सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी ११
मातृकाओं से है। और फिर उनके उतने ही अधिदेवता होते हैं।
आत्मा का सब से सम्बन्ध है। उसको सब से पृथक करना होता
है (देखें श्लोक १४); इसी प्रकार प्राणमय कोष के भी पांच स्तर
हैं, उनके नाम प्राण, अपान, समान, व्यान, और उदान हैं,
जिनके द्वारा अन्नमय कोष के अभ्यन्तर व्यापारों की सब क्रियाएं
होती हैं। ये क्रियाएं पांचों महाभूतों से सम्बन्धित होने के कारण
पांच प्रकार की हैं। अभ्यन्तर क्रियाएं श्वास प्रश्वास, पाचन,
रस का सातों धातुओं में वितरण और उनका निर्माण, निकम्मे
पदार्थों का मल-मूत्र स्वेद आदि से रेचन और शरीर को धारण
करने इत्यादि की क्रियाएं हैं। मनोमय कोष में भी पांचों भूतों से
सम्बन्धित ५ व्यापार हैं और उनकी ६४ किरणें हैं। (देखें श्लोक
१४) वे हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ और वाक् शक्ति की कर्मेन्द्रियों
की क्रियाएं हैं। विज्ञानमय कोष के भी ५ स्तर हैं वे भी पांचों
महाभूतों से सम्बन्धित ५ ज्ञानेन्द्रियों के व्यापार हैं। चारों कोषों
का अन्वय व्यतिरेक द्वारा पारस्परिक सम्बन्ध हैं। आनन्दमय कोष
के तीन गुणों के अनुरूप सात्विक, राजसिक और तामसिक
तीन स्तर हैं; जिनका भेद जाग्रत, स्वप्न, और सुषुप्ति में देखने में
आता है।
उपरोक्त पांचों कोषों और उनके व्यापारों से तादात्म्य करके
आत्मा जन्म मृत्यु जरा व्याधि शोक मोह के जाल में पडी है।
इस तादात्म्य का कारण माया अथवा अविद्या का तम है। अविद्या
का यह ही रूप है कि अनात्म तत्वों में आत्मभाव, उनकी अनित्यता
में नित्यत्व का भाव, उनके अपवित्र संघातों में पवित्रता का भाव
और उन पर पडने वाली आत्मा के ही आनन्द की छाया की