सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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वक्ष्यति । लक्ष्मीतन्त्रे तु—'मात्राश्च रत्नसम्पूर्णा भोगच्छिद्रप्रपूरणाः' (३९।२५) इति
बहुवचनोक्त्या द्रव्यमात्रा-तण्डुलमात्रा-बीजमात्रा-तिलमात्राणां चतसृणामपि युग-
पद्दानमिति ज्ञायते । शालिमात्रायास्तु स्नपनमात्रनियतत्वं प्रतिपादितं पारमेश्वरे—
शालिमात्रा न कर्तव्या यागे स्नपनवर्जिते ॥
अन्या मात्राः प्रकल्प्याः स्युः सर्वस्मिन्नर्चनाविधौ ।
—(१८।२९-३०) इति
अत एव लक्ष्मीतन्त्रेऽपि स्नानासन एव शालिमात्रा प्रतिपादिता, गोमात्रा तु
मधुपर्कानन्तरमुक्ता, पाद्ये तु सर्वा अप्येकदैव प्रतिपादिताः—
तिलान् वस्त्रं तथा हेम ताम्बूलं तण्डुलानपि ।
फलानि गव्यमाघारं गाश्च धान्यं यथा वसु ॥
गोग्रासं देशिकायातैतद् दद्याद् देवस्य सन्निधौ । इति ।
स्तोत्रमन्त्रैः जितन्ता(लक्ष्मी० २४.६९)द्यैरित्यर्थः । तथा च पारमेश्वरे—
स्तोत्रमन्त्रजपं कुर्याज्जितन्ताद्यं महामते ।
व्यस्तं चैव समस्तं च वाक्ययुक्तं विशेषतः ॥ —(सा० ६।३६१)
इति ॥ ५०-६३ ॥
फिर आचमन देवे और उसी प्रकार पादपीठ भी प्रदान करे । पुनः भक्तिपूर्वक
चन्दनादि सुगन्ध पदार्थ प्रदान करे ॥ ५१ ॥
फिर आर्द्र गन्ध सुखाने के लिये मयूर के पिच्छ द्वारा विजित कर केश
प्रसाधन के लिये कङ्कत (कंघी) प्रदान करे । पुष्प, ताम्बूल तथा कैंची प्रदान करे ।
तदनन्तर देवाधिदेव को मङ्गलकारी दुकूल वस्त्र प्रदान करे । इसके बाद उत्तरीय
सहित उपवीत एवं मुकुटादि समर्पित करे ॥ ५२-५३ ॥
पैरों में विचित्र नूपुर पर्यन्त समस्त अलङ्कारों से अलङ्कृत कर उन्हें केवल
(छुट्टा) पुष्प सहित शिरो माल्य समर्पित करे ॥ ५४ ॥
कान से लेकर चरण पर्यन्त सूत्र में पिरोया हुआ पुष्पमाला तथा हार समर्पित
करे । फिर अत्यन्त मनोहर कङ्कण तथा प्रतिसर पवित्र, जो गैरिकादि धातुओं,
कुङ्कुम, हरिद्रा एवं गोरोचन आदि से विचित्र हो, श्वेत सूत्र में पिरोया गया हो,
बीच-बीच में अत्यन्त कोमल तूल से ग्रथित हो, ऐसी पवित्री देवे ॥ ५५-५६ ॥
शलाका सहित अञ्जन देवे, गन्ध युक्त ताम्बूल देवे, सुवर्ण गर्भ समन्वित
ललाट तिलक तथा कपूर समन्वित गोरोचन मुख वास के लिये प्रदान करे ।।५७।।
वर्ण को अलङ्कृत करने के लिये पुष्प मण्डल तथा महान् दर्पण देवे,
विचित्र कुसुमों से देदीप्यमान, रत्नप्रभा से भासित प्राकार प्रदान करे ॥ ५८ ॥
फिर हाथों के द्वारा बजाये जाते हुए घण्टा के शब्द के साथ मधुर, धूप से
संयुक्त गुग्गुल के धूप से धूपित करे ॥ ५९ ॥