सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ सौन्दर्य लहरी
थ ईश्वर प्रणिधान का फल, मनोनिरोध रूपी शम है। दूसरे
मान पर “तपः स्वाध्यायेश्वर प्रणिधानानि क्रिया योग” (२-१)
तप और स्वाध्याय के साथ ईश्वर प्रणिधान का फल समाधि के
ल्ये भूमिका तैयार करता है, और अविद्या आदि क्लेशों को तनु
रता है। तीसरी जगह “शौचसन्तोषतपः स्वाध्यायेश्वर प्रणि-
ानानि नियमः” में ईश्वर प्रणिधान के पूर्व तप और स्वाध्याय के
थ शौच और सन्तोष और बढा दिये गये हैं, जिनसे युक्त ईश्वर
णिधान का फल समाधि की सिद्धि है। “समाधि सिद्धिरीश्वर
णिधानात्”। दम इंद्रिय निग्रह को कहते हैं। उपरति का अर्थ
िषयों से हट कर वृत्ति का अन्तर्मुखी होना है, जिसको प्रत्याहार
हते हैं। ये अष्टांग योग का पांचवा अंग है। उपरति के साथ
ख दुःख के सम रहने का साधन तितिक्षा कहलाता है। गुरु और
ास्त्रों में श्रद्धा सहित मन की स्वाभाविक एकाग्र अवस्था का उदय
ोना समाधान कहलाता है। इनके पश्चात मोक्ष की इच्छा होती
। तब ब्रह्म जिज्ञासा की क्षुधा लगने पर साधक महावाक्यों के
वण का अधिकारी बनता है। “शान्तौ दान्त उपरस्तितिक्षुः
माहितो भूत्वाऽत्मन्येवात्मन पश्यति” (बृह ४, ४, २३) इस
ृति के आधार पर ब्रह्म-जिज्ञासा के लिये उपरोक्त षट्सम्पत्ति
ी आवश्यकता बताई गई है। जिसका फल आत्म दर्शन है, और
ात्म दर्शन के पश्चात ब्रह्म जिज्ञासा उत्पन्न होती है। यह बात
ोचे दी हुई श्रुति से स्पष्ट हो जाती हं:—
“आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मंतव्यो निदिध्यासितव्यो
मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे द्रष्टे श्रुते मते विज्ञात इदं सर्वं
विदितम्” (बृह ४ ५ ६)