर्णों से कवच माना गया है। सम्पूर्ण से अस्त्र होता है। यह अङ्गों
की कल्पना की गयी है ।४०। मूर्द्धा में-भाल-नेत्रों में-गले में-
बाहुओं में, हृदयाम्बुज में, कुक्षि, नाभि-ध्वज दोनों जानु और दोनों
पैरों में न्यास करना चाहिये ।४१।
विष्णुं शारदचन्द्रकोटिसदृशं शङ्खं रथाङ्गं गदा।
मम्भोजं दधतं सिताब्जनिलयं कान्त्या जगन्मोहनम् ।
आवद्धांगदहारकुण्डलमहामौलि स्फुरत्कङ्कणं ।
श्रीवत्साङ्कमुदारकौस्तुभधरं वन्दे मुनीन्द्रैः स्तुतम् ।४२
वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं दीक्षितोविजितेन्द्रियः ।
तत्सहस्रं प्रजुहुयात्तिलैराज्यपरिप्लुतैः ।४३
पीठे प्रागीरिते मूत्ति मूलमन्त्रेण कल्पयेत् ।
पूजयेद्विधिनाऽनेन वासुदेवं विधानवित् ।४४
प्रथमावृतिरङ्गैः स्याद् वासुदेदादिभिः परा ।
शान्त्यादिशक्तिसहितैः परा द्वादशमूर्त्तिभिः ।४५
चतुर्थी सुरनाथायैर्वज्राद्यैः पञ्चमी मता ।
एवं सम्पूजितोविष्णुः प्रदद्यादिष्टमात्मनः ।४६
अब ध्यान बतलाया जाता है-शरद्काल में उदीयमान करोड़ों
चन्द्रों के समान-शंख, चक्र, गदा और पद्म को धारण करते हुए-
श्वेत कमल में निवासी, कान्ति के द्वारा जगत् को मोहन करने वाले-
अङ्गद, हार, कुण्डल और मौलिमुकुट को बाँधे हुये-स्फुर्तमणि कंकणों
से संयुत - श्रीवत्स के चिन्ह से युक्त, कौस्तुभधारी-मुनीन्द्रोंसे स्तुति किये
जाते, भगवान् विष्णु की वन्दना करता हूँ ।४२। मन्त्र में जितने वर्ण हैं
उतने लाख मन्त्र का दीक्षित तथा इन्द्रियों को जीतने वाला होकर जप
करे । उतने ही सहस्रका घृत में परिप्लुत तिलोंके द्वारा होम करे ।४३।
पूर्व में बताये हुये पीठ में मूल मन्त्र से मूत्ति की कल्पना करनी
चाहिये । विधान के ज्ञाता पुरुष को इसी विधान से भगवान वासुदेव
का पूजन करना चाहिए ।४४। प्रथम आवृत्ति अङ्गों से होती है और