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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

८ सौंदर्य लहरी
बताना अत्यावश्यक है कि बिना गुरु के शक्तिपात रूपी अनुग्रह के
जीव ब्रह्मैक्य ज्ञान का होना दुर्लभ ही नहीं असंभव है, कहा है:—
दुर्लभो विषय त्यागो दुर्लभं तत्व दर्शनम् ।
दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना ॥
नहीं तो क्या यह आश्चर्य अत्याश्चर्य नहीं है कि ब्रह्म-सूत्रों के
भाष्यकार एक ऐसे विषय को इतनी महानता दें, जो वेदांत की
परिपाटी से सर्वथा असंगत हो । इस विषय का अधिक स्पष्टीकरण
करने के लिये हम नीचे श्री वासुदेव ब्रह्मेन्द्र सरस्वतीजी के
‘ब्रह्मांशिका’ नामक पुस्तक से संग्रहीत निम्न-श्लोक उद्धृत करते हैं:—
तत्वज्ञानेन मायायाबाधो नान्येन कर्मणा ।
ज्ञानं वेदांतवाक्योत्थं ब्रह्मात्मैकत्व गोचरम् ॥
तच्चदेवप्रसादेन गुरोः साक्षान्निरीक्षणात् ।
जायते शक्तिपातेन वाक्यादेवाधिकारिणाम् ॥
अर्थः—तत्वज्ञान से ही माया का बाध होता है । अन्य
कर्म से नहीं, जो ज्ञान वेदान्त के महावाक्यों द्वारा ब्रह्म और
जीवात्मा के एकत्व की अनुभूति दिलाता है वह ज्ञान ईश्वर के
प्रसाद से और गुरु के साक्षात निरीक्षण अथवा वचन से शक्तिपात
द्वारा अधिकारियों में प्रकाशित होता है ।
गीता में भगवान ने भी कहा है:—
“ तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ”(गीता ४,३८)
अर्थः—वह (ज्ञान) स्वयं योग सिद्ध को यथा समय
अपने अन्तर में ही मिलता है ।

सौंदर्य लहरी ९
अज्ञान से उत्पन्न होने वाला भ्रम पांच प्रकार का
पांच प्रकार होता है ।
का भ्रम और
तीन प्रकार का मल
जीवेश्वरौ भिन्नरूपौ इति प्रथमः,
आत्मनिष्ठं कर्तृगुणं वास्तवं वा द्वितीयकः,
शरीरत्रय- संयुक्तजीवः संगी तृतीयकः,
जगत्कारण- रूपस्यावेकारित्वं चतुर्थकः,
कारणाद्भिन्नजगतः सत्यत्वं पंचमों भ्रमः
( अन्नपूर्णोपनिषत् )
जीव ब्रह्म का भेद पहला भ्रम है । आत्मा में कर्ता भोक्तापन वास्तविक
है या नही, यह दूसरा भ्रम है । स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों
शरीरों के संयोग से इतरेत्तर अध्यास के कारण आत्मा संगी हो गया
है, यह तीसरा भ्रम है। प्रथम मायामल, दूसरा कर्तामल और तीसरा
आणव मल कहलाता है । चौथा और पांचवा भ्रम दोनों जगत और
उसके अभिन्न निमित्तोपादान कारण-ब्रह्म सम्बन्धी हैं । पहिला भ्रम
जगत के कारणस्वरुप अपरिणामी ब्रह्म तत्व में विकारीपन की प्रतीति
कराता है, और दूसरा, कारण और कार्य में भेद बुद्धि उत्पन्न कराता
है । मायामल, कर्तामल और आणव मल की निवृति कुण्डलिनी शक्ति
के जागरणोपरांत षट् चक्र वेध द्वारा तत्व शुद्धि होने पर होती है ।
तत्व ३६ हैं जिनका वर्णन आगे आयगा । उनमें पांच युद्ध तत्व;
सात शुद्धाशुद्ध तत्व और चौबीस अशुद्ध तत्व होते हैं । प्रथम
पांच शुद्ध तत्वों को छोडकर शुद्धि शेष इकतीस तत्वों की होती है,

१० | सौन्दर्य लहरी

अनात्म तत्वों में आत्म भावना के न रहने पर उन तत्वों की शुद्धि
कहलाती है ।
चौथे भ्रम की निवृत्ति जगत को सत् शक्ति का परिणाम जान
कर ब्रह्म के विकार रहित सिद्ध होने पर होती है; और पांचवे भ्रम
की निवृत्ति शक्ति में ब्रह्म दृष्टि होने पर होती है ।
अनात्म तत्वों में से आत्माध्यास की निवृत्ति होना अर्थात पंचकोशों
तत्त्व शुद्धि के विभिन्न स्तरों पर से आत्म-भावना रूपी तादात्म्यता
को नष्ट करना ही तत्व शुद्धि कहलाता है ।
जैसा कि 'तैत्तिरीयोपनिषत्' के आठवे अनुवाक में कहा है कि
इस लोक से प्रयाण करते समय अपने आत्म स्वरूप को जैसा बताया
गया है, वैसा जानने वाला मनुष्य इस आत्मा को अन्नमय कोष से
निकालता है, इस आत्मा को प्राणमय कोष में से निकालता है, इस
आत्मा को मनोमय कोष से निकालता है, इस आत्मा को विज्ञानमय कोष
से निकालता है, इस आत्मा को आनन्दमय कोष से निकालता है ।
आनन्द ब्रह्म को जानने वाला, जहां से मन सहित वाणी
बिना उसे प्राप्त किये लौट आती है, किसी से भी भय नहीं खाता ।
अर्थात वह निर्भय ब्रह्म पद को प्राप्त हो जाता है ।
अन्नमय कोष पांच महाभूतों से बना है, इसलिये उससे
निकालने के लिये क्रमशः पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और
आकाश के ५ स्तरों से आत्मा को हटाना पडेगा । उक्त तत्व भी
अपने अपने स्तर पर अन्य तत्वों के सम्मिश्रण के परिणाम हैं;
पृथ्वी में ५६, जल में ५२, अग्नि में ६२, वायु में ५४, और
आकाश में ७२ किरणें होती हैं, जिनका सम्बन्ध तत्वों और

सौंदर्य लहरी ११

मातृकाओं से है। और फिर उनके उतने ही अधिदेवता होते हैं।
आत्मा का सब से सम्बन्ध है। उसको सब से पृथक करना होता
है (देखें श्लोक १४); इसी प्रकार प्राणमय कोष के भी पांच स्तर
हैं, उनके नाम प्राण, अपान, समान, व्यान, और उदान हैं,
जिनके द्वारा अन्नमय कोष के अभ्यन्तर व्यापारों की सब क्रियाएं
होती हैं। ये क्रियाएं पांचों महाभूतों से सम्बन्धित होने के कारण
पांच प्रकार की हैं। अभ्यन्तर क्रियाएं श्वास प्रश्वास, पाचन,
रस का सातों धातुओं में वितरण और उनका निर्माण, निकम्मे
पदार्थों का मल-मूत्र स्वेद आदि से रेचन और शरीर को धारण
करने इत्यादि की क्रियाएं हैं। मनोमय कोष में भी पांचों भूतों से
सम्बन्धित ५ व्यापार हैं और उनकी ६४ किरणें हैं। (देखें श्लोक
१४) वे हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ और वाक् शक्ति की कर्मेन्द्रियों
की क्रियाएं हैं। विज्ञानमय कोष के भी ५ स्तर हैं वे भी पांचों
महाभूतों से सम्बन्धित ५ ज्ञानेन्द्रियों के व्यापार हैं। चारों कोषों
का अन्वय व्यतिरेक द्वारा पारस्परिक सम्बन्ध हैं। आनन्दमय कोष
के तीन गुणों के अनुरूप सात्विक, राजसिक और तामसिक
तीन स्तर हैं; जिनका भेद जाग्रत, स्वप्न, और सुषुप्ति में देखने में
आता है।
उपरोक्त पांचों कोषों और उनके व्यापारों से तादात्म्य करके
आत्मा जन्म मृत्यु जरा व्याधि शोक मोह के जाल में पडी है।
इस तादात्म्य का कारण माया अथवा अविद्या का तम है। अविद्या
का यह ही रूप है कि अनात्म तत्वों में आत्मभाव, उनकी अनित्यता
में नित्यत्व का भाव, उनके अपवित्र संघातों में पवित्रता का भाव
और उन पर पडने वाली आत्मा के ही आनन्द की छाया की

१२ सौन्दर्य लहरी
तारतम्यता से अनुभव में आने वाले दुखों मे सुख का भाव अर्थात
सर्वथा विपरीतता का आभास उत्पन्न हो जाता है । इस लिये इसे
तम कहते हैं । अष्टधा प्रकृति में आत्मभाव होने के कारण यह
तम भी आठ प्रकार का है । अणिमादि आठ सिद्धियों के लिये
उनका आश्रय लेकर अभिमान करना, अथवा उनमें फंसकर उनका
अहंकार करना आठ प्रकार का मोह है । उक्त आठों सिद्धियों और
शब्दस्पर्शरूपरसगन्धात्मक दिव्य और सामान्य १० विषयों की
आसक्ति १८ प्रकार का महामोह कहलाता है । फिर उनके
प्रतिबन्धकों से द्वेष करना १८ प्रकार का तामिस्र है, और
उनके भोगने के साधन रूप देह के सदा बने रहने की वृथा इच्छा
करना १८ प्रकार का अन्ध तामिस्र कहलाता है । यह सब अविद्या
की फसल है, इससे निवृत्ति पाने पर तत्वों की शुद्धि कही जाती है ।
विरजा हबन के मंत्रों द्वारा बहिर्यज्ञ करके तत्व शुद्धि की जो
भावना की जाती है, अन्तर्याग द्वारा ही उसकी उपलब्धि होना शक्य
है, जो योग और उपासना का अंग होने के कारण, अन्तःसाधन से
सम्पादित होती है ।
विरजा हवन के मंत्र नीचे दिये जाते हैं:—
१ प्राणा पान व्यानोदान समाना मे शुध्यन्तां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा
भूयासं स्वाहा ।
२ वाङ् मनश्चक्षुः श्रोत्र जिव्हा
घ्राणं रेतो बुद्ध्या स्फूर्ति संकल्पा ” ”
३ त्वक् चर्म मांस रुधीर
मेदो मज्जास्नायवोऽस्थिनि ” ”

सौन्दर्य लहरी १३
मे शुध्यन्तां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा
भूयासं स्वाहा ।
४ शिरः पाणिपाद पार्श्वपृष्ठोरुदर
जङ्घ शिश्नोपस्थ पायवो ” ”
५ उत्तिष्ट पुरुष हरित पिङ्ग—
लोहिताक्ष देहिर ददापयिता ” ”
६ पृथिव्यापस्तेजो वायुगकाशाः ” ’
७ शब्द स्पर्श रूप रस गन्धा ’ ”
८ मनोवाक् काय कर्माणि ” ”
९ अव्यक्त भावैरहंकारै ज्योतिरहं इत्यादि ”
१० आत्मा ” ”
११ अन्तरात्मा ” ”
१२ परमात्मा ” ”
१३ अन्नमय प्राणमय मनोमय
विज्ञानमयमानन्दमयमात्मा ” ”
प्राणायाम द्वारा भी भूत शुद्धि की जाती है । परन्तु वह भी
भावनाप्रधान ही है । उसकी विधि इस प्रकार है:—
१. पिंगला से पूरक करे और हँ बीज के जप सहित यह भावना
करे कि मूलाधार से जीवात्मा को सुषुम्ना पथ द्वारा ब्रह्मरंध्र में
ले जाकर उसका परम शिव से योग कर रहा हूं, फिर कुम्भक
करके ईडा से रेचक कर दे ।
२. ईडा से पूरक करके यं बीज के जप सहित यह भावना
करे कि शरीर सूख गया है और पिंगला से रेचक कर दे ।

१४ · सौन्दर्य लहरी
३. पिंगला से पूरक करके रं बीज के जप सहित यह भावना
करे कि शरीर भस्म होगया है, कुम्भक करके ईडा से रेचक करे ।
४. ईडा से पूरक करके वं बीज सहित यह भावना करे कि
सहस्रार से अमृत स्राव हो रहा है, फिर कुम्भक करके पिंगला से
रेचक कर दे, वं बीज के जप सहित यह प्राणायाम करना चाहिये ।
५. पिंगला से पूरक करे और लं बीज के जप सहित यह
भावना करे कि दिव्य देह उत्पन्न होगया है । लं बीज के सहित
कुम्भक करके इडा से रेचक कर दे ।
६. इडा से पूरक करे और यह भावना करे कि शिव से
एकीभूत जीव पुनः मूलाधार में उतर आया है । 'हंसः सोहं' के
जप सहित यह प्राणायाम करना चाहिये ।
आधुनिक वेदान्त वादियों में प्रायः देखने में आता है कि वे
[ज्ञान के पूर्व योग] योग और उपासना की अवहेलना करते हैं, और
[और उपासना] केवल महावाक्यों का श्रवण, मनन और निदि-
[की आवश्यकता] ध्यासन मात्र अपरोक्ष ज्ञान की प्राप्ति के लिये
पर्याप्त समझते हैं । उनके मतानुसार योग उपासना
में समय नष्ट करना वृथा है; क्योंकि वे ज्ञान के साधन नहीं होते ।
ज्ञान महावाक्यज ज्ञान ही है और उसकी उपलब्धि महावाक्यों के ·
विचार द्वारा हो सकती है । परन्तु शास्त्रों के अवलोकन से उनकी
यह धारणा भ्रमात्मक सिद्ध होती है । यह बात तो सत्य है कि
महावाक्यों के श्रवण, मनन और निदिध्यासन द्वारा ही ब्रह्मात्मैक्य
ज्ञान का उदय होगा; परन्तु श्रवण, मनन और निदिध्यासन के

सौंदर्य लहरी २५
वे ही लोग अधिकारी हैं, जिनके कषाय परिपक्व हो चुके हैं।
यह बात वे भूल जाते हैं कि कषाय परिपक्व होने के लिये योग
और उपासना ही अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं। "अथा तो
ब्रह्म जिज्ञासा" ब्रह्मसूत्र के इस प्रथम सूत्र के भाष्य में 'अथ'
शब्द पर भाष्यकार श्री मच्छंकर भगवत्पाद लिखते हैं कि ब्रह्म
जिज्ञासा के उपदेश के पहिले कुछ भी साधन तो आवश्यक होना
चाहिये, जो 'अथ' शब्द से निर्दिष्ट है वह क्या है ? वह है
नित्यानित्य विवेक, इह और परलोक के भोगों से वैराग्य, शम,
दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और .समाधान की षट सम्पत्ति और
मोक्ष की इच्छा। इस साधन चतुष्टय के पश्चात. श्रवण, मनन,
निदिध्यासन का अधिकार प्राप्त होता है। 'अभ्यास वैराग्याभ्यां
तन्निरोध' योग दर्शन के इस सूत्र में भी विवेक और वैराग्य दोनों
का सर्व प्रथम स्थान है। इस सूत्र पर व्यास भाष्य पढने योग्य है
वहां नित्यानित्य विवेक को ही अभ्यास बताया गया है। शम,
अर्थात मनोनिरोध के लिये अभ्यास और वैराग्य दोनों प्रथम साधन
है। भगवान ने भी गीता में ऐसा ही उपदेश किया है:—
"अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते" (गीता ६.३५)
अभ्यास और वैराग्य के साथ साथ ईश्वर प्रणिधान भी आवश्यक है।
'ईश्वर प्रणिधानाद्वा' सूत्र में ईश्वर प्रणिधान को मनोनिरोध का
दूसरा मुख्य साधन कहा है। इस लिये योग के साथ उपासना की
भी आवश्यकता होती है। योग दर्शन में ईश्वर प्रणिधान का उपदेश
तीन स्थानों पर किया गया है और उनका फल भी भिन्न बताया
गया है। प्रथम ईश्वर प्रणिधानाद्वा, इस सूत्र में अभ्यास वैराग्य के

६ सौन्दर्य लहरी
थ ईश्वर प्रणिधान का फल, मनोनिरोध रूपी शम है। दूसरे
मान पर “तपः स्वाध्यायेश्वर प्रणिधानानि क्रिया योग” (२-१)
तप और स्वाध्याय के साथ ईश्वर प्रणिधान का फल समाधि के
ल्ये भूमिका तैयार करता है, और अविद्या आदि क्लेशों को तनु
रता है। तीसरी जगह “शौचसन्तोषतपः स्वाध्यायेश्वर प्रणि-
ानानि नियमः” में ईश्वर प्रणिधान के पूर्व तप और स्वाध्याय के
थ शौच और सन्तोष और बढा दिये गये हैं, जिनसे युक्त ईश्वर
णिधान का फल समाधि की सिद्धि है। “समाधि सिद्धिरीश्वर
णिधानात्”। दम इंद्रिय निग्रह को कहते हैं। उपरति का अर्थ
िषयों से हट कर वृत्ति का अन्तर्मुखी होना है, जिसको प्रत्याहार
हते हैं। ये अष्टांग योग का पांचवा अंग है। उपरति के साथ
ख दुःख के सम रहने का साधन तितिक्षा कहलाता है। गुरु और
ास्त्रों में श्रद्धा सहित मन की स्वाभाविक एकाग्र अवस्था का उदय
ोना समाधान कहलाता है। इनके पश्चात मोक्ष की इच्छा होती
। तब ब्रह्म जिज्ञासा की क्षुधा लगने पर साधक महावाक्यों के
वण का अधिकारी बनता है। “शान्तौ दान्त उपरस्तितिक्षुः
माहितो भूत्वाऽत्मन्येवात्मन पश्यति” (बृह ४, ४, २३) इस
ृति के आधार पर ब्रह्म-जिज्ञासा के लिये उपरोक्त षट्सम्पत्ति
ी आवश्यकता बताई गई है। जिसका फल आत्म दर्शन है, और
ात्म दर्शन के पश्चात ब्रह्म जिज्ञासा उत्पन्न होती है। यह बात
ोचे दी हुई श्रुति से स्पष्ट हो जाती हं:—
“आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मंतव्यो निदिध्यासितव्यो
मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे द्रष्टे श्रुते मते विज्ञात इदं सर्वं
विदितम्” (बृह ४ ५ ६)

सौंदर्य लहरी १७
इस श्रुति में श्रवण, मनन और निदिध्यासन के पूर्व दर्शन
वाचक भी शब्द हैं, अर्थात श्रवण मनन और निदिध्यासन के पूर्व
आत्मदर्शन होना जरूरी है जो षट सम्पत्ति के साधन से हो सकेगा।
आत्मदर्शन होने के पश्चात मार्ग सरल हो जाता है । यह दर्शन
प्रज्ञान आत्मा का दर्शन है । जब गुरू उपदेश करता है-“ अयं आत्मा
ब्रह्म तत्वमसि ” । अर्थात प्रज्ञात्म दर्शन के पश्चात महावाक्यों के
उपदेश से साधक जानता है कि यही आत्मा जिसका उसने दर्शन
किया है ब्रह्म है । इस बात का युक्ति और न्याय के आधार पर
निश्चय करता है, जिसको मनन कहते हैं । और फिर एकाग्र चित्त
से उसी पर सदा अपना लक्ष रखता हुवा ‘ अहं ब्रह्मास्मि ’ का साधन
करता है, यही निदिध्यासन है । ‘ द्रष्टव्यः ’ शब्द का लक्ष्य आत्मा
है जो महावाक्यों के उपदेश के पूर्व द्रष्टा को अपने स्वरूप का लक्ष
कराता है और पश्चात ब्रह्म का लक्ष करा कर ब्रह्मात्मैक ज्ञान का
साधन बन जाता है ।
हम इस बात को उपर समझा आये हैं कि योग का साधन भी
ईश्वर प्रणिधान रूपी साधना के बिना समाधि की उपलब्धि के लिये
पूर्ण नहीं है । उपासना और योग दोनों साथ साथ रहते हैं। एक दूसरे
के बिना अपूर्णता का अनुभव करता है । श्रीमच्छंकर भगवतपाद् ने
तो सौंदर्य लहरी में कुण्डलिनी योग को प्रधानता देकर, उपासना और
योग की एकता ही सिद्ध कर दी है, जो योग की एक तांत्रिक योग
पद्धति है । उसका फल है शिव सायुज्य पदवी । देखें श्लोक २२ ।
शून्य एक निषेधात्मक शब्द है, और पूर्ण में सर्वात्मिता का
ज्ञानयोग और भाव है । यदि बिन्दु को अभाव वाचक समझें
भावयोग तो अभाव पर अभाव कितना भी बढाया

१८
सौंदर्य लहरी


जाय, वह सदा अभाव ही रहेगा । अभाव अथवा सर्वथा
विशेषण युक्त अभाव में केवल विकल्प मात्र की प्रतिध्वनि
दिखती है । अनन्त बिन्दुओं को एकत्रित करने पर भी क्या
कभी कोई संख्याबन सकती है ? फिर किसी संख्या पर उस
अभावात्मक बिन्दु को रख देने से उस संख्या का मूल्य क्यों
बढना चाहिये ? एक पर एक बिन्दु रखने से उसका भूल्य दस
गुणा हो जाता है, क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है ? इसलिये
वह बिन्दु शून्य नहीं वरन पूर्ण है । एक पर एक बिन्दु रखने से
उसमें दस की पूर्णता समझी जाती है, और दो बिन्दु लगाने से
वह दुबारा दस की पूर्णता प्रदान करती है, अर्थात प्रत्येक बिन्दु की
वृद्धि से पूर्णता की वृद्धि होती जाती है, परन्तु शून्य तो सदा शून्य
ही है । इसलिये यह कहना अधिक सत्य प्रतीत होता है कि, जिसे
शून्य कहते हैं, उस बिन्दु का मूल्य, अभाव नहीं, वरन पूर्ण है ।
यदि पूर्ण पर पूर्ण जोड कर उसका मूल्य बढ़ जाय तो प्रथम पूर्ण
की अपूर्णता सिद्ध होती है । क्योंकि अनेक पूर्ण नहीं हो सकते,
पूर्ण एक ही होना सम्भव है, इसलिये अनेक बिन्दुओं को एकत्रित
करने से उनका संग्रह पूर्णता से अतिरिक्त किसी संख्या का निर्माण
नहीं कर सकता और प्रत्येक संख्या अपूर्ण वाच्य ही है, क्योंकि
पूर्ण की कोई संख्या अथवा गणना नहीं की जा सकती, इसलिये
बिन्दु शून्य नहीं वरन पूर्ण है । और संख्यायें सब अपूर्ण हैं । गणित
विज्ञान का यह सिद्धांत अखिल विश्व पर लागू है । जहां तक नाम
रूपों के भेदों की गिनती की जा सकती, वह पूर्ण नही कहला सकता
और पूर्ण की पूर्णता को हमारी बुद्धि नहीं समझ सकती, क्योंकि उस

सौंदर्य लहरी १९

बुद्धि का ज्ञान स्वयं अपूर्ण है । इसलिये हम उसे शून्य कहते हैं ।
अभाव का अर्थ भी साधारण भाषामें किसी नामरूपके अभाव का ही
द्योतक है । जैसे हमारे पास घडा नहीं है, इसका अर्थ इतना मात्र
है कि हमारे पास घडे की आकृति धारण किये हुये मृतिका का
एक रूप नही है । जब विश्व के सब नाम रूपों के अभाव की
कल्पना की जाती है, तो उसे हम शून्य कहते हैं । परन्तु वास्तव
में क्या वह अभावात्मक शून्य है ? नहीं वरन आदि कारण की
पूर्णता का भाव उसमें निहित है । जैसे सिनेमा के पर्दे की तस्वीरें
लुप्त होने पर पूर्ण पर्दा दृष्टिगोचर होने लगता है । इसी तरह विश्व
के नाम रूपों के अभाव में उसके एकमात्र आधार का, जो पूर्ण है,
अनुभव होता है; दर्शन उसको विकार रहित पूर्ण-ब्रह्म कहते हैं ।
उसकी पूर्णता के कारण ही, विश्व का प्रत्येक नाम रूपात्मक अंग,
अपने स्थान पर सत्य और पूर्ण प्रतीत होता है । अभाव का ही दूसरा
नाम असत्य भी है, जो बात अथवा घटना जैसी हो वैसी ही न कही
या समझी जाय वह असत्य कहलाती है । प्रत्येक वस्तु का यथार्थ
ज्ञान सत्य कहलाता है, परन्तु उसकी संख्या, गणना अथवा सीमा
बद्ध होनेसे वह ज्ञान अल्प हो जाता है, और निरपेक्ष अनन्त-ज्ञान
यद्यपि सत्य है, तो भी बुद्धि की समझ के बाहर का विषय होने से
समझ में नहीं आता है । यह रूप है उस पूर्ण परमात्मा का, जिसको
वेद 'सत्य ज्ञानं अनंतं ब्रह्म' कह कर व्याख्या करते हैं । अर्थात उस
बृहत् अनंत सत्य ज्ञान को ईश्वर कहते हैं । वह ही पूर्ण बिन्दु है ।
इसलिये एक मत के दार्शनिक विद्वान उसे परबिन्दु भी कहते हैं ।
परन्तु वह ऐसा गोलाकार बिन्दु है जिसका केन्द्र सर्वत्र है परन्तु
सीमांत कहीं भी नहीं । उसका अनुभव साधारण-जन सुषुप्ति में

२० सौंदर्य लहरी
करते हैं और योगिजन समाधि में; परन्तु उसके सौंदर्य की द्युति
सर्वत्र है और उसको सौंदर्य की लहरी में आनन्द की लहर का योगी
उपासक अपने अन्तर में अनुभव करते हैं। क्योंकि सौंदर्य का भाव,
अधिभौतिक प्रायः दृष्टिगोचर होता है। परन्तु उसकी अध्यात्म
प्रतिक्रिया आनन्द में व्यक्त हुआ करती है। हम तीन स्तरों पर
एक ही तत्व की अनुभूति इस प्रकार करते हैं। प्रथम स्तर पर वह
परमतत्व अद्वैत अक्षर परम ब्रह्म कहलाता है। जगत में उसकी
अधिभूता अभिव्यक्ति के सौंदर्य की मोहात्मिका शक्ति का विकास
है और अध्यात्म पर आनन्द लहरी का। हम कह चुके हैं कि
नामरूपात्म जगत, आदि सत् शक्ति की परिणति है और उसके सौंदर्य
में उसी आधिदेवी की सौंदर्य लहरी झलक रही है। इस दृष्टि से
प्रथम ४१ श्लोकों का पूर्वार्ध जो अध्यात्म विद्या परक है-आनन्द
लहरी नाम से संज्ञित किया गया है। आठवें श्लोक में चिदानन्द-
लहरी और २१वें श्लोकोक्त परमानंद लहरी पद इस बात के स्पष्ट
संकेत हैं; और अंतिम उत्तरार्ध विराट विश्व में आदि कारणभूता
शक्ति जगज्जननी के मुख की सुन्दर झांकी दिखाता है। जैसा कि
४४वें श्लोकोक्त 'तव वदन सौंदर्यलहरी' पद से स्पष्ट है, आधि-
भौतिक रूप, आधिदैव की ओर लक्ष्य कराता है। और ३५वे
श्लोक में पिण्ड और ब्रह्मांड की एक समानता दिखाने के अभिप्राय
से कहा गया है कि दोनों एक चिदान्-द के ही परिणाम मात्र है।
क्योंकि यह देह आधिभौतिक तत्वों का ऐसा संघात है, जिसमें
परम और अध्यात्म दोनों ही भावों की उपलब्धि होती है। जिनका
प्रत्यक्षोकरण अध्यात्म विद्या का विषय है। परम तत्व का ज्ञेयत्व
दो भावों से प्राप्त होता है और उसकी अनुभूति अध्यात्म स्तर पर

सौंदर्य लहरी ९१
ही की जाती है । उक्त दोनों भावों को हम इन दो नामों के
सम्बन्ध से स्पष्ट समझ सकते हैं । प्रथम 'सच्चिदेकं ब्रह्म' और दूसरा
'सच्चिदानन्द ब्रह्म' प्रथम पद में सद्ब्रह्म के एक प्रज्ञानघन भाव की
प्रकर्षता का प्रत्याभास प्रस्फुटित होता है और दूसरे पद में चिदा-
नंदघन भाव की प्रधानता का । इस प्रकार अध्यात्म विद्या के दो
फांटे हो जाते है, प्रथम को ज्ञान मार्ग और दूसरे को भक्ति मार्ग
कहते हैं; जिनका वर्णन भगवान ने गीता के १२वें अध्याय के
२-४ श्लोकों में भी किया है, और प्रथम ज्ञान मार्ग को क्लिष्टतर
बताकर दूसरे मार्ग की प्रशंसा की है किः—
“मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते” (गीता १२–२)
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ (गी. १२–७)
यहां मय्यावेश्य मनः अथवा मय्यावेशित चेतस् से आनन्द के
आबेश का ही अभिप्राय है । क्यों कि ज्ञान का आवेश नहीं हो
सकता । आबेश सदा आनन्द का ही हुवा करता है । ज्ञान मार्ग
'अहं ब्रह्मास्मि', 'अयमात्मा ब्रह्म', 'प्रज्ञानं ब्रह्म', 'तत्वमसि'
महावाक्य के श्रवण, मनन, निदिध्यासन का मार्ग है । और दूसरा
योग का मार्ग है, उस योग का जिसमे प्रत्यगात्मा के आनन्दाबेश
से अहंवृत्ति का तादात्म्य किया जाता है । इन दोनों मार्गों को ज्ञान
योग और भाव योग भी कहते हैं । प्रथम में शिव तत्त्व की और
दूसरे में शक्ति तत्त्व की प्रधानता समझनी चाहिये । वैष्णव सम्प्रदायों
में भी राधा तत्त्व, शक्ति तत्त्व, आनन्दाबेश प्रधान है और सब

२२ सौंदर्य लहरी
प्राणियों का केन्द्रीभूत आकर्षण पद कृष्ण तत्त्व ज्ञान प्रधान तत्त्व
का वाचक है; परन्तु वैष्णव सम्प्रदायों की द्वैत भावना उपासक को
परम तत्व का आभोग मात्र प्रदान कर सकती है । और उस आभोग
से तादात्म्यभाव न कराकर अपूर्ण रह जाती है । तथापि उस
आनन्दावेश की अन्तिम पहुंच तादात्म्यभाव प्राप्त होने पर ही
मिलती है, जैसी चैतन्य महाप्रभु के भावावेश में प्रायः प्रादुर्भूत हुवा
करती थी । ज्ञानयोग को भावयोग की अपेक्षा से अभाव योग भी
कहा जाता है । कहा है:—
“ योगोहि प्रभवाप्ययौ ” ( कठ )
अर्थात योग दो प्रकार का है प्रभव योग और अप्यय योग ।
प्रभव योग का मार्ग आनन्दावेश का प्रभव पूर्वक मार्ग है, और
अप्यय योग में मनोमय कार्य जगत का परम तत्व में लयक्रम
किया जाता है ।
शक्ति उपासनायें सब आनन्द भाव की ही योग पद्धतियां
हैं । यद्यपि उनमें बहिर कर्मकांड का अधिक समावेश होने के
कारण उनके अभ्यन्तर्योग मार्ग से सर्व साधारण की जानकारी नहीं
होती, और वे लोग वास्तविकता से दूर रह कर सकाम अनुष्ठान
में ही आमरण लगे रहते हैं । श्रीविद्या की अधिष्ठातृ देवी महा
त्रिपुर सुन्दरी का स्वरूप चितिशक्ति कहा जाता है, परन्तु चिति-
शक्ति को चिन्मयी मात्र मानने से उसकी उपासना ज्ञान परक ही
नहीं समझनी चाहिये, वास्तव में वह भी आनन्दावेश युक्त भाव
योग का ही मार्ग है, इसलिये श्री भगवत्पाद ने चिदानन्द लहरी
और परमानन्द लहरी पदों का प्रयोग किया है ।

सौंदर्य लहरी २३
सनातन धर्म में सगुणोपासना के पांच मुख्य सम्प्रदाय है,
सगुण पंचोपासना वैष्णव, शैव, शाक्त, गाणपत्य और सौर, जिनमें
एक ही ब्रह्म की क्रमशः विष्णु, शिव, शक्ति,
गणपति और सूर्य पांच रूपों में उपासना की जाती है । शंकराचार्य
के पूर्व पांचों सम्प्रदायों के अनुयायी आपस में द्वेष बुद्धि रखते थे
और आपस में लडा करते थे, परन्तु श्री मच्छंकराचार्य ने सब में
एक ही ब्रह्म की उपासना सिद्ध कर के उनका पारस्परिक द्वेष दूर
किया और सब को एक ब्रह्मवाद के सूत्र में बांधकर सनातन धर्म
का एक संगठन बनाया, तब से सब ही उपासनाओं का लक्ष ब्रह्म
प्राप्ति माना जाने लगा है । विष्णु का अर्थ सर्वव्यापी है, इसलिये
ब्रह्मांड का स्वामी, जो सगुण रूप से सब का पालन कर्ता है, बहिर्दृष्टि
से उपासना करने वालों का इष्ट है । शिव प्रायः निर्गुण ब्रह्म
का वाचक समझा जाता है । शिव पद की प्राप्ति निर्विकल्प समाधि
द्वारा ही होती है, इसलिये शिव का चित्र सदा समाधिस्त अवस्था
में ही दिखाया जाता है । शक्ति परब्रह्म की शक्ति है, जो सारे विश्व
में व्यक्त होकर अनेक रूप धारण कर रहो है । गणपति शिवशक्ति के
योग से समाधि में उदय होने वाली ऋतंभरा प्रज्ञा का ज्ञान भण्डार
है, जिसमें ऋद्धि सिद्धि प्रकट होती हैं । उसका हाथी का सिर यह
प्रकट करता है कि साधक का पशुत्व अभी नष्ट नहीं हुवा है,
क्योंकि ब्रह्मज्ञान की बाधक सिद्धियां विघ्न बनकर उसे गिरा सकती
हैं, परन्तु ज्ञान तो स्वयं ब्रह्म ही है, ' सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्म '
इसलिये गणेश रूप से ज्ञान रूपी ब्रह्म की उपासना करने वालों को
विघ्नों का भय नहीं रहता । सूर्य सारे विश्व का प्राण माना जाता है.

२४ सौन्दर्य लहरी
सहस्र रश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः
( प्रश्न १-८
इसलिये प्राणोपासना करने वालों के लिये सूर्य भी ब्रह्म
प्रत्यक्ष सगुण रूप है ।
हम कह आये हैं कि उपासना का योगसे बडा सम्बन्ध
यदि कहा जाय कि उपासना योग का ही उ
उप सना का योग है तो अनुचित नहीं, उक्त पांचो उपासनायें यं
से सम्बन्धः- से किस प्रकार गुंथी हुई हैं यह भी हम नं
संक्षेप में बताने का यत्न करते हैं । योग साधन का कुण्डलिनी श
॰ के जागरण से श्रीगणेश होता है । मेरूदण्ड में जो नाडी सारे श
के नाडीजाल का मस्तिष्क से सम्बन्ध करती है, वह ही सुषुम्
ब्रह्मनाडी विरजा या सूर्य द्वार कहलाती है, जिसके द्वारा भ्रूमध्य
आज्ञाचक्र अथवा मूर्धा में प्राण ले जाये जा सकते है । जो यो
प्रयाण समय इस प्रकार प्राण भ्रूमध्य अथवा मूर्धा में ले जाकर प्र
त्याग करते हैं, वे ब्रह्म में लीन हो जाते हैं (देखें गीता अध्याय
श्लोक १०, ११, १२, १३,। उक्त नाडी में ६ चक्र हैं । गुदा
पीछे मूलाधार, उपस्थ के पीछे स्वाधिष्ठान, नाभि के पीछे मणि
हृदय में अनाहत, कण्ठ में विशुद्ध और भ्रूमध्य में आज्ञा, ये छ
चक्र क्रमशः पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश और मनस्तत्व
स्थान हैं । पृथ्वी का पीत, जल का श्वेत, अग्नि का रक्त, वायु
धूमाकार, आकाश का नील और मन का चन्द्र सदृश वर्ण हे
है । विष्णु की सर्व व्यापकता इन छः स्तरों में दिखाने के लि
नीचे पीताम्बर, स्वाधिष्ठान के निकट चांदी की मेखला, नाभि

सौन्दर्य लहरी २५
माला में गुंथा हुवा रक्त पुष्प, वक्षःस्थल को धूम्राकार वर्णवाला,
कण्ठ को नीले रंग का और मस्तक को चन्द्रवत चमकनेवाला
दिखाया जाता है । इस लिये ब्रह्माण्ड और पिण्ड में व्यापकता
दिखाने के लिये भगवान का चित्र इस प्रकार का खेंचा जाता है ।
शंख शब्दब्रह्म का द्योतक है । सुदर्शन चक्र काल के नियन्ता
सहस्ररश्मि आदित्य का; गदा भगवान के ईशन् शासन का चिह्न है,
और कमल सौभाग्यदान का गरुड इस बात को प्रकट करता है
कि भगवान के नामस्मरण से पृथ्‍वी से ब्रह्मलोक तक गति हो
सकती है-अथवा षट् चक्र बेध द्वारा सब तत्वों का बेध करके
सहस्रार में पहुंचा जा सकता है । प्राण ही महाखग है, जो सुषुम्ना
में प्रणव भगवान को लेकर सहस्रार में उड़ता है । कहा है:—
प्राणान् सर्वान् परमात्मनि प्रणामयतीति एतस्मात् प्रणवः ।
( अथर्व शिखोपनिषत् )
शिव का रूप परब्रह्म है जो सब तत्वों का प्रकृति सहित
शिव शक्ति लय स्थान है ! इसीलिये उनको सदा समाधिस्थ
उपासना दिखाया जाता है, और उनका स्थान सहस्रार है ।
शक्ति ज्ञानाग्नि का रूप है जो सब शुभाशुभ कर्मों को भस्म करके
सब तत्वों को अपने अपने कारण में लीन करती हुई सर्व कारणभूत
परब्रह्म में लीन करा देती है । शक्ति ब्रह्म के आदि संकल्प की
स्फुरणा का प्रथम स्पन्द है । वही चिति शक्ति है, वही प्राण
शक्ति है, वही इच्छा क्रिया और ज्ञान शक्ति है और विश्व को
धारण करने वाली अनन्त शेष शक्ति और पिण्ड में मूलाधार में

२६ सौंदर्य लहरी
सोने वाली कुण्डलिनी शक्ति है। जागने पर पशुराज सिंह पर
बैठकर अर्थात् रजोगुण को दबाकर मनुष्य की सब पाशविक वृत्तियों
का संहार करती हुई शिव सायुज्य पदवी देती है। इसीलिये
देवी पर पशु बली चढ़ाने की प्रथा पड़ गई है। मनुष्य अपने
अभ्यन्तर पाशविक भावों की बलि न देकर बाह्य बलि देते हैं, और
हिंसा करके जगत् जननी को सन्तुष्ट करना चाहते हैं।
या देवी सर्व भूतेषु चेतनेत्यभिधीयते, नमस्तस्यै ३ नमोनमः ।
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्यस्थिता जगत् ,, ,, ,,
दुर्गा सप्तशति के ऊपर दिये हुवे श्लोकों का भाव अथर्ववेद
के निम्न मंत्र में भी मिलता है, जिसका यह अर्थ है कि सब प्राणियों
की चेतना भगवती का स्वरूप है। इसलिये हिंसा करना भगवती
के स्वरूप की हिंसा करना है। अथर्ववेद का मंत्र यह है—
‘‘ते देवा उपाशिक्षन् सा अजानात् वधू सती ।
ईशा वशस्य या जाया सा वर्णमाभक्त ॥
अर्थ:—उन देवताओं ने जानना चाहा ( कि इस शरीर में
किसका वर्ण अर्थात् प्रकाश है) तब वह सती वधू ( उनकी इच्छा
को) जान गई और उसने बताया कि ईश्वर की जो ईश्वरी जाया
( पत्नि ) है, वह इस वर्ण का आभरण करती है।
परम ब्रह्म की आदि संकल्प शक्ति जो प्रत्येक सर्ग में सृष्टि
और स्थिति का कारण होती है और प्रलय के समय संहार रूपिणी

सौंदर्य लहरी २७
बनकर समस्त त्रिलोक को भस्म करके शंकर की अंगविभूति
बनाती है. वह ही महामाया ज्ञानियों को भी मोह में डाल रही है
इतर जनों की तो गणना ही क्या है ।
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥ ( दु स. )
वह अपने भक्तों को कल्प तरु के सदृश मनोवांछित भोग
भी देती है, और मुमुक्षुओं को शिव का साक्षात् कराकर शिव
सायुज्य पदवी प्रदान करती है । केनोपनिषत् में ब्रह्म का स्वरूप
इस प्रकार समझाया गया है:— श्रोत्र का श्रोत्र, मन का मन, जो
वाकशक्ति की भी वाक्, और प्राण का भी प्राण, चक्षु का भी चक्षु
है, उसे जानकर बुद्धिमान मनुष्य जीवन मुक्त होकर इहलोक से
प्रयाण करके अमर हो जाते हैं । जो वाणी से नही कहा जा
सकता, जिसके कारण वाणी बोलती है, उसी को तू ब्रह्म जान ।
जिसकी तू ( वाणी द्वारा ) उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ।
जिसको ( मनुष्य ) आंख से नही देख सकता, आंख जिसके कारण
देखती है, उसी को तू ब्रह्म जान । जिसकी तू उपासना ( दृष्टि
द्वारा ) करता है, वह ब्रह्म नहीं है । जिसको ( मनुष्य ) श्रोत्र से
नहीं सुन सकता श्रोत्र जिसके कारण सुनते हैं, उसीको तू ब्रह्म
जान, जिसकी तू उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है जिसको प्राण
से जीवित नहीं रखा जाता । प्राण जिसके कारण मनुष्य को जीवित
रखते हैं । उसीको ब्रह्म जान । जिसकी तू उपासना करता है
वह ब्रह्म नहीं है ।