सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशः परिच्छेदः २४३
भयोरन्तरालेऽन्तःपङ्क्तिस्थं कोष्ठपञ्चकं वीथ्या सहैकीकृत्य बहिःपङ्क्तिस्थकोष्ठ-
सप्तकेन कोणानि तद्बहिः पङ्क्तिद्वये सान्तरं रेखात्रयं कृत्वा मध्ये षट्त्रिंशद्दलंसंयुक्तं
कमलं लिखेत् ॥ ३-१७ ॥
श्री भगवान् ने कहा—लाठी की
तरह सूत्र को नीचे गिरा कर उससे वेदी
का ऊपरी भाग अच्छी तरह चौकोर बना
लेवे । उस वेदी के क्षेत्र को समान रूप
से १८ भागों में विभक्त कर, घटिका रेणु
से रञ्जित सूत्र को प्रक्षिप्त कर मध्य की
तीन पङ्क्तियों में स्थित ३६ कोष्ठकों में
कमल निर्माण करे । उसके बाहर एक
पङ्क्ति में पीठ निर्माण करे । उसमें चार-
चार कोष्ठों से युक्त पूर्वादि चारों दिशाओं
का, फिर तीन-तीन कोष्ठों से युक्त
आग्नेयादि चार वि दिक् (कोण) दिशा का निर्माण करे । उसके बाद बाहर एक पङ्क्ति
में प्रदक्षिणा के लिये वीथी बनावे । उसके बाहर दो पङ्क्ति में पूर्वादि चारों दिशाओं में
पूर्ण शोभा चतुष्टय की सिद्धि के लिये पूर्वादि दिशाओं की अन्त वाली पङ्क्ति में चार
कोष्ठ बनावे और बाहर की पङ्क्ति में दो कोष्ठ को एक में मिला देवे । उसके बाहर
पूर्वादि दिशाओं में दो पङ्क्ति में स्थित चार कोष्ठ में चार द्वार बनावे । पूर्ण शोभा
वाले दोनों पार्श्व में अर्ध शोभा की सिद्धि के लिये बाहर की पङ्क्ति में दो कोष्ठक और
अन्तः पङ्क्ति में एक कोष्ठक इन दोनों को एक में मिला देवे । पूर्वादि पूर्ण शोभा
वाले चार कोष्ठक में आठ रक्तोत्पल अर्ध शोभाष्टक में नीलोत्पल का निर्माण करे ।
आग्नेयादि कोणों में रहने वाले दो-दो उपशोभा के अन्तराल में भीतरी पङ्क्ति में पाँच
कोष्ठक को वीथी के साथ एक में मिला देवे । बाहरी पङ्क्ति में रहने वाले कोष्ठ
सप्तक से कोण, उसके बाहर दो पङ्क्ति के अन्तर में तीन रेखा बना देवे । फिर मध्य
में छत्तिस दल का कमल बनावे ॥ ३-१७ ॥
षट्त्रिंशद्ददलयुक्तं तस्य लक्षणमुच्यते ॥ १७ ॥
पीठावनिसमीपे तु चतुर्थांशपदात् पुरा ।
समुद्धृत्य भ्रमं कुर्याद् ब्रह्मस्थानाच्च तन्तुना ॥ १८ ॥
दिक्सूत्राणां चतुर्णां तु एकैकं हि यदन्तरम् ।
वृत्तावधेः समैर्भागैः पत्रसंख्यैर्विभज्य च ॥ १९ ॥
षड्भिर्हीनं शतं सार्धं सूत्राणां तत्र निक्षिपेत् ।
सूत्रं प्राक्पदसंस्थं यत् तदाश्रित्याब्जपल्लवम् ॥ २० ॥