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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 511 में से

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पृष्ठ 273

द्वादश पटल ] [ २७३
मूल मन्त्र का आन्तरिक एकता से जप करे । फिर दिनेश्वर के लिये
अर्घ्य देवे और अन्तरात्मा में परम प्रसन्न होकर ही देवे ।५४-५५ फिर
पुष्पाञ्जलि देकर पुनः अष्टोत्तर शत मन्त्र का जप करना चाहिए
जब तक सूर्य अपने करों से अर्घ्य के अमृत का समाधान करे तब तक
करे । ५६।
तेन तृप्तो दिनमणिर्दद्यादस्मै मनोरथान् ।
अर्घदानमिदं पुंसामायुरारोग्यवर्द्धनम् ।५७
धनधान्यपशुक्षेत्रपुत्रमित्रकलत्रम् ।
तेजोवीर्ययशः कान्तिविद्याविभवभाग्यदम् ।५८
आकाशमग्निदीर्घेन्दुसंयुक्तं भुवनेश्वरी ।
सर्गान्वितोभृगुर्भानोस्त्रयक्षरो मनुरोरितः ।५६
आधारादिपदाग्रान्तं कण्ठाधारकावधि !
मूर्द्धादिकण्ठपर्यन्तं क्रमाद्वीजत्रयं न्यसेत् ।
षड् दीर्घवरयुक्तेन मध्ययेनाङ्गक्रिया मता ।६०
रक्ताम्बुजासनमशेषगुणैकसिन्धुं भानुं
समस्तजगतामधिपं भजामि ।
हृद्मद्ध्याभयवरान् दधतं
कराब्जेर्माणिक्यमौलिमरुणाङ्गरुचिं त्रिनेत्रम् ।६१
उससे सन्तुष्ट होकर दिनमणि इस लिये मनोरथों को दिया करते
हैं । यह अर्घ्यदान पुरुषों को आयु और आरोग्य के बढ़ाने वाला होता
है । ५७। इससे धन-धान्य, पशु, क्षेत्र, पुत्र, मित्र, कलत्र की प्राप्ति हुआ
करती है और यह तेज, वीर्य, यश, क्रान्ति, विद्या, विभव और भाग्य
का देनेवाला होता है । ५८। अब प्रयोजन तिलक मन्त्र बताया जाताहै-
आकाश, हकार, अग्नि, रेफ, दीर्घ बिन्दुके सहित था, भुवनेश्वरी-विसर्गों
से समन्वित भृगु-सः, यह भानु का तीन अक्षरों वाला मन्त्र है ऐसा
कहा गया है । ५६। आधार से आदि लेकर पादोंके अग्रभाग के अन्त तक
तथा कण्ठ से आधार की अवधि पर्यन्त-मूर्द्धा से आदि लेकर कण्ठ पर्यन्त