सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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खात के तीन अंश से, अथवा आधे अंश से व्यास निर्माण करे । वह
चक्र, शङ्ख से युक्त अम्बुजाकार हो, अथवा गोला हो, अथवा चौकोर हो, जो गदा
के आदि से चक्र पर्यन्त चिह्नों से संयुक्त हो ॥ ७७-७८ ॥
अग्निकार्योपयोगीनि तानि यानि महामते ॥ ७८ ॥
स्रुक्स्रुवादीनि भाण्डानि त्वङ्कितव्यानि तैरपि ।
सुधाद्यैर्वर्णकैः शुद्धैर्भूषयित्वोपलिप्य च ॥ ७९ ॥
सुगन्धैश्चन्दनाद्यैश्च पञ्चगव्यपुरस्सरैः ।
कुण्डवत् स्रुक्स्रुवादिपात्राणामपि चक्रशङ्खादिभगवल्लाञ्छनं कार्यमित्याह—
अग्निकार्येति । कुण्डोल्लेखनादिकमाह—सुधाद्यैरिति । अत्रापेक्षिताः पुष्पताडनाद्यष्ट-
विधकुण्डसंस्कारा जयाख्योक्ता ईश्वरपारमेश्वरयोः संगृहीता ग्राह्याः ॥ ७८-८० ॥
तन्मध्ये च कुशाग्रेण प्राग्भागमवलम्ब्य च ॥ ८० ॥
आरभ्य दक्षिणाशाया लिखेल्लेखामुदग्गताम् ।
तस्यामुपरि संलिख्य लेखानां त्रितयं स्फुटम् ॥ ८१ ॥
प्रागग्रं दक्षिणाशादि ह्युदीच्यन्तं च सान्तरम् ।
कुण्डमध्ये कुशाग्रेण प्राग्भागदक्षिणादि उत्तरान्तमेकामर्गलरेखां लिखेदित्याह—
तन्मध्य इति । तदुपरि दक्षिणाद्युत्तरान्तं सान्तरालं प्रागग्रं रेखात्रयं कुर्यादित्याह—
तस्यामिति । तद्रेखात्रयस्य सुषुम्नापिङ्गलेडादेवताकत्वमुक्तमीश्वर (५।६७-६८)
पारमेश्वर-(७।२९)योर्ग्राह्यम् ॥ ८०-८२ ॥
हे महामते ! जो अग्नि कार्य के लिए सर्वथा उपयोगी हो ऐसे कुण्ड का
निर्माण करे । कुण्ड के समान स्रुक् स्रुवादि पात्रों पर भी चक्र, शङ्ख, गदादिकों
पर भी भगवान् के अस्त्र-शस्त्रों पर भी भगवद् चिह्न करे । पहले कुण्ड का लेपन
करे, फिर चूना आदि वर्णकों से उसे लेप कर शुद्ध करे । उसके मध्य कुशों के
अग्रभाग से पूर्व दिशा का ज्ञान कर, कुशा के अग्रभाग से दक्षिण दिशा से आरम्भ
कर उत्तर दिशा पर्यन्त रेखाङ्कित करे । फिर उसके ऊपर दक्षिण से उत्तर तथा
पूर्वाग्र से पश्चिम, इस प्रकार तीन रेखा स्पष्ट रूप से लिखे । (ध्यान रहे इन तीनों
रेखा की सुषुम्ना, इडा, पिङ्गला ये तीन देवतायें हैं) ॥ ७८-८२ ॥
चतुर्धा प्रणवेनाथ प्रोक्षयेदर्घ्यवारिणा ॥ ८२ ॥
तदभ्यर्च्यर्घ्यपुष्पाद्यैर्ध्यायेत् तद् भद्रपीठवत् ।
प्रणवैस्तु प्रतिष्ठानं प्राग्वदस्य समाचरेत् ॥ ८३ ॥
प्रणवेनार्घ्यवारिणा चतुर्धा प्रोक्षणम्, प्रणवेन पुष्पैborderरभ्यर्चनम्, कुण्डमध्यस्य भद्र-
पीठवद् ध्यानं चाह—चतुर्थेति सार्धेन ॥ ८२-८३ ॥
तदनन्तर चार बार प्रणव का उच्चारण कर अर्घ्य के जल से उन रेखाओं