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सर्वकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

पृष्ठ 386, कुल 837 में से

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पृष्ठ 386

चतुर्दशः परिच्छेदः ३२७
एकरात्रं त्रिरात्रं वा पञ्च वा सप्तरात्रकम् ।
पवित्रकं स्थापयित्वा ततः संन्यासमाचरेत् ॥
अथवार्चागतं विप्र तावत्संस्थाप्य भूषणम् ।
यावदेकादशी शुक्ला संवृत्ता कार्तिकस्य तु ॥ इति ।
—(ई०सं० १४।२५०-२५१, पा०सं० १२।४४६-४४७)
अन्ये च बहवो विशेषा अत्रापेक्षिता ईश्वरादिषु द्रष्टव्याः ॥ ३२-३३ ॥
फिर दूसरे दिन विधिपूर्वक सन्यास ग्रहण कर लेवे, अथवा पूर्वदिन का
समर्पित माल्यादि हटाकर प्रतिदिन नयी-नयी माला समर्पित करे, अथवा यदि
माला तीन दिन तक मलिन न हुई हो तो उसे चतुर्थ दिन त्याग करे । इस प्रकार
कार्यकारी भक्तों के लिये, अपने अवसर उपस्थित होने पर अन्य भी, बहुत सी
विशेषतायें हैं ॥ ३२-३४ ॥
एवं कृते सति तदा सिद्धिर्भवति शाश्वती ।
सर्वथाऽऽराधकानां तु चेतसोऽभीप्सितं तथा ॥ ३४ ॥
॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां पवित्रारोपणविधिर्नाम
चतुर्दशः परिच्छेदः ॥ १४ ॥
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एतत्फलमाह—एवमिति ॥ ३४ ॥
॥ इति श्रीमौज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य
योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते
सात्वततन्त्रभाष्ये चतुर्दशः परिच्छेदः ॥ १४ ॥
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जो इस प्रकार से आराधना में दोष होने पर, इस प्रकार का प्रायश्चित करता
है उसे शाश्वती सिद्धि प्राप्त होती है तथा आराधना करने वाले का सर्वथा अभीष्ट
सिद्ध हो जाता है ॥ ३४ ॥
॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के पवित्रारोपणविधि
नामक चतुर्दश परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ १४ ॥
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