सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ सौन्दर्य लहरी
सहस्र रश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः
( प्रश्न १-८
इसलिये प्राणोपासना करने वालों के लिये सूर्य भी ब्रह्म
प्रत्यक्ष सगुण रूप है ।
हम कह आये हैं कि उपासना का योगसे बडा सम्बन्ध
यदि कहा जाय कि उपासना योग का ही उ
उप सना का योग है तो अनुचित नहीं, उक्त पांचो उपासनायें यं
से सम्बन्धः- से किस प्रकार गुंथी हुई हैं यह भी हम नं
संक्षेप में बताने का यत्न करते हैं । योग साधन का कुण्डलिनी श
॰ के जागरण से श्रीगणेश होता है । मेरूदण्ड में जो नाडी सारे श
के नाडीजाल का मस्तिष्क से सम्बन्ध करती है, वह ही सुषुम्
ब्रह्मनाडी विरजा या सूर्य द्वार कहलाती है, जिसके द्वारा भ्रूमध्य
आज्ञाचक्र अथवा मूर्धा में प्राण ले जाये जा सकते है । जो यो
प्रयाण समय इस प्रकार प्राण भ्रूमध्य अथवा मूर्धा में ले जाकर प्र
त्याग करते हैं, वे ब्रह्म में लीन हो जाते हैं (देखें गीता अध्याय
श्लोक १०, ११, १२, १३,। उक्त नाडी में ६ चक्र हैं । गुदा
पीछे मूलाधार, उपस्थ के पीछे स्वाधिष्ठान, नाभि के पीछे मणि
हृदय में अनाहत, कण्ठ में विशुद्ध और भ्रूमध्य में आज्ञा, ये छ
चक्र क्रमशः पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश और मनस्तत्व
स्थान हैं । पृथ्वी का पीत, जल का श्वेत, अग्नि का रक्त, वायु
धूमाकार, आकाश का नील और मन का चन्द्र सदृश वर्ण हे
है । विष्णु की सर्व व्यापकता इन छः स्तरों में दिखाने के लि
नीचे पीताम्बर, स्वाधिष्ठान के निकट चांदी की मेखला, नाभि