शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
ज़र्दा घोड़े की तस्वीर ये रंग असली है
जरदंग नुक़रा घोड़े की तस्वीर
ये रंग असली है
अफ़रख घोड़े की तस्वीर
मुश्की घोड़े की तस्वीर ये रंग असली है
सितारा पेशानी घोड़
सुरख़ घोड़े की तस्वीर
ये रंग असली है
अरबी
रान
(२)
अरजन घोड़े की तसवीर एक पैर का सफेद होना अर्जेल की
पहचान है और यह अशुभ है
स्याहवालदार घोड़े की
तसवीर
नोक्ते घोड़े की तस्वीर
(२)
फूलदार गोरे की तरवीर
सियाह ज़बान घोड़े की तस्वीर
ये अशुभ है
शिकाल घोड़े की तरवीर
जिस घोड़े का दाहिना हाथ और पांय बावां और दाहिना
हाथ पांव सफेद हो उसको शिकाल कहते हैं
पोपत घोड की
तरवीर
(७)
स्याह तालु घोड़े की तस्वीर
ये शुभ है
गजदंत घोड़े की तस्वीर
ये अशुभ है
दूसरे तालू की तस्वीर का निशान
शाखदार घोड़े की तस्वीर
गोहादार यानी लीद दान
घोड़े की तस्वीर
(६)
दनी घोड़े की तस्वीर
घनी घोड़े की तस्वीर
शुतरदंदा घोड़े की तस्वीर
ये ऐब है
अड़िया घोड़े की तस्वीर
अरबी घोड़े की तस्वीर
गल्गोजुम घोड़े की तस्वीर
शुतर दंदान घोड़े की तस्वीर
बाऊ कुहन घोड़े की तस्वीर
(७)
चकावल वाले घोड़े की तस्वीर
चकावल एक कल्लाहूकी के चारोतरफ होता है
अरवपर
हड्डे की तस्वीर
पिछले धड़की तस्वीर हड्डी की तस्वीर
पहचान की बनाई है एक तरफ हड्डी
नुकीली निकल आती है
काने की तस्वीर
पिछले धड़की
तस्वीर मोतड़े की
पहिचान
बेर हड्डी की तसवीर
चकादल घोड़े की तस्वीर
पुरतदाल घोड़े की त०
खुन के असर जहां से रुकता है फूल जाता है
अगर पांव में होतो उसको पुरतदाल कहते हैं
(८)
काँदमोंरी ये दोनों
तरफ होती है
येक अंगमोरी
फैले हुए कान वाले घोड़े की तस्वीर
अरगूटाल घोड़ा
सिंघके निशान दो होते हैं तीन कान या
इससे ज्यादा भी
रहरनुमा घोड़े की
तस्वीर
पुर्गया घोड़े की तस्वीर
चांद सूरततील की दोभंवरी
वाले घोड़े की
तस्वीर
एक भौरी कनपटी के नीचे गिलान
दुगनी भौंरी
सांपन भौंरी
सीने की
भौंरी
आदम मार
अगू भौंरी
इन भोरियों को अशुभ कहते हैं
१३५
देव मुनि गौरोदार घोड़े का निशान जामाक पों गिर
कटोली भौंरी
नाक की भौंरे
देव मुनि
सिंहन खूंटी
उरवाड़
भौंरी का निशान
स्याह गालू घोड़े की तस्वीर
फूलदार घोड़े की तस्वीर उसका हाथ सफेद हो
उसको हाथवरद कहते हैं
कुशादार घोड़े की तस्वीर
चकार घोड़े की तस्वीर
कपाती दुम्म घोड़े की तस्वीर
(४१)
यह मूरत फिर की देखो
उस तसबीर से १० मुकाम उल्टे भौंरियों के
मालूम होते हैं
जौनी भौंरी लगे ऐब दार
सीने की दोनों उलटी भौंरी
कुख की भौंरी ऐबदार
दोनों उलटी भौंरी
तरकादन घोड़े की तसबीर
घोड़ा सवार के अख्ति-
यार में नहीं होता
आंस्तारफोड़ा
गठाभौरी
दाव भयैतो
नंगभोर नोमका
चित्र देख पाठ
पान खांद
एक कनपटी का नागत
जिसका खुर
सवार का तरास है
खूंटाउखाड़ भोरी
सुजवल भौरी
सांपन का चिन्ह
हारदास्त
खुरौ उप्पाड
नवभोर भौरी
यह घोड़ा ब्राह्मण वर्ण है
शुभ है
यह घोड़ा क्षत्री वर्ण है यह युद्ध में
शुभ है
अथ शालिहोत्र प्रारम्भः
मंगलाचरणम् ।
❁ दोहा ❁
परब्रह्मको ध्यान करि, सब देवन सिर नाय ॥
शालिहोत्र वर्णन करूं, भाषा ललित बनाय ॥
प्रिय सजनो! परमात्मा ने अपनी सृष्टि में एक अद्भुत पशु जिसे
घोडा कहते हैं और वह बग्घी इक्का टमटम आदि सवारियों में
जोते जाते हैं इस घोडेसे संसार के अनेकों कार्य सिद्ध होते हैं
जैसे घोडेपर व्यापारी लोग नाज लादते हैं, यह सवारीके लिये
बहुत ही लाभदायक है घोडा चलने में तेज होताहै कहीं २ के
घोडे ऐसे वीर होते हैं जो अपने स्वामी का विपत्ति समय में
बडा काम करते हैं जैसे दरिया के अत्यन्त वेग में पार जाना कठिन
हो जाता है परन्तु घोडा ऐसा बहादुर होता है, जो मालिक को
पीठपर चढाकर पारकर देता है यहां तक कि यह चोर बदमाशों
से समय पड जानेपर बचा सक्ता हैक्योंकि घोडेकी दौडमें पकड-
ना मुश्किल हो जाता है इसलिये राजा महाराजा अमीर साहू-
कार आदि घोडेकी बड़ी कदर करते हैं किसी समय घोडा बी-
मार होजाता है तो बिना दवा के रोग से प्रायः मर जाते हैं इस
लिये इस पुस्तक में उनके लक्षण शुभ अशुभका वर्णन करके उ-
नकी चिकित्सा भलीभांति लिखी गई है जिससे घोडे सहज में
२ शालिहोत्रम् ।
चारोग्य होसकते हैं इसलिये घोडों के पालनेवाले महाशयों के
लाभार्थ यह पुस्तक अनेक ग्रंथोंसे संग्रहकी गई है. यह पुस्तक
प्रत्येक मनुष्यको लेकर रखना चाहिये और एकबार पढजाने से
भलीभांति ज्ञान होसकता है कि अमुक घोड़ोंके अमुक रोग हो-
गया है और अमुक औषधि का सेवन करना चाहिये.
भारतवर्ष में बहुत प्राचीन काल में शालिहोत्र नामक कोई
महान् अश्ववैद्य हुए थे, उनने इस विद्या में बडी पारदर्शिता
प्राप्त कीथी और इस विषयमें जो ग्रन्थ उन्होंने संस्कृत भाषामें
लिखा था वह उन्हीं के नाम से विख्यात होगया. अर्थात् अश्व-
विद्या पर अन्य महात्माओं के बनाये हुए ग्रन्थभी शालिहोत्र
कहलाने लगे ।
संस्कृतभाषा में घोडे चार प्रकार के लिखे हैं. यथाः-उत्तम,
मध्यम, अधम और अधमाधम ।
जिन घोडों के सिखाने में परिश्रम अधिक नहीं होता है, स-
हज में सीख लेते हैं; और जिनका स्वभाव भी नम्र होता है.
अपने स्वामी के मनोनुकूल काम करते हैं न चलनेमें अडते हैं;
न पीछे को हटते हैं, ऐसे उत्तम उत्तम लक्षणों से युक्त उत्तम होते
हैं, तथा इन लक्षणों से हीन होने पर उत्तरोत्तर मध्यम हैं अधम
और अधमाधम जाने जाते हैं ।
घोडों के रङ्ग-संस्कृत में घोडोंके रङ्ग सात प्रकारके लिखे हैं
जैसे:-सफेद, लाल, पीला, सारङ्ग, (विचित्रवर्ण) कबुशी,नील
और कृष्ण । इनमें से सफेद रङ्ग का घोडा सबसे उत्तम होता
है सर्वाङ्गश्वेत घोडा राजाओं के लिये प्रशस्त होता है !
सफेद रंग बर्फ के ढेले के सदृश होता है, लालवर्ण कुंकुम के
शालिहोत्रम् । ३
समान होता है, पीला रंग हल्दी के समान और सारङ्ग चित्रवि-
चित्र रङ्ग होता है, जिसे कबरा कहते हैं । कपिलवर्ण पिशंग
कहाता है, दूब के समान रंगवाले को नीलक तथा जामुन के
फल के सदृश रंग काला होता है ।
जिस घोडे में पीली दमक मारती हो और पांव उसके सफेद
हो, तथा नेत्र काले हों उसे चक्रवाक कहते हैं यह घोडा राजा-
ओं के योग्य होता है ।
जिस घोडे के मुख पर चन्द्रमाकी किरण के समान आवर्त
अर्थात् भोंरी हो, जामुन के फल के समान आकृति हो, पांव
सफेद हों उसे मल्लिक कहते हैं ।
जिस घोडे का सब रंग सफेद हो, केवल एक कान काला हो
उसे श्याम कर्ण कहते हैं, प्राचीन समय में यही घोड़ा अश्वमेध
यज्ञ के काम में आता था ।
जिसका सम्पूर्ण वर्ण सफेद हो परन्तु पांव काले हों, यह यम-
दूत संज्ञक घोडा अशुभ होता है ।
जिसके पांव सफेद हों, पूंछ, छाती, मुख और सिर के बाल
काले हों वह अष्ट मंगल कहाता है ।
जिसके रोम देखने से वर्ण की प्रतीति न हो सकती हो वह
पुष्य संज्ञक कहाता है यह घोडा रखने योग्य नहीं होता है ।
जिस घोडे के पांव सफेद और मुख मध्यम होता है उसे पञ्च-
कल्याण बोलते हैं, यह घोड़ा शुभ होता है ।
शुभाशुभ लक्षण-जिन घोडों के मुख दीर्घ परन्तु सूक्ष्म मास
से युक्त होते हैं वे घोडे शुभ होते हैं । जिनके कंधे ऊँचे; मुख
४ शालिहोत्रम् ।
दीर्घ ग्रीवादीर्घ वाल कटिप्रदेश गोल और पुष्ट, सुघटित पुष्ट
और मांस से गर्दन पर सघन रहित, अगले पांव टेढे और चक्रा-
कार खुर, वक्षस्थल चौडी, कान छोटे, पार्श्व छोटी तालु लाल
दंत पंक्ति शिखराकार सुडौल दीप्तिमान, खाल कोमल, ऊपर
नीचे के ओष्ठ ताम्रवर्ण, जिह्वा लाल, नासिका का रंग लाल,
शरीर न अत्यन्त मोटा आंख चौड़ी, ललाई लिये हुए, अयाल
के बाल कोमल; इन लक्षणों से युक्त घोडे शुभ होते हैं ।
आवर्त अर्थात् भौरियों का वर्णन-इस देश में अच्छे बुरे घोडे
की पहिचान प्रायः भौरियों से हुआ करती है ये घोडेके अंग
प्रत्यंग में हुआ करती हैं जैसे अंगों में होता है उसी अंग के
अनुसार उनको शुभाशुभ फल कहते हैं, यदि शुभ अंगों में हो
तो शुभावर्त और अशुभ अंगों में हो तो अशुभावर्त होते हैं।
भौरियों के मुख्य स्थान बारह हैं, जैसे ललाट, मस्तक, ग्रीवा
हृदय, पाद, मणिबंध, नाभि; स्कन्ध, कण्ठ, मुख, कुक्षि, और
तीनों छिद्र । रोमों के गोल घुमाव को आवर्त कहते हैं।
शुभ आवर्तों के लक्षण-जिस घोडे के नासिका के अग्र भाग
में एक, ललाट के अग्रभाग में एक, कनपटी में एक, कान में
एक और मस्तक में एक गोलाकार भ्रमरी होती है वह घोड़ा
उत्तम होता है ।
जिसके हृदय, स्कंध, कंठ कटि, नाभि, कुक्षि और पार्श्व भाग
में भ्रमरी होती है वे मध्यम होते हैं।
जिसके ललाट में दो आवर्त और तीसरा समुद्रम हो वह
घोड़ा सबसे उत्तम और पूर्ण आयुवाला होता है ।