शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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इन्द्र आदि ओर उनके अस्त्रों का पूर्व की तरह से समर्चन करे । उस
प्रकार से भक्तों पर दया करने वाले भास्कर देव का विधि के साथ
पूजन करके प्रतिदिन अर्घ्यदेवे अथवा उनके प्रेरित वार (दिन) में देवे ।
प्रभात से मण्डल की रचना करके पूर्व की तरह ही पीठ का अर्चन
करना चाहिये ।४८-४६। ताम्रगण प्रस्थ से जल का ग्रहण करने वाले-
मनोहर पात्र को वहाँ पर रखकर उसे मन्त्र द्वारा शुभ जल से भर
देवे ।५०।
कुंकुमं रोचना राजी रक्तचन्दनवैणवान् ।
करवीरजपांशालिकुशश्यामाकतण्डुलान् ।५१।
निक्षिपेत्सलिले तस्मिन्नेकग्रं सञ्चिन्त्य भानुना ।
सांगमभ्यर्चयेत्तस्मिन् भास्करं प्रोक्तलक्षणम् ।५२
गन्धपुष्पादिनैद्यैर्यथाविधि विधानवित् ।
तत्पिधाय जपेन्मन्त्रं सम्यगष्टोत्तर शतम् ।५३
पुनः संपूज्य गन्धाद्यैर्जानुभ्यामवनि गतः ।
आमस्तकं तदुद्धृत्य व्योम्नि सावरणं रवौ ।५४
दृष्टि निधाय स्वैक्येन मूलमन्त्रं धिया जपन् ।
दद्यादर्थं दिनेशाय प्रसन्नेनान्तरात्मना ।५५
कृत्वा पुष्पाञ्जलि भूयोजपेदष्टोत्तरं शतम् ।
यावदर्घ्यामृतं भानुः समादत्ते निजैः करैः ।५६
उनमें कुंकुम, रोचना, राजी, रक्त, चन्दन, वैष्णव, करवीर, जपा,
शाली, कुश, श्यामा तण्डुलों का निक्षेप कर देवे । उस जल में भानु
के साथ एकता का चिन्तन करना चाहिये । उसमें कहे हुये लक्षणों वाले
भास्कर का अङ्गों के सहित अर्चन करना चाहिये ।५१-५२। विधान
का ज्ञाता तथा गन्ध-पुष्प और नैवेद्य आदि से अर्चन करे । उसको
ढककर भली भाँति एक सौ आठ बार मन्त्र जप करना चाहिए ।५३।
फिर गन्धादिके द्वारा पूजनकरके घुटनोंसे पृथ्वीपर स्थित होवे । मस्तक
तक उसका उद्धार करके व्योम में सावरण दृष्टि रखकर