शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादश पटल ] [ २७१
तारादि खं खखोल्काय मनुना मूर्तिकल्पना ।
साक्षिणं सर्वलोकानां तस्यामावाह्य पूजयेत् ।४३
अङ्गानि पूजयेदादौ दिक्पत्रेष्वर्कमूर्त्तयः ।
आदित्याद्याश्चतस्रोऽर्च्यः शक्तयः कोणपत्रगाः ।४४
स्वस्वनामादिवर्णाः स्युस्तासां बीजान्यनुक्रमात् ।
उषा प्रज्ञा संध्या शक्तयः परिकीर्तिताः ।४६
पत्राग्रसंस्था ब्राह्मण्याः पुरयोऽरुणमर्चयेत् ।
चंद्रादानर्चयेत्पश्चाद्ग्रहानष्टौ ततो बहिः ।४७
इन्द्रादींश्च तदीस्त्राणि यथा पूर्वं समर्चयेत् ।
एव संपूज्य विधिवद्भास्करं भक्तवत्सलम् ।४८
दद्यादर्घं प्रतिदिनं वारे वा तस्य चोदिते ।
प्रभाते मन्डल' कृत्वा पूर्वत्पीठमर्चयेत् ।४६
पात्रं ताम्रमयं प्रस्थतोयग्राहि मनोहरम् ।
निधाय तत्र मनुना पूरयेत्तच्छुभोदकैः ।५०
ह्रस्व त्रियत-अ,इ,उ इन स्वरोंको जो बिन्दु और अग्नि अर्थात् रेफ
से संयुत होवे । ब्रह्मा-विष्णु और शिवके स्वरूपवाले पदको चतुर्थीकेअंत
वालाबोले । इसके अनन्तर-सौराय योगपीठाय नमः यहबोलना चाहिए।
यह जगतपति दिनेश्वर का पीठ मन्त्र बताया गया है।४१-४२। खखो-
ल्काययह स्वरूप है-जिसमें प्रणव आदिमें हो ऐसा खं यह मंत्र है । इससे
मूत्ति की कल्पना करनी चाहिए । उसमें सब लोकोंके साक्षी का आवा-
हन करके पूजन करना चाहिए ।४३। आदि में अङ्गों का पूजन करे और
दिशाओं के पत्रों में अर्क देव की मूर्तियों का यजन करना चाहिए ।
आदित्य आदि कोणों के पत्रोंमें स्थित चारों का अर्चन करना चाहिये ।
।४४। उन मूर्त्तियों के बीज अनुक्रम से अपने-अपने नामों के आदि वर्ण
होते हैं । तथा प्रज्ञा,प्रभा-संध्या, ये शक्तियां बतलायी गयीहै ।४६। पत्रों
के अग्र भागों में विराजमान ब्राह्मणी आदि हैं । आगे अरुण का अर्चन
करे । पीछे चन्द्रादि आठ ग्रहों को बाहिर समन्वित करनी चाहिए ।४७।