सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
एकादशः परिच्छेदः २४३
भयोरन्तरालेऽन्तःपङ्क्तिस्थं कोष्ठपञ्चकं वीथ्या सहैकीकृत्य बहिःपङ्क्तिस्थकोष्ठ-
सप्तकेन कोणानि तद्बहिः पङ्क्तिद्वये सान्तरं रेखात्रयं कृत्वा मध्ये षट्त्रिंशद्दलंसंयुक्तं
कमलं लिखेत् ॥ ३-१७ ॥
श्री भगवान् ने कहा—लाठी की
तरह सूत्र को नीचे गिरा कर उससे वेदी
का ऊपरी भाग अच्छी तरह चौकोर बना
लेवे । उस वेदी के क्षेत्र को समान रूप
से १८ भागों में विभक्त कर, घटिका रेणु
से रञ्जित सूत्र को प्रक्षिप्त कर मध्य की
तीन पङ्क्तियों में स्थित ३६ कोष्ठकों में
कमल निर्माण करे । उसके बाहर एक
पङ्क्ति में पीठ निर्माण करे । उसमें चार-
चार कोष्ठों से युक्त पूर्वादि चारों दिशाओं
का, फिर तीन-तीन कोष्ठों से युक्त
आग्नेयादि चार वि दिक् (कोण) दिशा का निर्माण करे । उसके बाद बाहर एक पङ्क्ति
में प्रदक्षिणा के लिये वीथी बनावे । उसके बाहर दो पङ्क्ति में पूर्वादि चारों दिशाओं में
पूर्ण शोभा चतुष्टय की सिद्धि के लिये पूर्वादि दिशाओं की अन्त वाली पङ्क्ति में चार
कोष्ठ बनावे और बाहर की पङ्क्ति में दो कोष्ठ को एक में मिला देवे । उसके बाहर
पूर्वादि दिशाओं में दो पङ्क्ति में स्थित चार कोष्ठ में चार द्वार बनावे । पूर्ण शोभा
वाले दोनों पार्श्व में अर्ध शोभा की सिद्धि के लिये बाहर की पङ्क्ति में दो कोष्ठक और
अन्तः पङ्क्ति में एक कोष्ठक इन दोनों को एक में मिला देवे । पूर्वादि पूर्ण शोभा
वाले चार कोष्ठक में आठ रक्तोत्पल अर्ध शोभाष्टक में नीलोत्पल का निर्माण करे ।
आग्नेयादि कोणों में रहने वाले दो-दो उपशोभा के अन्तराल में भीतरी पङ्क्ति में पाँच
कोष्ठक को वीथी के साथ एक में मिला देवे । बाहरी पङ्क्ति में रहने वाले कोष्ठ
सप्तक से कोण, उसके बाहर दो पङ्क्ति के अन्तर में तीन रेखा बना देवे । फिर मध्य
में छत्तिस दल का कमल बनावे ॥ ३-१७ ॥
षट्त्रिंशद्ददलयुक्तं तस्य लक्षणमुच्यते ॥ १७ ॥
पीठावनिसमीपे तु चतुर्थांशपदात् पुरा ।
समुद्धृत्य भ्रमं कुर्याद् ब्रह्मस्थानाच्च तन्तुना ॥ १८ ॥
दिक्सूत्राणां चतुर्णां तु एकैकं हि यदन्तरम् ।
वृत्तावधेः समैर्भागैः पत्रसंख्यैर्विभज्य च ॥ १९ ॥
षड्भिर्हीनं शतं सार्धं सूत्राणां तत्र निक्षिपेत् ।
सूत्रं प्राक्पदसंस्थं यत् तदाश्रित्याब्जपल्लवम् ॥ २० ॥
२४४ सात्वतसंहिता
कुर्याद् भागचतुष्केण यथा तदवधारय ।
तत्रकारः—पीठावनिसमीपे पादाच्चतुर्थांशं विहाय ब्रह्मस्थानगतेन तन्तुना भ्रमणं
कृत्वा तद्वृत्तमध्ये पूर्वपश्चिमायतमेकं सूत्रं तदुपरि दक्षिणोत्तरायतमेकं सूत्रं च दत्वा
दिक्सूत्राणां चतुर्णामेकैकं यदन्तरालं तद्वृत्तावधेः समैर्भागैर्नवधा नवधा विभज्यै-
कैकं भागं पुनश्चतुर्धा चतुर्धा विभज्य सूत्राणि प्रक्षिपेत् । आहत्य चतुश्चत्वारिंश-
दुत्तरशतसूत्राणि भवन्ति । तत्र प्राग्दिक्सूत्रमारभ्य चतुर्भिborderश्चतुर्भिर्भागैरेकैकं दलं
कुर्यात् ॥ १७-२१ ॥
अब कमल निर्माण का प्रकार कहते हैं—पीठ की भूमि के समीप एक पाद का
चौथा अंश छोड़कर ब्रह्म स्थान पर स्थित तन्तु से घुमा कर वृत्त बनावे । उस वृत्त के
मध्य में पूर्व पश्चिम की ओर एक आयतन सूत्र से नापे । उसके ऊपर दक्षिणायतन
एक सूत्र लगाकर दिशाओं में स्थित चार सूत्रों के अन्तराल में वृत्तावधि पर्यन्त सम
भाग से नव-नव भागों में प्रविभक्त करे । फिर एक-एक भाग को चार-चार भागों में
प्रविभक्त करे । फिर सूत्र फेंक देवे । इस प्रकार कुल जोड़ कर १४४ सूत्र होंगे ।
उसमें पूर्व दिशा के सम से आरम्भ कर चार-चार भागों का एक दल निर्माण करे ।
इस प्रकार कुल छत्तिस कमल दल का निर्माण हो जायेगा ॥ १७-२१ ॥
सव्यापसव्ये ये सूत्रे अन्तरस्य निरन्तरे ॥ २१ ॥
तयोरंशं समं कुर्याद् दलाग्रादङ्कमन्तरे ।
तदुद्देशात् तु सूत्रेण तदङ्कान्तर्गतेन च ॥ २२ ॥
अर्धचन्द्रद्वयं कुर्यात् तेन सूत्रेण वै समम् ।
पुनरभ्यन्तरे सूत्रं तत्सूत्राभ्यां निरोध्य च ॥ २३ ॥
पत्राग्रमानयेत् तस्माद् बहिस्तं शृङ्गसन्निधेः ।
लाञ्छ्यमानं दलाग्रं तु विधिनानेन सिद्ध्यति ॥ २४ ॥
दलाग्रब्रह्मदेशाभ्यां तुरीयांशेन चान्तरात् ।
भ्राम्य वै कर्णिकावृत्तं द्व्यंशमानेन केसरम् ॥ २५ ॥
दलाग्रगांशं वै मध्याद् व्योमार्थं भ्रामयेत् ततः ।
कृत्वैवं वर्णकैः पूतैः पूरणीयं महोज्ज्वलैः ॥ २६ ॥
तत्रकारः—एकस्मिन् भागे मध्यमसूत्रस्य दक्षिणभागयोरव्यवहिते ये सूत्रे,
तयोरन्तरालं यत्प्रमाणं तत्प्रमाणसमं दलाग्रान्मध्यमसूत्रे लाञ्छनं कृत्वा तल्ला-
ञ्छनान्तर्गतेन सूत्रेण दलाग्रमारभ्य सव्यदक्षिणयोरर्धचन्द्राकाररेखाद्वयं विलिख्य
पुनरभ्यन्तरस्थं सूत्रं तद्रेखाभ्यां संयोज्य तस्मात् शृङ्गसन्निधेर्बहिः पत्राग्रं चानयेत् । ततो
दलाग्रब्रह्मदेशयोन्तरालं यत्प्रमाणं तच्चतुर्थांशेन मध्यात् कर्णिकार्थं मण्डलं परिभ्राम्य
तद्द्विगुणमानेन केसरार्थं वृत्तं परिभ्राम्य दलाग्रांशमध्येऽपि व्योमार्थमेकं मण्डलं
परिभ्रामयेत् । एवं कृत्वा ततो वर्णपूरणं कुर्यात् ॥ २१ - २६ ॥
एकादशः परिच्छेदः २४५
उसका प्रकार कहते हैं—किसी एक भाग में मध्य सूत्र के दाहिनी ओर दो
भागों में बिना व्यवधान के जो दो सूत्र स्थापित हैं, उनके अन्तराल का जितना
प्रमाण है उतने अन्तराल के समान दल के आगे वाले मध्य सूत्र में चिह्न बनावे ।
फिर उस लाञ्छन के भीतर वाले सूत्र से दल के अग्रभाग से आरम्भ कर बायीं
एवं दाहिनी दोनों ओर अर्धचन्द्राकार दो रेखा बनावे । फिर अनास्थ सूत्र को उस
रेखा से मिला कर वहाँ से शृङ्ग सन्निधान से बाहर पत्र के आगे तक ले जावे। फिर
दलाग्र से ब्रह्म देश तक का जितना प्रमाण है, उसके चतुर्थांश से मध्य देश से
कर्णिका के लिये, मण्डल घुमाकर, उसके दूने मान से केसर के लिये वृत्त (गोला)
घुमाकर दल के अग्रांश के मध्य में गोला (= व्योम) के लिये एक मण्डल घुमावे ।
इतना करने के पश्चात् उसमें उज्ज्वल एवं पवित्र रङ्ग भर देवे ॥ २१-२६ ॥
उच्चाग्रविततां पीतां सबीजां विद्धि कर्णिकाम् ।
रेखान्वितानि पत्राणि सर्वाणि सुसितानि च ॥ २७ ॥
केसरत्रितयं कुर्यात् पत्रे पत्रेऽरुणप्रभम् ।
दलान्तरालमसितं वृत्तबाह्यं ज्वलत्प्रभम् ॥ २८ ॥
सितानि पीठकोणानि रक्तं तद्दिक्चतुष्टयम् ।
राजोपलप्रभां वीथीं पत्रमालाद्यलङ्कृताम् ॥ २९ ॥
पश्चिमांशाद् विना सर्वद्वाराण्यम्बुजपत्रवत् ।
कृष्णानि सर्वशोभानि द्वारोद्देशस्थितानि च ॥ ३० ॥
तदर्धाकृतितुल्यानि तूपशोभानि गर्भवत् ।
कोणानि केसराभानि सितशङ्खान्वितानि च ॥ ३१ ॥
शोणहेमादिवर्णं च क्रमाद् रेखागणं बहिः ।
तत्प्रकारः—कर्णिकां पीतवर्णेन, पीठदिक्चतुष्टयं र(ले?क्ते)न, तत्कोणचतुष्कं
श्वेतेन, प्रदक्षिणविधिं कृष्णवर्णेनापूर्य, वीथ्यां नानावर्णैः पत्रमालादींश्च विलिख्य,
पश्चिमांशं विना सर्वद्वारा(णि) अपि मध्यस्थितकमलदलवत् श्वेतेन, पूर्णशोभा-
चतुष्टयमपि कृष्णवर्णेन, अर्धशोभाष्टकं कमलगर्भवत् पीतेन, कोणानि केसरवद् रक्तेन
चापूर्य, कोणेषु श्वेतरेखाभिः शङ्खांश्च विलिख्य, रक्तपीतश्वेतवर्णैः क्रमेण रेखात्रयं
पूरयेत् । एवं मण्डललेखनप्रकारः ॥ २७-३२ ॥
रंग भरने का प्रकार कहते हैं—ऊपर को उठी हुई कर्णिका पीत वर्ण से रंगे
और पीठ की चारों ओर की दिशायें लाल वर्ण से, उसके चारों कोण श्वेत रङ्ग से
और प्रदक्षिणा विधि काले वर्ण से पूर्ण करे । वीथी में अनेक वर्ण के पत्र माला
आदि का निर्माण करे । पश्चिम दिशा को छोड़कर सभी द्वारों को, मध्य में स्थित
कमल दल के समान श्वेत रंग से, पूर्ण शोभा चतुष्टय को कृष्ण वर्ण से, अर्ध
शोभाष्टक को कमल गर्भ के समान पीत वर्ण से तथा कोणों को केसर के समान
२४६ सात्वतसंहिता
रक्त वर्ण से पूर्ण कर कोणों पर श्वेत रेखा से शङ्ख बना कर रक्त, पीत एवं श्वेत
वर्णों से क्रमशः तीन रेखाओं को पूर्ण करे । यहाँ तक मण्डल लेखन का प्रकार
कहा गया ॥ २७-३२ ॥
कृत्वैवमनुसन्धाय सर्वात्मत्वेन देहवत् ॥ ३२ ॥
रजांसि विद्धि भूतानि सितपीतादिकानि च ।
तन्मात्राण्युपशोभानि शोभानि करणानि तु ॥ ३३ ॥
एवं सर्वाणि कोणानि सद्द्वाराणीन्द्रियाणि च ।
बहिरावरणं यद्वै सत्त्वाद्यं त्रितयं हि यत् ॥ ३४ ॥
मनः सुवितता वीथी गर्वः पीठमुदाहृतम् ।
धीः पद्मं तदधिष्ठाता बीजात्मा चिन्मयः पुमान् ॥ ३५ ॥
एतन्मण्डलस्य भगवच्छरीरतयाऽत्रापि प्रसिद्धदेहवद् भूततन्मात्राणि दर्शयति—
कृत्वैवमित्यादिभिः ॥ ३२-३५ ॥
यतः यह मण्डल भगवान् का शरीर है इसलिये प्रसिद्ध देह के समान इसमें
भी भूत और तन्मात्रायें है । इसे कह रहे हैं—रजादिकों को पञ्चभूत समझे और
सित पीतादि वर्णों को तन्मात्रा समझे तथा उपशोभाओं को शोभा और करण
समझे । इसी प्रकार सभी कोणों को द्वार सहित इन्द्रियाँ समझे, जो बाहर के
आवरण हैं । वही सत्त्वादि त्रितय हैं, मन विस्तृत वीथी है, पीठ गर्व है, पद्म धी
(= बुद्धि) है और उसका अधिष्ठाता पुमान् चिन्मय बीजात्मा है ॥ ३२-३५ ॥
अमूर्त ईश्वरश्चात्र तिष्ठत्यानन्दलक्षणः ।
यस्य सन्दर्शनादेव शश्वद्भावः प्रसीदति ॥ ३६ ॥
ससङ्गानामसङ्गानां वपुष्पाते कृते सति ।
प्रायशो मुक्तिभाजां च त्विह जन्मैकशेषिणाम् ॥ ३७ ॥
देव आस्ते ज्ञतां हित्वा बहिरन्तश्च कर्मिणाम् ।
अन्यथा दृष्टमात्राद् वै कथमाह्लादमेति वै ॥ ३८ ॥
अन्तः संवेदनसमम् अस्तित्वप्रतिपादकम् ।
यद्यत् स्वलक्षणं तत्त्वं तत्तत् सर्वत्र सिद्धिगम् ॥ ३९ ॥
मण्डले भगवदवस्थानं सहेतुकमाह—अमूर्त इत्यादिभिः ॥ ३६-३९ ॥
इस प्रकार आनन्द लक्षण ईश्वर बिना मूर्त्ति के इस मण्डल में स्थित है । जो
सहेतुक है इसके दर्शन मात्र से शाश्वत भाव प्रसन्न हो जाता है । सङ्ग युक्तों के
एवं सङ्ग रहितों के, प्रायः मुक्तिभाजों के, अथवा एक जन्म मात्र शेष लोगों के
कर्म कर्त्ताओं के शरीर पात कर देने पर भी इसमें बाहर और भीतर ज्ञान को
एकादशः परिच्छेदः २४७
परित्याग कर ईश्वर रहता ही है । अन्यथा इस शरीर के दर्शन मात्र से मनुष्य
किस प्रकार आह्लादित हो सकता है । अन्तः समवेदना के समान अस्तित्व का
प्रतिपादक जो-जो इसमें स्वलक्षण तत्त्व है वहीं सब प्रकार की सिद्धि प्रदान
करते हैं ॥ ३६-३९ ॥
वस्तुत्वेन गृहीत्वैवं मण्डलं पूर्वनिर्मितम् ।
नाम्नाऽब्जनाभभुवनं सर्वदुःखक्षयङ्करम् ॥ ४० ॥
ततस्तस्मिन् क्रमेणैव ध्यात्वैकैकं निवेशयेत् ।
पूर्वोद्दिष्टेन बीजेन त्वाकारं पारमेश्वरम् ॥ ४१ ॥
एवमब्जनाभभुवनाख्यं मण्डलं परिगृह्य तत्र पूर्वोक्तक्रमेण तद्देवान् तत्तद्-
बीजादिमन्त्रैर्निवेशयेदित्याह—वस्तुत्वेनेति द्वाभ्याम् ॥ ४०-४१ ॥
सभी दुःखों का विनाश करने वाले एक अब्जनाभ भुवनाख्य मण्डल को
लेकर उसमें पूर्वोक्त क्रम से तत्तद् देवताओं को तत्तद् बीजादि मन्त्रों से ध्यान
करते हुए सन्निविष्ट करे । यहाँ तक मण्डल का लक्षण कहा गया । अब शङ्ख,
चक्र और पद्म एवं वृत्त कुण्ड तथा चतुरस्र पाँच कुण्डों के लक्षण को हे सङ्कर्षण
सुनिये ॥ ४०-४१ ॥
अथैवं भाजितात् क्षेत्राच्चतुरश्राद् महामते ।
पूर्वोद्दिष्टानि धिष्ण्यानि यथा कार्याणि तच्छृणु ॥ ४२ ॥
एवं मण्डललक्षणमुक्त्वा कुण्डलक्षणं शृण्वित्याह—अथेति । एवं भाजितात्
क्षेत्रात् पूर्वं मण्डलोक्तप्रकारेण सूत्रपातैरष्टादशधा विभक्तादित्यर्थः । पूर्वोद्दिष्टानि
= पूर्वमाराधनप्रकरणादिषूक्तानीत्यर्थः । धिष्ण्यानि = वह्निगृहाणि, कुण्डानीति
यावत् ॥ ४२ ॥
अब कुण्ड निर्माण का प्रकार कहते हैं—कुण्ड स्थान को पूर्व में आराधना
प्रकरण में कहे गये मण्डलोक्त क्रम की तरह सूत्रपात के द्वारा १८ भागों में
प्रविभक्त करे । हे महामते ! अब जिस प्रकार वह्नि गृह का निर्माण करना चाहिए,
उसे सुनिए ॥ ४२ ॥
पञ्चमं ब्रह्मकर्माद्यं मर्म प्राग्दिश्यवस्थितम् ।
अंशं दीर्घेण तत्स्थेन कुर्यात् सूत्रेण लाञ्छनम् ॥ ४३ ॥
अर्धचन्द्रसमाकारं भागयुग्मस्य चान्तरे ।
दक्षिणोत्तरभागाभ्यां तदधस्तत्समं तथा ॥ ४४ ॥
लाञ्छनद्वितयं कुर्यात् तिर्यक्संस्थानसंस्थितम् ।
भागद्वादशकस्यैक्यं स्यात् पङ्क्तिद्वितयाद् यथा ॥ ४५ ॥
ब्रह्ममर्म चतुर्थं यत् संख्यामानं च पूर्ववत् ।
२४८ सात्वतसंहिता
मर्म तस्य च पक्षस्थावेकममन्तरीकृतौ ॥ ४६ ॥
ताभ्यामवस्थितेनैव सूत्रेणैतत् प्रजायते ।
पुनर्मध्याद् द्वितीयं यद् मर्म चोर्ध्वं प्रवर्तते ॥ ४७ ॥
उसमें मध्यम मर्म मान से पूर्व दिशा में स्थित जो पाँचवाँ मर्म है, उन
संस्पर्शों में एक कोष्ठ बढ़ाए और बढ़ाए गये सूत्र से दो कोष्ठ में अर्ध चन्द्राकार
लाञ्छन करे । उसके नीचे की दो पङ्क्ति में एक द्वादश कोष्ठ की सिद्धि के लिये,
उसके दशक के बाहर दक्षिण दो कोष्ठों में और उत्तर के दो कोष्ठों में पूर्ववत् अर्ध
चन्द्राकार दो चिह्न तिरछे लिख कर मध्य से चौथा जो मर्म (= सन्धि) उसके
दक्षिण भाग में स्थित मर्म (= सन्धि) द्वय में स्थित सूत्र से इसी प्रकार उसके वाम
भाग के मर्मद्वयावस्थित सूत्र से पहले से लिखा हुआ अर्ध चन्द्राकार, तीनों
लाञ्छनों को एक में मिला देवे ॥ ४३-४७ ॥
तस्माद् वै त्र्यन्तरीभूतं चतुर्थं पक्षयोर्द्वयोः ।
मर्म तत्स्थेन सूत्रेण वृत्तार्थे पूर्ववल्लिखेत् ॥ ४८ ॥
ब्रह्ममर्मणि षष्ठस्य प्रत्यग्दिक्संस्थितस्य च ।
मर्मणोऽप्यथ वै सूत्रं कृत्वा तत्सम्प्रसार्य च ॥ ४९ ॥
यावद् वृत्तार्थबुध्नस्थं शृङ्गकोटेस्तु सन्निधिम् ।
एवं सूत्रद्वये दत्ते धिष्ण्यः शङ्खाकृतिर्भवेत् ॥ ५० ॥
प्रथमं शङ्खकुण्डलक्षणं दर्शयन् तत्कुण्डक्षेत्रमध्यखातस्य शङ्खाकारतासिद्ध्यर्थं
परितो लाञ्छनक्रममाह— पञ्चममित्यारभ्य धिष्ण्यः शङ्खाकृतिर्भवेदित्यन्तम् ।
ब्रह्मकर्माद्यं = मध्यममर्मप्रारम्भकमित्यर्थः । मर्म = प्राक्पश्चिमायतसूत्रस्य दक्षि-
णोत्तरायतसूत्रस्य च सन्धिस्थानमित्यर्थः ॥ ४३-५० ॥
तथा चैवं कुण्डनिर्माणप्रकारः— कुण्डस्थानं पूर्वं मण्डलोक्तप्रकारेण सूत्रपातै-
रष्टादशधा विभज्य तत्र मध्यमान्मर्मस्थानात् पञ्चमं प्राक्दिक्स्थ यन्मर्म तत्संस्पर्शा-
नामेककोष्ठदीर्घेण सूत्रेण कोष्ठद्वयेऽर्धचन्द्राकारं लाञ्छनं कृत्वा तदधःपङ्क्तिद्वये
कोष्ठद्वादशकस्यैक्यसिद्ध्यर्थं तद्दशकाद् बहिर्दक्षिणकोष्ठद्वये तदुत्तरकोष्ठद्वये च
पूर्ववदर्धचन्द्राकारं लाञ्छनद्वयं तिर्यग्विलिख्य मध्याच्चतुर्थं यन्मर्म तद्दक्षिणभागस्थ-
मर्मद्वयावस्थितेन सूत्रेण तद्वामभागमर्मद्वयावस्थितेन सूत्रेण च पूर्वं विलिखितमर्धचन्द्रा-
कारलाञ्छनत्रयं चैकीकृत्य पुनर्मध्याद् द्वितयमूर्ध्वस्थं यन्मर्म तस्मात् त्र्यन्तरीभूतं चतुर्थं
दक्षि(णं? ण)पार्श्वस्थं वामपार्श्वस्थं च यन्मर्म तदवस्थितेन सूत्रेण पूर्ववद् दक्षिणकोष्ठद्वये
वामकोष्ठद्वये चार्धचन्द्राकारं लाञ्छनद्वयं तिर्यग् विलिखेत् । एवं कृते पूर्वोक्तद्वादशक-
स्याधःपङ्क्तिद्वयेऽपि भागद्वादशकस्यैक्यं भवति । अथ पश्चिमदिशि मध्यात् षष्ठस्य
मर्मणः सूत्रद्वयं प्रसार्य पूर्वोक्तयोर्दक्षिणोत्तरभागस्थार्धचन्द्राकारलाञ्छनयोः शृङ्गाग्राभ्यां
सह योजयेत् । एवं कृते शङ्खाकारता सिद्ध्यति ॥ ४३-५० ॥
एकादशः परिच्छेदः २४९
इसके बाद, पुनः मध्य से द्वितीय ऊपर में रहने वाला जो मर्म उन तीनों के
अन्तर में रहने वाला चतुर्थ दक्षिण पार्श्वस्थ तथा वामपार्श्वस्थ जो मर्म उसमें रहने
वाले सूत्र से पूर्ववत् दक्षिण कोष्ठ द्वय तथा वाम कोष्ठद्वय में अर्ध चन्द्राकार दो
लाञ्छन तिरछी ओर लिखे । ऐसा करने से पूर्वोक्त द्वादशक के नीचे दोनों पङ्क्ति में
रहने वाला भाग द्वादशक एक हो जायेगा । इसके बाद पश्चिम दिशा में मध्य से
छठे मर्म को दो सूत्र फैलाकर पूर्वोक्त दक्षिणोत्तर भागस्थ अर्ध चन्द्राकार दोनों
लाञ्छनों को शृङ्ग के आगे रहने वाले दोनों किनारों से मिला देवे । ऐसा करने से
उस अग्निकुण्ड की शङ्खकुण्ड की आकारता सिद्ध हो जायेगी ॥ ४८-५० ॥
तस्य भागसमा कार्या लाञ्छनैर्मेखला बहिः ।
पूर्वोक्तमर्मगैः सूत्रैर्यथा तदवधारय ॥ ५१ ॥
द्व्यंशदीर्घेण सूत्रेण नवचन्द्रकलासमम् ।
चतुर्णामन्तरेशानां प्राग्दिक् कुर्याच्च लाञ्छनम् ॥ ५२ ॥
ईशवह्निपदाभ्यां तु वृत्ततुर्यांशसम्मिते ।
द्वे लाञ्छने समे कुर्यादेकभागाधिके ततः ॥ ५३ ॥
तत्समे ह्यपरे द्वे वै यत्तदा लाञ्छ्य लाञ्छनैः ।
दक्षिणोत्तरभागाभ्यां पश्चात् सूत्रद्वयं क्षिपेत् ॥ ५४ ॥
कृत्वा सप्तममर्मस्थं पूर्वोद्दिष्टक्रमेण तु ।
जीवसूत्रस्य पाश्चात्ये भागे पार्श्वद्वये स्थितम् ॥ ५५ ॥
तत्खातस्य बहिः शङ्खाकारमेखलानिर्माणप्रकारमाह—तस्य भागसमेत्यारभ्य
पूर्वोद्दिष्टक्रमेण त्वित्यन्तम् ॥ ५१-५५ ॥
एवं खातार्थं परितो लाञ्छनं कृत्वा तद्बहिस्तथैव शङ्खाकारैकभागमिति
मेखलासिद्ध्यर्थं प्राग्दिशि कोष्ठद्वयदीर्घेण सूत्रेण कोष्ठचतुष्टयेऽर्धचन्द्राकारं लाञ्छनं
कृत्वा तथैवेशान्यकोण आग्नेयकोणे च कोष्ठपञ्चके लाञ्छनद्वयं कृत्वा तदधः पार्श्व-
द्वयेऽपि कोष्ठचतुष्टये पूर्ववद् द्वे लाञ्छने विलिख्य पूर्वोक्तरीत्या पश्चिमभागस्थ-
सप्तममर्मणः सूत्रद्वयं प्रसार्य पूर्वोक्तलाञ्छनद्वययोः शृङ्गाग्राभ्यां सह योजयेत् । एवं कृते
मेखलारूपं सिद्ध्यति ॥ ५१-५५ ॥
इसी प्रकार खात के लिये भी चारों ओर लाञ्छन निर्माण करे । उसके बाहर
शङ्खाकार के एक भाग की मेखला सिद्धि के लिये, पूर्व दिशा में दो कोष्ठक के समान
दीर्घ सूत्र से चार कोष्ठों में अर्ध चन्द्राकार लाञ्छन बना कर, उसी प्रकार ईशानकोण,
आग्नेयकोण में और पञ्चकोष्ठक में दो लाञ्छन बनाकर, उसके नीचे दोनों पार्श्व में
स्थित कोष्ठ चतुष्टक में पूर्ववत् दो लाञ्छन लिख कर, पूर्वोक्त रीति से पश्चिम भाग के
सातवें मर्म का दोनों सूत्र फैलाकर पूर्वोक्त दोनों लाञ्छन के शृङ्ग के अग्रभाग से एक
में मिला देवे । ऐसा करने से मेखला का रूप सिद्ध हो जायेगा ॥ ५१-५५ ॥
सा० सं० - 20
२५० सात्वतसंहिता
भागद्वयं द्वयं लाञ्छ्यं योन्यर्थं चार्धवृत्तवत् ।
तच्छृङ्गकोटिगे सूत्रे कृत्वा ते सम्प्रसार्य च ॥ ५६ ॥
खातभूभागपर्यन्तं तत्पदाद् वटपत्रवत् ।
जायते सर्वकुण्डानां योनिरैवंविधा शुभा ॥ ५७ ॥
इसी प्रकार कुण्ड के पश्चिम भाग में योनि निर्माण के लिये मध्यसूत्र के
दक्षिण भाग के कोष्ठों में तथा वाम भाग के दोनों कोष्ठों में अर्ध चन्द्राकार दो
लाञ्छन बना कर दक्षिण लाञ्छन के दक्षिण शृङ्गाग्र में एक सूत्र, वाम भागस्थ
लाञ्छन के वाम शृङ्गाग्र से एक सूत्र, दोनों मिलाकर उन दोनों को वटपत्र के
समान खात भाग पर्यन्त फैला देवे । ऐसा करने से योनि बन जायेगी । इस प्रकार
योनि का निर्माण आगे कहे जाने वाले कुण्डों में भी करना चाहिये ॥ ५६-५७ ॥
भागार्धमानसूत्रेण योनेरभ्यन्तरे पुनः ।
अर्धवृत्तद्वयं दद्यात् तद्वत् सूत्रद्वयान्वितम् ॥ ५८ ॥
खातस्यान्तर्गतो वर्ज्यश्चतुर्थांशस्तु कोष्ठकात् ।
कोष्ठार्धं निखनेच्छेषं तत्समं वा पुरोदितम् ॥ ५९ ॥
दैर्घ्यात् पादाधिका कार्या योनिर्वे पृष्ठतोन्नता ।
गजोष्ठसदृशी चाग्रात् स्पृशन्ती दशनच्छदम् ॥ ६० ॥
तद्बहिःपङ्क्तिमारभ्य खातपर्यन्तं प्रागादिषु योनिनिर्माणप्रकारं खातस्य परितः
कोष्ठचतुर्थांशेनौष्ठनिर्माणप्रकारं चाह—जीवसूत्रस्येत्यारभ्य स्पृशन्ती दशनच्छदमित्य-
न्तम् । जीवसूत्रस्य मध्यसूत्रस्येत्यर्थः । पार्श्वद्वये मध्यसूत्रस्य दक्षिणवामभागयोरि-
त्यर्थः । तत्समं निखनेत् । खातभूभागविस्तारायामतुल्यं खातं कुर्यादित्यर्थः । अथवा
पुरोदितं "त्र्यंशेनार्धेन वांशेन खाताद् व्यासो विधीयते" (६।७७) इति नित्याग्नि-
कार्यप्रकरणोक्तं वेत्यर्थः । एवमेवोक्तं पारमेश्वरेऽपि—
खातार्थमन्तरावृत्तादन्तरं निखनेत् समम् ॥
त्रिपादमर्धपादं वा (२६।१२-१३) इति ।
दशनच्छदमोष्ठमित्यर्थः ॥ ५५-६०॥
अथ पाश्चात्ये भागे योनिसिद्ध्यर्थं मध्यसूत्रदक्षिणभागकोष्ठद्वये वामभागकोष्ठ-
द्वये चार्धचन्द्राकारलाञ्छनद्वयं विलिख्य दक्षिणलाञ्छनस्य दक्षिणशृङ्गाग्र एकं सूत्रं
वामभागस्थलाञ्छनस्य वामशृङ्गाग्रेणैकं सूत्रं संयोज्य तद्द्वयमपि वटपत्रवत् खातभाग-
पर्यन्तं प्रसारयेत् । एवं कृते योनिः सिद्ध्यति । इयं योनिवक्ष्यमाणकुण्डनामपि
साधारणा ॥ ५६-५७ ॥
पुनस्तद्योनेरभ्यन्तरे मध्यसूत्रस्य दक्षिणकोष्ठे च कोष्ठार्धमानसूत्रेण पूर्ववदर्ध-
चन्द्राकारं लाञ्छनद्वयं विलिख्य पूर्ववत् तयोः शृङ्गाग्राभ्यां सूत्रद्वयं प्रसारयेत् । अथ
खातस्य परित ओष्ठसिद्धयर्थं खातस्यान्तः परित एकं कोष्ठं चतुर्धा विभज्य तेष्वेकं
एकादशः परिच्छेदः २५१
भागं विसृज्य शेषं सर्वमपि खातभागविस्तारसमं तत्र्यंशमर्धं वा निखनेत् । पूर्वोक्त-
योनिदैर्घ्यात् सपादकोष्ठद्वयमिता पृष्ठतो गजोष्ठसदृशी पूर्वोक्तमोष्ठं स्पृशन्ती सती (=
मेखला) कर्तव्या ॥ ५८-६० ॥
योनिकुण्ड पुनः उस योनि के भीतर मध्य सूत्र के और दक्षिण
कोष्ठ में भी कोष्ठक के आधे प्रमाण वाले सूत्र से पूर्ववत्
अर्ध चन्द्राकार दो लाञ्छन बना कर पूर्ववत् उनके दोनों
शृङ्ग से दो सूत्र प्रसारित करे । इसके बाद खात के चारों
ओर ओष्ठ की सिद्धि के लिये, खात के भीतर चारों ओर
एक कोष्ठ को चार भागों में विभक्त करे । उसमें एक भाग
को छोड़कर शेष सभी खातभाग के विस्तार के समान
उसका तीसरा अंश अथवा आधा अंश खने । पूर्वोक्त
योनि के विस्तार से लेकर सवा दो कोष्ठ पर्यन्त पीछे की ओर हाथी के ओठ के
समान पूर्वोक्त ओष्ठ का स्पर्श करते हुए मेखला निर्माण करे ॥ ५८-६० ॥
पुरोभागचतुर्थांशं योनेरग्राद् विसृज्य तु ।
दद्यात् प्राक्सूत्रसम्बन्धं सूत्राणां द्वितयं परम् ॥ ६१ ॥
पूर्वोक्तलाञ्छनानुसारेण खातार्थमेकं तद्बहिरोष्ठार्थमेकं तद्बहिर्मेखलार्थमेक-
मिति सूत्रत्रयं दद्यादित्याह—पुरोभागेति ॥ ६१ ॥
इस प्रकार से चारों ओर योनि के अग्रभाग में पूर्वोक्त रीति से कोष्ठ का
चतुर्थांश त्याग कर खात के लिये, शङ्खाकार सूत्र पूर्व की भाँति लगाकर उसके
बाद ओष्ठ निर्माण के लिये एक सूत्र और मेखला के निर्माण के लिये एक सूत्र
देवे ॥ ६१ ॥
अनुपातेन वै ताभ्यामग्रात् सङ्कोचमाचरेत् ।
भागपङ्क्तित्रयेणैव मेखलात्रितयं बहिः ॥ ६२ ॥
सम्पाद्यं चतुरश्रं तु शङ्खं तत्रितयोपरि ।
आशङ्खं मेखलानां तु प्रोन्नतत्वं स्वविस्तृतेः ॥ ६३ ॥
ओष्ठाद्यङ्गानां क्रमेण संकोचमाह—अनुपातेनेति । एवमुक्तं पारमेश्वरेऽपि—
“मेखलावधिपर्यन्तं नीचान्यङ्गानि मीलयेत्” (२६।२३) इति ।
मेखलात्रयनिर्माणमाह—भागपङ्क्तित्रयेणेति सार्धेन ॥ ६२-६३ ॥
एवं च खातप्रदेशे परितो योन्यग्रे पूर्वोक्तरीत्या कोष्ठचतुर्थांशं विसृज्य खातार्थं
शङ्खाकारं सूत्रं पूर्ववद् दत्वा तदनन्तरमोष्ठार्थमेकं सूत्रं मेखलार्थमेकं सूत्रं च दद्यात् ।
ऊर्ध्वे ओष्ठं तदधो मेखला यथा स्यात् तथा तत्सूत्रयोः पातं संकुचितं कुर्यात् तद्बहिः
परितः पङ्क्तित्रयेण चतुरश्रं मेखलात्रयं कुर्यात् । शङ्खान्तानां मेखलानामौन्नत्यं तु
कुण्डविस्तारसमं कुर्यात् ॥ इति शङ्खकुण्डलक्षणम् ॥ ६२-६३ ॥
२५२ सात्वतसंहिता
जिस प्रकार अपर ओष्ठ उसके नीचे मेखला बन जावे उस प्रकार संकोच
के साथ दोनों सूत्रपात करे। उसके बाहर तीन पङ्क्ति में चौकोर तीन मेखला का
निर्माण करे। शङ्खान्त मेखलाओं की ऊँचाई कुण्ड के विस्तार के समान ही
करे ॥ ६२-६३ ॥
चक्रकुण्डलक्षणकथनम्
मेखलानां तु शङ्खस्य यन्मध्येऽश्रिचतुष्टयम् ।
तच्चक्रचिह्नितं कुर्यात् तल्लक्षणमथोच्यते ॥ ६४ ॥
ब्रह्ममर्मनिरुद्धेन चतुर्भागसमेन तु ।
खातार्थं प्राग् भ्रमं दद्यात् क्षेत्रमध्ये महामते ॥ ६५ ॥
बहिर्भागसमा नाभिस्तद्बहिर्द्व्यंशविस्तृतम् ।
अरक्षेत्रं च तस्यापि नेमिभागसमा बहिः ॥ ६६ ॥
भागेन तद्बहिस्त्वेका चतुरश्रा च मेखला ।
भ्राम्य मध्यादरक्षेत्रं वृत्तेनैकेन वै पुनः ॥ ६७ ॥
ततः सूत्राष्टकं दद्याद् दिग्गविदिक्संस्थितं पुरा ।
तस्य चान्तर्गतं पश्चादष्टकं पातयेत् परम् ॥ ६८ ॥
ततस्तेषां समापाद्यम् अरत्वममलेक्षण ।
अन्तर्वृत्तनिरोधेन प्रतिसूत्रस्य पक्षयोः ॥ ६९ ॥
सूत्रेण लाञ्छनं कुर्यान्नाभिनेमिभ्रमावधेः ।
एकांशादर्धमानं च नेमिवृत्तस्य चान्तरे ॥ ७० ॥
द्वाभ्यां द्वाभ्यामराभ्यां तु मध्ये कुर्यात् प्रधिं प्रधिम् ।
विस्तारप्रोन्नता नाभिः कूर्मपृष्ठोपमाऽरका ॥ ७१ ॥
नेमिं दर्पणवत् कुर्यात् त्वीषन्निम्नावसानतः ।
अथ चक्रकुण्डलक्षणमाह—मेखलानां तु शङ्खस्येत्यारभ्य शिष्टं पुरोदितं सर्वमि-
त्यन्तम् । अत्र प्रतिसूत्र(स्य) पक्षयोः सूत्रेण लाञ्छन कुर्यादित्यर लक्षणमुक्तम् । पार-
मेश्वरे—"मत्स्यवल्लाञ्छनं कुर्यात्" (२६।२१) इति व्यक्तमुक्तं ज्ञेयम् ॥ ६४-७२ ॥
अथ चक्रकुण्डलक्षणमुच्यते—पूर्वोक्तप्रकारेणाष्टादशधा विभक्ते चतुरश्रे क्षेत्रे
मध्ये मर्मस्थाने सूत्रं संस्थाप्य मध्यात् पञ्चमरेखास्पर्शिना सूत्रेणैकं मण्डलं विलिख्य
पुनः षष्ठरेखास्पर्शिना सूत्रेणैकं वृत्तमापाद्य पुनर्नवामरेखास्पर्शिना सूत्रेणैकं वृत्तं
कुर्यात् । तेषु प्रथमं मण्डलं खातार्थं द्वितीयं नाभिस्थानं तृतीयमरस्थानं चतुर्थं नेमि-
स्थानमिति ज्ञेयम् । तद्बहिःपङ्क्तौ चतुरश्रा एकैव मेखला कर्तव्या । पूर्वोक्तमरस्थानं
मध्यात् पुनरेकेन वृत्तेन परिभ्राम्य तत्र प्रागादिदिक्ष्वाग्नेयादिविदिक्षु च सूत्राष्टकं दत्वा
तेषामरत्वसिद्ध्यर्थमन्तर्वृत्तनिरुद्धेन सूत्रेण प्रतिसूत्रस्य पक्षयोर्नाभिवृत्तपर्यन्तं नेमि-
एकादशः परिच्छेदः २५३
वृत्तपर्यन्तं च मत्स्यवल्लाञ्छनं कृत्वा नेमिवृत्तस्यान्तरे द्वयोर्द्वयोररयोर्मध्ये एकैकं प्रधिं
कुर्यात् । अत्र नाभिः कुण्डविस्तारसदृशोच्छाया कूर्मपृष्ठसदृशी कार्या । नेमि-
र्दर्पणसदृशयग्रे ईशन्निम्ना च कर्तव्या । अन्यत् सर्वं पूर्ववत् कुर्यात् ॥ इति चक्र-
कुण्डलक्षणम् ॥ ६४-७२ ॥
अब चक्र कुण्ड का लक्षण कहते हैं—
पूर्वोक्त प्रकार से अट्ठारह भागों में प्रविभक्त
चक्रकुण्ड चौकोर क्षेत्र में मध्य के मर्मस्थान में सूत्र
संस्थापित करे । मध्यम से पञ्च रेखा का स्पर्श
करने वाले सूत्र से एक मण्डल निर्माण कर षष्ठ
रेखा का स्पर्श करने वाले सूत्र से एक वृत्त बना
कर, फिर नवम रेखा का स्पर्श करने वाले सूत्र
से एक वृत्त का निर्माण करे । उसमें प्रथम
मण्डल खात के लिये, द्वितीय नाभि स्थान के
लिये, तृतीय अरा के लिये और चतुर्थ मण्डल
नाभि के लिये समझना चाहिये । उसके बाहर की पङ्क्ति में चौकोर एक ही मेखला
बनानी चाहिये । पूर्वोक्त अर स्थान मध्य से पुनः एक वृत्त से घुमा कर, पूर्वादि
दिशाओं में तथा आग्नेयादि कोणों में, आठ सूत्र लगा कर, उनके अरत्व की
सिद्धि के लिये, अन्तर्वृत्त निरुद्ध सूत्र से, प्रत्येक सूत्र के दोनों पक्षों के नाभिवृत्त
पर्यन्त और नेमिवृत्त पर्यन्त, मछली के समान रेखा खींच कर, नेमिवृत्त के भीतर
रहने से दो-दो अरों के बीच में एक-एक प्रधि निर्माण करे । यहाँ नाभि कुण्ड के
विस्तार के सदृश ऊँची कूर्मपृष्ठ के सदृश बनावे । नेमि दर्पण के समान आगे
थोडी नीची बनावे । अन्य सब निर्माण पूर्ववत् करे ॥ ६४-७२ ॥
पद्मकुण्डलक्षणकथनम्
शिष्टं पुरोदितं सर्वम् अथ पद्माकृतिं शृणु ॥ ७२ ॥
भागार्धं भ्रामयेन्नाभेर्बहिः केसरसिद्धये ।
भ्रामयेदपरं चार्धमरक्षेत्रस्य बाह्यगम् ॥ ७३ ॥
नीत्वा लोपमनेनैव विधिना नेमिमण्डलम् ।
अरसूत्राश्रितं कुर्यात् ततः पद्मदलाष्टकम् ॥ ७४ ॥
केसरभ्रमरुद्धेन सूत्रेणार्धेन्दुलक्षणम् ।
तच्छृङ्गकोटिसंस्थेन परिधेर्बाह्यकेन तु ॥ ७५ ॥
सूत्रद्वयेन पत्राग्रं कुर्याद् ब्रह्मभ्रमावनेः ।
निरन्तराणामा मूलात् केसराणां महामते ॥ ७६ ॥
कर्णिकोच्छ्रायतुल्यानां विभागं जनयेत् स्फुटम् ।
२५४ सात्वतसंहिता
शङ्खकोणचतुष्के तु शेषं पूर्ववदाचरेत् ॥ ७७ ॥
पद्मकुण्डलक्षणमाह—
अथ पद्माकृतिं शृण्वित्यारभ्य शेषं पूर्ववदाचरेदित्यन्तम् ॥ ७२-७७ ॥
अथ पद्मकुण्डलक्षणमुच्यते—अत्रापि चक्रकुण्डवत् प्रथमं मण्डलं खातार्थं
कृत्वा द्वितीये नाभिमण्डले भागार्धं कर्णिकासिद्ध्यै अपरार्धं केशरसिद्ध्यै द्वेधा
मण्डलीकृत्याऽरक्षेत्रस्य बहिरेवमेव नेमिमण्डलं द्वेधा कृत्वा प्रथमभागमरक्षेत्रेण
सहैकीकुर्यात् । उत्तरभागं पत्राग्रसिद्ध्यै स्थापयेत् । अरक्षेत्रेऽष्टदलसिद्ध्यर्थं
प्रागाद्यष्टदिक्ष्वपि केसरमण्डलरुद्धेन सूत्रेणाऽर्धचन्द्राकारं लाञ्छनद्वयं (द्वयं?)
परस्पराभिमुखं कृत्वा तच्छृङ्गाग्रसंस्थितेन दलमण्डलबाह्यगेन सूत्रद्वयेन पत्राग्रं कुर्यात् ।
आमूलान्तरितन्तराणां कर्णिकोच्छ्रायतुल्यानां केसराणां व्यक्तं यथा तथा विभागं
जनयेत् । पत्राग्रमण्डलाद् बहिश्चतुष्कोणेषु शङ्खचतुष्टयं कुर्यात् । शेषं पूर्ववत् ॥ इति
पद्मकुण्डलक्षणम् ॥ ७३-७७ ॥
पद्मकुण्ड
अब पद्म कुण्ड का लक्षण कहते हैं—यहाँ
भी चक्रकुण्ड के समान प्रथम मण्डल खात के लिये
बनावे । द्वितीय नाभिमण्डल में आधा भाग कर्णिका
बनाने के लिये, शेष आधे भाग में केशर निर्माण के
लिये दो मण्डल बनावे । फिर अर क्षेत्र के बाहर भी
इसी प्रकार नेमि मण्डल कर, दो भाग कर, प्रथम
भाग को अरा क्षेत्र के साथ मिला देवे । उत्तर भाग
पत्राग्र बनाने के लिये स्थापित करे । अरा क्षेत्र में
अष्टदल निर्माण के लिये पूर्वादि आगे दिशाओं में केशर मण्डल से अवरुद्ध सूत्र
से अर्ध चन्द्राकार दो लाञ्छन परस्पराभिमुख बना कर, उस शृङ्गाग्र स्थित दल
मण्डल से बाहर रहने वाले दो सूत्रों से पद्माग्र निर्माण करे । मूल से प्रारम्भ करके
अन्तर रहित कर्णिका के ऊँचाई के तुल्य जिस प्रकार केशर स्पष्ट दिखाई पड़े,
ऐसा उनका विभाग करे और पद्माग्र मण्डल के बाहर चारों कोणों पर चार शङ्ख
बनावे । शेष पूर्ववत् बनावे ॥ ७३-७७ ॥
योनिमेकेन भागेन चतुर्भिर्मेखलागणम् ।
खातं पूर्वसमं किन्तु वृत्ते वृत्तास्तु मेखलाः ।
चतुरश्रे तदाकारा इत्युक्तं कुण्डपञ्चकम् ॥ ७८ ॥
वृत्तचतुरश्रकुण्डयोर्लक्षणमाह—योनिरिति सार्धेन ॥ ७८ ॥
अब वृत्त तथा चौकोर कुण्ड का लक्षण कहते हैं—पूर्वोक्त रीति से
अट्ठारह भाग में प्रविभक्त क्षेत्र में मध्य में पूर्ववत् ६४ कोष्ठ खात के लिये
छोड़कर, उसके बाहर एक पङ्क्ति में योनि बनावे । फिर चार पङ्क्ति में चार मेखला
एकादशः परिच्छेदः २५५
वृत्त कुण्ड चतुरस्रकुण्ड
निर्माण करे । किन्तु खात और मेखला वृत्त कुण्ड में वृत्ताकार तथा चौकोर कुण्ड
में चौकोर निर्माण करनी चाहिये । वृत्त और चौकोर इन दोनों कुण्डों में ओष्ठ और
योनि पूर्ववत् निर्माण करे ॥ ७८ ॥
कालमाहुतिसंख्यां च होमद्रव्यप्रभूतताम् ।
ज्ञात्वैवमेकहस्तात् तु कुर्यादष्टकरावधि ॥ ७९ ॥
॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां यागकुण्डविधिर्नाम
एकादशः परिच्छेदः ॥ ११ ॥
होमाधिक्यानुसारेण कुण्डविस्ताराभिवृद्धिमाह—कालमिति । अत्रैकहस्तादार-
भ्याष्टहस्तपर्यन्तमेकैकाङ्गुलवृद्ध्या नवषष्ट्युत्तरशतसंख्याकमानभेदा ज्ञेयाः । पारमेश्वरे
द्वादशाङ्गुलमारभ्याष्टहस्तपर्यन्तमेकाशीत्यधिकशतसंख्याकमानभेदा उक्ताः—
आ द्वादशाङ्गुलान्मानादेकैकाङ्गुलवर्धनात् ।
द्विचतुर्हस्तपर्यन्तमेकाशीत्यधिकं शतम् ॥
एतेष्वेकतरं प्रोक्तमन्येषामेवमेव हि । (२६।२८-२९) इति ।
द्वादशाङ्गुलमारभ्य कुण्डमानाभिवृद्धिरवश्यमपेक्षिता । यतोऽत्र प्रतिष्ठाप्रकरणे—
ह्रासादङ्गुलयुग्मस्य यावद्वै षोडशाङ्गुलम् ।
स्यात् षट्करे गृहे कुण्डं कार्या वा मेखलाधिका ॥ (२५।९४)
इति षोडशाङ्गुलकुण्डमप्युक्तम् । एवमेतावत्संख्यकहोम एतावन्मानमितं कुण्ड-
मिति व्यक्तमुक्तं जयाख्ये—
शतार्धसंख्याहोमे तु कुण्डं स्याद् द्वादशाङ्गुलम् ॥
होमे साष्टशते चैव मुष्ट्यरत्निसमं भवेत् ।
होमे चार्धशते चैव सारत्निः सकनिष्ठिकः ॥
२५६ सात्वतसंहिता
हस्तं सहस्रहोमे तु अयुताख्ये द्विहस्तकम्।
लक्षहोमे चतुर्हस्तं कोटिहोमेऽष्टहस्तकम्॥
—(१५।१२-१४) इति।
द्वादशाङ्गुलादिकुण्डानां मेखलाप्रमाणमपि तत्रैव स्पष्टमुक्तम्—
प्रमाणं मेखलानां च यवद्वादशसंमितम्॥
द्वादशाङ्गुलमानस्य कुण्डस्य परिकीर्तितम्।
विस्तारतुल्यमुच्छ्रायो मेखलानां महामते॥
मेखलात्रितयं चैवमेकीकृत्य तु जायते।
विस्तारस्तु ततोच्छ्रायः सार्धं तु चतुरङ्गुलम्॥
रत्निमात्रस्य कुण्डस्य मेखला द्व्यङ्गुलाः स्मृताः।
अङ्गुलं सकनिष्ठस्य कुण्डस्यार्धोत्तरं द्वयम्॥
त्र्यङ्गुला हस्तमात्रस्य कुण्डस्य समता स्मृता।
द्विहस्तस्य द्विजश्रेष्ठ मेखलाश्चतुरङ्गुलाः॥
चतुर्हस्तस्य कर्तव्याः सर्वाश्चैव षडङ्गुलाः।
अष्टाङ्गुलिश्च कुण्डस्य अष्टहस्तस्य कीर्तिताः॥(१५।१६-२१)
इति ॥७९॥
॥ इति श्रीमौज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य
योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते
सात्वततन्त्रभाष्ये एकादशः परिच्छेदः ॥ ११ ॥
— ❧ ❦ ❧ —
काल, आहुति, संख्या, होम एवं द्रव्य की अधिकता को देखते हुए कुण्ड
एक हाथ से लेकर आठ हाथ तक गहरा निर्माण किया जा सकता है ॥ ७९ ॥
॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के यागकुण्डविधि
नामक एकादश परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ ११ ॥
— ❧ ❦ ❧ —
द्वादशः परिच्छेदः
विभवदेवताध्यानम्
नारद उवाच
एवमाकर्ण्य स त्वेवं मुसली मुनिनायकाः ।
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा पप्रच्छ जगतां पतिम् ॥ १ ॥
अथ द्वादशो व्याख्यास्यते । इह सङ्कर्षणो वासुदेवं विभवदेवध्यानं पप्रच्छे-
त्याह—एवमिति ॥ १ ॥
इस बारहवें परिच्छेद में सङ्कर्षण भगवान् वासुदेव से विभव देवताओं का
ध्यान पूछते हैं । नारद ने कहा—हे मुनिनायकों ! इस प्रकार पूर्वोक्त वचनों को
सुन कर सङ्कर्षण ने हाथ जोड़कर भगवान् से पूछा ॥ १ ॥
सङ्कर्षण उवाच
यथाक्रमस्थितानां च मन्त्राणां लक्ष्मीनन्दन ।
त्वत्तोऽहं श्रोतुमिच्छामि सर्वेषां ध्यानलक्षणम् ॥ २ ॥
प्रश्नप्रकारमाह—यथाक्रमस्थितानामिति । लक्ष्मीं नन्दयति सन्तोषयतीति
लक्ष्मीनन्दनेति वासुदेवसम्बोधनम् ॥ २ ॥
सङ्कर्षण ने पूछा—हे लक्ष्मीनन्दन ! अब मैं यथाक्रम स्थित विभव देवताओं
का ध्यान आपसे जानना चाहता हूँ ॥ २ ॥
श्रीभगवानुवाच
त्रयाणां मुख्यपूर्वाणां ध्रुवान्तानां पुरोदितम् ।
शेषादीनां च शेषाणामिदानीमवधारय ॥ ३ ॥
ध्यानं पातालनिलयपर्यन्तानां यथास्थितम् ।
एवं पृष्टो भगवान् प्रत्याह—त्रयाणामिति सार्धेन । मुख्यपूर्वाणां विशाखयूपा-
दीनामित्यर्थः । त्रयाणां विशाखयूपपद्मनाभध्रुवाणामित्यर्थः । पूर्वं नवमपरिच्छेदे—
"विशाखायूपो भगवान् स्वयं विश्वसिसृक्षया" (९।४९) इत्यादिभिर्विशाखयूप-
२५८ सात्वतसंहिता
ध्यानम्, ‘‘इत्येवमादिः सर्वेषाम्’’ (९।९६) इत्यादिभिः पद्मनाभध्रुवध्यानं च प्रति-
पादितमित्यर्थः । शेषाणाम् अवशिष्टानामित्यर्थः । शेषादीनामनन्तादीनां पाताल-
निलयपर्यन्तानां पातालशाय्यन्तानां षट्त्रिंशद्विभवदेवानामित्यर्थः ॥ ३-४ ॥
एक एव जगन्नाथः स्वरूपाद्यैस्तु शक्तिभिः ॥ ४ ॥
नानात्वेनाप्यनन्तो यो भक्तानुग्रहकाम्यया ।
तस्याभिमानिकं रूपं शृणु सर्वेश्वरस्य तु ॥ ५ ॥
तत्रादावनन्तस्य रूपं शृण्वित्याह—एक इति सार्धेन ॥ ४-५ ॥
श्री भगवान् ने कहा—मैंने पूर्व के मुख्य-मुख्य तीन ध्रुवान्त (विशाखयूप,
पद्मनाभ और ध्रुव) (द्र. ९.४९-९६) का ध्यान पूर्व में कह दिया है अब शेष
अनन्तादिकों से प्रारम्भ कर पातालशायी पर्यन्त ३६ विभव देवताओं के ध्यान को
सुनिए । एक ही जगन्नाथ अपनी शक्तियों से स्वरूपों से अनेक होने के कारण जो
भक्तों पर अनुग्रह करने के लिय अनन्त नाम से अभिमानिक रूप धारण करते हैं
उन सर्वेश्वर के स्वरूप को सुनिये ॥ ४-५ ॥
तुहिनाचलसंकाशं पूर्णचन्द्रसमाननम् ।
स्वमणिव्यञ्जितेनैव युक्तं फणगणेन तु ॥ ६ ॥
प्रोद्वहन्तं हलं चक्रमपसव्यद्वयेन तु ।
वामहस्तद्वयेनैव शङ्खं मुसलमेव च ॥ ७ ॥
नित्यसन्निहिताशेषशक्तिं सर्वज्ञमच्युतम् ।
मनस्यन्तर्मुखानां यत् कर्मिणां पूरयेच्च तत् ॥ ८ ॥
तस्य ध्यानप्रकारमाह—तुहिनेति त्रिभिः । शेषकृत्यं भगवत्कैङ्कर्यधुरीणामि-
त्यर्थः । नन्वनेनानन्तस्य भगवदाविष्टत्वमात्रं ज्ञायते, न साक्षादवतारत्वम्, कथं तस्य
मुख्यप्रादुर्भावेष्वन्तर्भाव इति चेन्न, भगवदधिष्ठितबद्धचेतनानामेव मुख्येष्वनन्तर्भावात् ।
अन्तर्मुखानां निजभक्तानां मनसि यद्वाञ्छितमस्ति, तत् पूरयेत् प्रयच्छेदित्यर्थः ।
अनन्तस्थानं तु श्रीविष्णुपुराणे—
आस्ते पातालमूलस्थः शेषोऽशेषसुरार्चितः ॥
तस्य वीर्यं स्वभावं च स्वरूपं रूपमेव च ।
नहि वर्णयितुं शक्यं ज्ञातं वा त्रिदशैरपि ॥
यस्य सा सकला पृथ्वी फणामणिशिखारुणा ।
आस्ते कुसुममालेव कस्तद्वीर्यं वदिष्यति ॥ (२।५।२०-२२)
इति ॥ ६-८ ॥
भगवान् अनन्त का स्वरूप तुहिन (बर्फ) के समान स्वच्छ है तथा चन्द्रमा
के समान मुख है, जो अपने फण समूहों में स्थित मणि समूहों से सारी पृथ्वी
द्वादशः परिच्छेदः २५९
प्रकाशित कर रहे हैं, जो अपने अपसव्य (दाहिने) दो हाथों से हल और चक्र
धारण किये हुए हैं और दोनों बायें हाथों से शङ्ख और मुशल धारण किये हुए हैं।
सम्पूर्ण शक्तियाँ जिनके सन्निधान में हैं, जो सर्वज्ञ अच्युत हैं और जो मन में
अन्तर्मुख जीवों की अभिलाषा पूर्ण करते हैं ॥ ६-८ ॥
१. शक्तीशध्यानकथनम्
शक्तीशोऽप्यथ सञ्चिन्त्यः पुण्डरीकनिभेक्षणः ।
इच्छारूपधरश्चैव सौम्यः प्रहसिताननः ॥ ९ ॥
व्यक्तये च फलादीनां भक्तानामनुकम्पया ।
पीडयन् स्वाङ्घ्रियुग्मेन वसुधां च करद्वयम् ॥ १० ॥
युगानुसारिकान्तिश्च चतुर्वक्त्रश्चतुर्भुजः ।
मूर्तचक्रगदाहस्तः अमूर्ताब्जाम्बुजाङ्कितः ॥ ११ ॥
शमं नयति सन्तापं कमलेनेन्दुखान्तिना ।
नानामन्त्रमयीं विद्यां व्यञ्जयत्यमलात्मनाम् ॥ १२ ॥
सम्यग् वाक्पतिना चैव कम्बुना शब्दमूर्तिना ।
आज्ञाप्रतीक्षकेणैव गदाचक्रद्वयेन तु ॥ १३ ॥
प्रेरितेन हिनस्त्याशु साधुसन्तापकारिणाम् ।
नारसिंहेन वक्त्रेण भवभीतिविघातकृत् ॥ १४ ॥
पुष्णाति सर्वभूतानि वाराहेणामृतात्मना ।
कुरुते पश्चिमस्थेन कापिलेनोपसंहृतिम् ॥ १५ ॥
भक्तिश्रद्धापराणां च स्मृतमात्रः सदैव हि ।
हृन्मध्ये गगने भूमौ वह्निमध्ये जलान्तरे ॥ १६ ॥
चतुर्णां ब्राह्मणादीनां स्वयमेवानुकम्पया ।
चातुरात्म्येन रूपेण चतुर्धा व्यक्तिमेति च ॥ १७ ॥
आत्मतुल्येन देहेन शङ्खपद्माङ्कितेन तु ।
मूर्तिमद्भिर्हलाद्यैस्तु युक्तेन वदनैर्विना ॥ १८ ॥
वर्णानुरूपवर्णेन समेनाप्यसमेन तु ।
अन्योन्यानुगतेनैव पूर्वोद्दिष्टेन नान्यथा ॥ १९ ॥
अथ शक्त्यात्मध्यानमाह—शक्तीश इत्येकादशभिः । इच्छारूपधरः, वक्ष्य-
माणवाहनदेवीभुजास्त्रभेदैर्नानारूपधर इत्यर्थः । अमूर्ताब्जाम्बुजाङ्कितः, अमूर्तः =
केवलरेखारूपः, अब्जः = शङ्खः, अम्बुजं = कमलम्, ताभ्यामङ्कितः । एवं शक्तीशा-
वतारो व्यूहाद् विभवाद्वा संभवतीति बोध्यम् । यतोऽस्मिन्नेव परिच्छेदे वक्ष्यति—
२६० सात्वतसंहिता
चातुरात्म्यसमूहं तु यत्पद्मदलभूस्थितम्।
तथा विभवदेवानां मध्यात् पद्मदलेक्षण ॥
एकस्त्वनुग्रहार्थं तु शक्त्यात्मा भावितात्मनाम्।
बिभर्ति बहुभेदोत्थं रूपं सद्वाहनस्थितम्॥ (१२।१७५-१७६)
इति । अंशावतारत्वमेवोक्तमस्य सहस्रनामभाष्ये—“अथांशावतारा युगा-
नुसारिकान्तिश्चेति । एवं व्याप्तिनियमनादिशक्तिद्वारा विश्वस्य व्याप्तेर्विष्णुः, “सर्व-
शक्त्यात्मने” (सा०सं० २३।४८) इति मन्त्रवर्णात्” (पृ० ५३१) इति । एवं च
त्रिमूर्तिष्वयमेकतम इति बोध्यम्, “नारायणावतारो यः शक्तीशो नाम नामतः”
(८।१९) इति लक्ष्मीतन्त्रोक्तेः ॥ ९-१९ ॥
अब शक्तीश का ध्यान कहते हैं—उन अंशावतार शक्तीश का ध्यान करना
चाहिए; जिनका कमल के समान नेत्र है, जो इच्छानुसार रूप धारण करते हैं,
सौम्य तथा प्रहसित मुख हैं, जो भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये उन्हें फलादि
प्रदान करने के लिये अपने दोनों पैरों से तथा दोनों हाथों को तथा वसुधा को
पीड़ित करते रहते हैं । उनकी कान्ति युगानुसार बदलती रहती है । उनकी चार
भुजायें तथा मुख हैं । मूर्त रूप से चक्र और गदा हाथ में धारण किये हुए हैं और
अमूर्त रूप से जल में उत्पन्न कमल धारण किये हुए हैं । जो चन्द्रमा के समान
कान्ति वाले हैं और अपने कमल से सबके सन्ताप को शमन करते हैं । इतना ही
नहीं जो अमलात्मा महात्माओं में नानामन्त्रमयी विद्या प्रकाशित करते हैं । जो
वाक्पति शब्दमूर्ति शङ्ख से प्रेरित होने पर आज्ञा प्रतीक्षक के समान अपनी गदा
तथा अपने चक्र इन दोनों से साधुओं को सन्ताप देने वालो को नष्ट कर देते हैं
और अपने नरसिंह के मुख से सारे संसार का भय दूर करने वाले है ।
अमृतात्मना अपने वाराहमुख से सारे प्राणियों का पोषण करते हैं । पश्चिमस्थ
कापिल मुख (अग्नि) से सब का उपसंहार करते हैं । भक्ति और श्रद्धा युक्त
अमलात्मा महात्माओं द्वारा स्मरण किये जाने पर हृदय के मध्य में, आकाश
मण्डल में, भूमि में, आग के मध्य में तथा ब्राह्मणादि चारों वर्णों पर अनुकम्पा के
लिये अपने चातुरात्म्य रूप से चार प्रकार से प्रगट हो जाते हैं । जो शङ्ख,
पद्माङ्कित अपने शरीर के समान जो बिना मुख के भी मूर्त्तिमान हलादि से युक्त
होकर वर्णानुरूप वर्ण से, सम रूप से अथवा विषम रूप से अन्योन्यानुगत के
समान पूर्वोद्दिष्ट रूप से प्रगट हो जाते हैं ॥ ९-१९ ॥
२. मधुसूदनध्यानकथनम्
प्रलयानलसूर्याभः स्मर्त्तव्यो मधुसूदनः ।
अष्टबाहुर्विशालांसोऽप्यग्निष्टोमकराङ्कितः ॥ २० ॥
शङ्खचक्रधरश्चैव बाणकार्मुकधृक् तथा।
रजस्तमोभ्यां मूर्त्ताभ्यां सम्प्रवृत्तिनिवृत्तये ॥ २१ ॥
द्वादशः परिच्छेदः २६१
कर्णपीठनिविष्टं च ध्येयं पाणियुगं विभोः।
अथ मधुसूदनध्यानमाह—प्रलयानलेति सार्द्धद्वाभ्याम्। अस्यावतारस्य प्रादुर्भा-
वान्तरत्वमुक्तं पौष्करे—
मधुकैटभमाथी च प्रादुर्भावेश्वरस्य च।
प्रादुर्भावान्तरं विद्धि पद्मनाभस्य वै विभोः॥—(३६।२१४) इति।
अस्य स्थानमप्युक्तं तत्रैव—
मधुकैटभमाथी च संस्थितः सोऽवनीतले॥
क्षीरोदकक्षतिक्षेत्रे सुरासुरनिषेविते।—(३६।३४३-३४४)
इति॥ २०-२२॥
अब मधुसूदन का ध्यान कहते हैं—प्रलयकालीन ऐसे शक्तीश का ध्यान
करना चाहिए जो अग्नि तथा सूर्य के समान देदीप्यमान, अष्टबाहु, विशाल कन्धे
वाले तथा अग्निष्टोम कराङ्कित मधुसूदन हैं। जो मूर्त्तिमान रज तथा तम की प्रवृत्ति
के लिये शङ्ख, चक्र तथा बाण और धनुष धारण किये हुए हैं तथा जो अपने
कर्णपीठ पर अपने दोनों हाथों को रखे हुए हैं, ऐसे मधुसूदन का ध्यान करना
चाहिए॥ २०-२२॥
३. विद्याधिदेव ध्यानकथनम्
विद्याधिदेवं भगवच्चतुर्वक्त्रं चतुर्भुजम्॥ २२॥
लम्बकूर्चं जटादण्डकमण्डल्वक्षसूत्रिणम्।
फुल्लरक्ताम्बुजाभासं श्वेतपद्मकराङ्कितम्॥ २३॥
अथ विद्याधिदेवध्यानमाह—विद्याधिदेवमिति सार्धेन। यद्यपि चतुर्वक्त्रमित्यस्य
श्रुतीर्वक्त्रेभ्यः प्रोद्गिरन्तमित्यस्य चैककण्ठ्याद् “वेदविदे” (सा० सं० २३।५०)
इति विद्याधिदेवमन्त्रवर्णलिङ्गाद् उत्तरत्र स्मरेद् ध्यायेदिति पौनरुक्त्यप्रसङ्गासंभवाच्च
“श्रुतीर्ऋगाद्या वक्त्रेभ्यः प्रोद्गिरन्तमन्तः स्मरेत्” (१२।२४) इति वाक्यस्यापि
पूर्वेणान्वयः स्वरसः, तथापि सर्वज्ञैः श्रीमत्पराशरभट्टारकैः सहस्रनामभाष्ये (पृ०
४८३) तस्य वाक्यस्य कपिलध्यानपरत्वेनोत्तरत्र योजितत्वादस्मादृशैस्तच्चलयितुं न
शक्यम्। किञ्च, यद्यप्यस्य विद्याधिदेवस्य चतुर्वक्त्रत्वजटाकमण्डल्वक्षसूत्रधरत्वादि-
लक्षणानामुक्तत्वादयं विरिञ्चिरिति ज्ञायते, तथापि सहस्रनामभाष्ये (पृ० १८३) निय-
मेन तेषां ब्रह्मादीनां भगवदवतारगणनास्वपरिगणनात्, देवमनुष्यादिवत्, सृष्टिप्रकरणेषु
सृज्यतया परिगणनात्, प्रत्युत तेषां प्रादुर्भावेभ्यो भेदव्यपदेशात्, प्रादुर्भावविलक्षणेन
प्रादुर्भावान्तरशब्देन निर्देशात्, भगवद्विभूतिलेशोद्भवत्वतत्तत्प्रादुर्भावविशेषाधीनप्रवृत्ति-
त्वादिव्यवहाराच्च ब्रह्मणः प्रादुर्भावत्वं निह्नुतम्। किञ्च,
कालो वियन्नियन्ता च शास्त्रं नानाङ्गलक्षणम्।
विद्याधिपतयश्चैव सरुद्रः सगणः शिवः॥
२६२ सात्वतसंहिता
प्रजापतिसमूहस्तु इन्द्र सपरिवारकः। —(९।९१-९२)
इत्यादिपूर्वोक्तभवोपकरणदेवतावर्ग एव प्रजापतिसमूह इत्यत्र चतुर्मुखस्याप्यन्त
-र्भावश्चोक्तः। तस्मात् “परमात्मने” (सा०सं० २३।५१) इति मन्त्रवर्णलिङ्गाच्च
नायं विद्याधिदेवो विरिञ्चिः, अपि तु साक्षात् प्रादुर्भाव इति ज्ञेयम्।
ननु पौष्करे—
मधुकैटभमाथी च प्रादुर्भाविश्वेरस्य च।
प्रादुर्भावान्तरं विद्धि पद्मनाभस्य तद्विभोः॥ —(३६।२१४)
इत्यादिभिर्मधुसूदनादीनामपि प्रादुर्भावान्तरत्वं बहुशः कण्ठरवेणोक्तम्। किं
तावता तेषामपि प्रादुर्भावत्वविरोध इति चेन्न, समुच्चितैः पूर्वोक्तैर्हेतुभिश्चतुर्मुखादीनां
प्रादुर्भावत्वविरोधात्, मधुसूदनादिषु तथाविधहेतुसमुच्चयस्यानवकाशाच्च ॥२२-२३॥
विद्याधिदेव का ध्यान—चार भुजा, चार मुख वाले लम्बे कूर्च (दाढ़ी),
जटा, दण्ड, कमण्डल तथा अक्षमाला धारण किये हुए, विकसित रक्त कमल के
समान कान्ति वाले, हाथ में श्वेत पद्म धारण किये हुए विद्याधिदेव का स्मरण
करना चाहिये ॥ २२-२३ ॥
४. कपिलध्यानकथनम्
श्रुतीर्ऋग्गाद्या वक्त्रेभ्यः प्रोद्गिरन्तमतः स्मरेत्।
निर्धूमाङ्गारवर्णाभं शङ्खपद्माक्षसूत्रिणम्॥ २४ ॥
फुल्लरक्ताब्जविभवं देवताद्यात्मसूत्रकम्।
ध्यायेदभयपाणिं तं कपिलं तेजसां निधिम्॥ २५ ॥
अथ कपिलध्यानमाह—श्रुतीरिति द्वाभ्याम्। वक्त्रेभ्य इति पूजायां बहुवचनं
बोध्यम्। यद्वा तस्याप्यैच्छिकं चतुर्मुखत्वं वक्तव्यम्। अस्य श्रुतिप्रवर्तकत्वं तु सहस्र-
नामभाष्य एव प्रतिपादितम्, “सत्यवृत्तिस्त्रिविक्रमः। महर्षिः कपिलाचार्यः” (५७-
५८ श्लो०) इत्यत्र— “ईदृशेन महामहिम्ना वाच्येन विक्रान्तत्रिवेदस्त्रिविक्रमः।
त्रिरित्येवं त्रयो वेदाः कीर्तिता मुनिसत्तमैः।
क्रमसे तांस्तथा सर्वान् त्रिविक्रम इति स्मृतः॥” (पृ० ४८१)
इति, “यथोक्तवेददर्शनान्महर्षिः” (पृ० ४८२) इति च। अस्य पातालतलवा-
सित्त्वं सुप्रसिद्धम्। अर्चारूपस्थानं तु पौष्करे—
प्राक्समुद्राप्याने तु भूभागे शुभलक्षणे॥
कापिलीं मूर्तिमासाद्य वासुदेवः स्थितः प्रभुः। (३६।३५७-३५८)
इति प्रतिपादितम् ॥ २४-२५ ॥
अब कपिल का ध्यान कहते हैं—वेद की ऋचाओं का स्मरण करते हुए,
विधूम अग्नि के समान तेजस्वी शङ्ख, पद्म एवं अक्षमाला धारण किये हुए,