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सर्वकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 384

चतुर्दशः परिच्छेदः ३२५
चतुर्गुणेन संवेष्ट्य ह्यन्तराद् यागमन्दिरम् ।
प्रदक्षिणचतुष्कं तु वर्ममन्त्रं तु संस्मरन् ॥ — (१२।२६९-२७०)
इति पारमेश्वरस्यष्टोक्तेः ॥ १६-२६ ॥
यह पवित्रानुष्ठान दशमी अथवा एकादशी को भी किया जा सकता है,
प्रतिसर (= पवित्रारोपण) कर्म में उपवास कर्म करे । सायंकाल अग्नि में हवन कर
दशमी को भगवान् का अर्चन करे । प्रथम देवेश का आमन्त्रण करे, अर्घ प्रदान
करे, फिर धूप देवे ॥ १६ ॥
फिर उनसे प्रार्थना करे—हे भगवन् ! आप स्वयं अपने आनन्दमय भोग से
नित्य तृप्त हैं । आप में कोई विकार है ही नहीं, तथापि आप की भक्ति से तृप्त
हुआ मैं अपनी सिद्धि की कामना के लिये आप का यजन करता हूँ ॥ १७ ॥
इस प्रकार प्रार्थना कर भगवान् को दन्त धावनादि मुख वास प्रदान करे ।
फिर श्वेत सूत्र समूह से बने हुए एक अथवा अनेक सूत्र समूहों की सुगन्धित
वस्तुओं से पूजा करे । उसे कुङ्कुमादि से यथाशक्ति रञ्जित करे, जिससे वह शोभा
सम्पन्न हो जाय । सुवर्णमय पुष्पों से तथा नाना प्रकार के रत्नों से अथवा रजतमय
खण्डों से धूपित नाल उसे भूषित करे । इस प्रकार भूषित कर लेने के बाद किसी
भूषित अभिनव भाण्ड में अन्तरण पर स्थापित कर प्रणव से अर्चना करे । फिर
उसे भगवान् के सामने स्थापित करे ॥ १८-२१ ॥
फिर देवागार, मन्दिर और यज्ञभूमि को श्वेतसूत्र से चार बार लपेट कर उसे
सामूहिक रूप से नित्य पूजन करे । फिर पञ्चकाल परायण षट्कर्म निरत यतिवृन्दों
तथा वैष्णवों को बुलावे तथा प्रार्थना करे कि मैं आप लोगों के समक्ष कल अपने
इन प्रभु की पूजा करूँगा । अतः हे प्रभु ! मेरे ऊपर कृपा करते हुए कल अवश्य
पधारियेगा ॥ २२-२४ ॥
इसके बाद एकादशी के दिन स्नानादि कार्य विशेष रूप से सम्पादन
करना चाहिए । फिर हवनादि समस्त क्रिया-काण्ड करे तथा साधक जप और
स्तुति में तत्पर रहे । अपने आराध्य भगवान् के सामने स्थित होकर जागते हुए
रात बितावे ॥ २५-२६ ॥
पुनरभ्यर्च्य देवेशं प्रभाते विधिपूर्वकम् ॥ २६ ॥
भूषयेद् भूषणैर्नैव त्वामूर्ध्नः प्रणवेन तु ।
यथारूपैश्च बहुभिर्भूयाद् बद्धाञ्जलिस्त्विदम् ॥ २७ ॥
नावलेपान्न मोहाच्च कर्मत्यागो मया कृतः ।
त्वमेव सर्वं जानासि सर्वेश हृदये स्थितः ॥ २८ ॥
यथाशक्त्या त्वनिच्छातातस्तत्रापि परमेश्वर ।