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सर्वकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 211

१५२ सात्वतसंहिता
आश्वयुजे पद्मनाभादीनाम्, पुष्ये नारायणादीनाम्, चैत्रे विष्ण्वादीनां चार्चनं तत्तन्मासे
तत्तन्मासाधिपतिमारभ्यार्चनीयत्वादुक्तमिति ज्ञेयम् । केशवादीनां मार्गशीर्षाद्याधिपत्यं
प्रसिद्धं खलु । आद्यन्तमनिरुद्धादि पुरुषादिवासुदेवान्तमित्यर्थः । अपरेऽहनि =
चतुर्दश्यां तदाद्यं वासुदेवाद्यं स्वप्नव्यूहमिति भावः । पञ्चदश्यां पौर्णमास्यां संशान्त-
व्यक्तलक्षणम् = अभिव्यक्तानभिव्यक्तमित्यर्थः । तृतीयं = सुषुप्तिव्यूहमित्यर्थः ।
चातुरात्म्यं त्रिधा स्थितं जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिभेदेन त्रिविधमित्यर्थः ॥ ८३-९३ ॥
हे सङ्कर्षण! अब षोडशाख्य व्रत (केशवादि द्वादश एवं वासुदेवादि चार
अर्थात् कुल योग १६—इनका उच्च क्रम से अर्चन षोडशाख्य व्रत कहा जाता है)
कहता हूँ, जो अत्यन्त धन्य व्रत है । पूर्ववत् आषाढ के पहले दिन रात्रि के समय
नियम ग्रहण कर प्रभात पर्यन्त पूजन करे और तीनों संध्याओं में वामनादि द्वादश
मूर्तियों का पूजन करे ॥ ८३-८४ ॥
फिर त्रयोदशी में धर्मादि चतुर्वर्ग को प्रदान करने वाले प्रभु का पूजन करे ।
उसके दूसरे दिन चतुर्दशी को आद्यन्त में अनिरुद्धादि तथा पुरुषादि वासुदेवान्त
व्यूह का पूजन करे । पूर्णमासी को तृतीय संशान्त (अभिव्यक्त एवं अनभिव्यक्त)
विग्रह लक्षण प्रभु का पूजन करे ॥ ८५-८६ ॥
इस प्रकार मूर्त्यन्तर से संयुक्त तीन प्रकार के चातुरात्म्य का एकादशी को
बिना भोजन किये परा भक्ति से आराधन करे । इस प्रकार पूर्णमासी को यथाविधि
पूर्ण रूप से अर्चन कर श्रद्धापूर्वक पवित्र चित्त से चार विष्णु भक्तों का पूजन करे ।
तदनन्तर दिन के अन्त में स्वयं आत्मयाग कर भोजन करे ॥ ८६-८८ ॥
इस प्रकार आश्विन मास में पर्वादिक दिनों में इस क्रिया को प्रारम्भ करे ।
इस मास में पद्मनाभादि विभवावतारों के अर्चन का क्रमशः विधान है ॥ ८९ ॥
सभी पूजनादिक कर्म पूर्ववत् सम्पादन कर साधक एकादशी को भोजन करे
और पौष मास प्राप्त होने पर नारायणादि का यजन करे ॥ ९० ॥
द्वादशी के दिन केशवादि बारह मूर्तियों की तथा व्यूहत्रय की पूजा करे ।
चैत्र में तद्दिवस के (द्वादशी के) आदि से व्यूहत्रय के साथ व्रत करने वाले को
व्यूहत्रय के साथ समर्चन विहित है, फिर संवत्सर पूरा होने पर विशेष पूजन करना
चाहिए ॥ ९१-९२ ॥
व्रतनिष्ठानां भोज्यद्रव्याणि
दत्तशिष्टमतृप्तं च दैवीयान्नेन भावितम् ॥ ९३ ॥
हविश्शेषेण संयुक्तं व्रतिनां भोजनं हितम् ।
अथैवं व्रतनिष्ठानां भोज्यद्रव्यमाह—दत्तशिष्टमिति । अयं श्लोकः सच्चरित्र-
रक्षायां व्याख्यातः । तथाहि—"दत्तशिष्टं कारिसम्प्रदानावशिष्टम् । देवीयान्नेन
पाकपात्रावशिष्टेन हविःशेषेण चरुशेषेण व्रतिनां भगवद्रूपनिष्ठानां सर्वेषां हितम्