सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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तन्निमित्तमिदं कर्म कृतं त्वत्प्रीतये मया ॥ २९ ॥
एवमुक्त्वा समभ्यर्च्य चतुरः पाञ्चरात्रिकान् ।
भगवत्प्रतिपत्त्या तु शक्त्या प्रावरणैर्धनैः ॥ ३० ॥
तथा प्रतिसरान्तैस्तु ब्रह्मचारीन् यतीन् गुरून् ।
तर्पयित्वाऽथ चान्नेन पूतेन विविधेन तु ॥ ३१ ॥
क्षान्त्वाऽनुव्रज्य नैवेद्यपूर्वं कुर्याच्च भोजनम् ।
अथ द्वादश्यां प्रातर्नित्यार्चनचतुःस्थानार्चनपूर्वकं पवित्रसमर्पणम्, हविर्निवेदना-
द्यनन्तरं नावलेपादिति श्लोकद्वयेन प्रार्थनम्, भगवत्प्रतिपत्त्या चतुर्णां कारिणां ब्रह्म-
चार्यादीनां भागवतानां च पवित्रसमर्पणहविर्भोजनान्तमर्चनमपराधक्षमापणादिकं स्वानु-
यागं चाह—पुनरभ्यर्च्य देवेशमित्यादिभिः । प्रावरणैर्वस्त्रैरित्यर्थः ॥ २६-३२ ॥
फिर प्रभात होने पर विधिपूर्वक देवेश का अभ्यर्चन करे । फिर प्रणव मन्त्र
से भगवान् के रूप के अनुसार पैर से शिर तक भगवान् को भली प्रकार से भूषित
करे । तदनन्तर हाथ जोड़कर इस प्रकार प्रार्थना करे ॥ २६-२७ ॥
हे भगवन् ! मैंने अहङ्कारवश अथवा अज्ञानवश अपने इस कर्म का त्याग
नहीं किया है । आप सबके हृदय में निवास करते हैं और सब कुछ जानते हैं । हे
परमेश्वर ! मैंने अनिच्छावश भी अपनी शक्ति के अनुसार उस मूल के कारण यह
सारा कार्य आपकी प्रीति के लिये किया है ॥ २८-२९ ॥
साधक इस प्रकार प्रार्थना कर चार अथवा पाँच पाँचरात्र के उपासकों की
पूजा करे । इस प्रकार द्वादशी को प्रातः नित्यार्चन चतुःस्थानार्चनपूर्वकभगवान् को
पवित्रा समर्पण करे । फिर हवि निवेदन के अनन्तर ‘नावलेपादिति’ (२८-२९)
श्लोक द्वय से प्रार्थना करे । फिर भगवद् इष्ट या चार कर्मकारी ब्रह्मचारियों को
तथा चार महाभागवत भक्तों को पवित्रा समर्पण कर हविष्य भोजन करावे । पुनः
अर्चनपूर्वक अपराध समापन करावे । पुनः उन ब्रह्मचारी तथा महाभागवतों को पीछे
अनुगमन कर नैवेद्य पूर्वक भोजन करे ॥ ३०-३२ ॥
अपरेऽहनि संन्यासमाचरेद् वा दिने दिने ॥ ३२ ॥
अपनीय तु माल्यादीन् प्रदद्याद् वा दिने दिने ।
नो याति म्लानतां यावच्चतुर्थेऽहनि वा त्यजेत् ॥ ३३ ॥
विशेषयागपूर्वं तु कारिभ्योऽवसरे स्वके ।
तदपरेद्युरेव पवित्रविसर्जनमाह—अपरेऽहनीत्यर्धेन ।
अथवा पुष्पाणामेव प्रत्यहं विसर्जनं कुर्वन् पवित्राणां विसर्जनं तु चतुर्थेऽहनि
विशेषेण कारिपूजनपूर्वकं कुर्यादित्याह—अपनीयेति सार्धेन । एतदूर्ध्वमपि पवित्र-
स्थापनमुक्तमीश्वरपारमेश्वर्योः—