संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
३०४ संस्कारविधिः
परेयि॒वांसं॑ प्र॒वतो॑ म॒हीरनु॑ ब॒हुभ्यः॑ पन्था॑मनुपस्पशा॒नम्।
वै॒व॒स्व॒तं सं॒गम॑नं॒ जना॑नां य॒मं राजा॑नं ह॒विषा॑ दुवस्य॒ स्वाहा॑ ॥ ६ ॥
य॒मो नो गा॒तुं प्र॑थ॒मो वि॑वेद॒ नैषा गव्यू॑ति॒रप॑भर्तवा उ॑।
यत्रा॑ नः॒ पूर्वे॑ पि॒तरः॑ परेयु॒रेना॑ जज्ञा॒नाः प॒थ्या॒३॒॑अनु॒ स्वाः स्वाहा॑ ॥ ७ ॥
मात॑ली क॒व्यैर्य॒मो अङ्गि॑रोभि॒र्बृह॒स्पति॒र्ऋक्व॑भिर्वावृधा॒नः।
याँश्च॑ दे॒वा वा॑वृधु॒र्ये च॑ दे॒वान्त्स्वाहा॒न्ये स्व॒धया॒न्ये म॑द॒न्ति स्वाहा॑ ॥ ८ ॥
इमं॑ यम प्रस्तर॒मा हि सीदाङ्गिरोभिः॑ पि॒तृभिः॑ संविदा॒नः।
आ त्वा॒ मन्त्राः॑ क॒विश॑स्ता वहन्त्वे॒ना रा॑जन् ह॒विषा॑ मादयस्व॒ स्वाहा॑ ॥ ९ ॥
अङ्गि॑रोभि॒रा ग॑हि य॒ज्ञिये॑भि॒र्यम॑ वैरू॒परि॒ह मा॑दयस्व।
वि॒वस्व॑न्तं हुवे॒ यः पि॒ता ते॒ऽस्मिन्य॒ज्ञे ब॒र्हिष्या नि॒षद्य॒ स्वाहा॑ ॥ १० ॥
प्रेहि॒प्रेहि॑ प॒थिभिः॑ पू॒र्व्येभि॒र्यत्रा॑ नः॒ पूर्वे॑ पि॒तरः॑ परे॒युः।
उ॒भा राजा॑ना स्व॒धया॒ मद॑न्ता य॒मं प॑श्यासि॒ वरु॑णं च दे॒वं स्वाहा॑ ॥ ११ ॥
सं ग॑च्छस्व पि॒तृभिः॒ सं य॒मेने॑ष्टापू॒र्तेन॑ प॒रमे व्यो॑मन्।
हि॒त्वाया॑व॒द्यं पुन॒रस्त॒मेहि॒ सं ग॑च्छस्व त॒न्वा॑ सु॒वर्चाः स्वाहा॑ ॥ १२ ॥
अपे॑त॒ वी॑त॒ वि च॑ सर्पतातॊ॒ऽस्मा ए॒तं पि॒तरो॑ लो॒कम॑क्रन्।
अहो॑भिर॒द्भिर॒क्तुभि॒र्व्य॑क्तं य॒मो द॑दात्यव॒सान॑मस्मै॒ स्वाहा॑ ॥ १३ ॥
य॒माय॒ सोमं॑ सुनुत य॒माय॑ जुहुता ह॒विः।
य॒मं ह॑ य॒ज्ञो ग॑च्छत्य॒ग्निदू॑तो॒ अरं॑कृतः॒ स्वाहा॑ ॥ १४ ॥
य॒माय॑ घृ॒तव॑द्ध॒विर्जु॒होत॒ प्र च॑ तिष्ठत।
सं नो॑ दे॒वेष्वा य॑मद्दी॒र्घमायुः॒ प्र जी॒वसे॒ स्वाहा॑ ॥ १५ ॥
अन्त्येष्टिप्रकरणम् ३०५
य॒माय॒ मधु॑मत्तमं॒ राजे॑ ह॒व्यं जु॑होतन।
इ॒दं नम॒ ऋषि॑भ्यः पूर्व॒जेभ्यः॒ पूर्वे॑भ्यः पथि॒कृद्भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ १६ ॥
—ऋ० म० १०। सू० १४॥
कृ॒ष्णः श्वे॒तौऽरु॑षो यामो अस्य ब्र॒ध्न ऋ॒ज्र उत॑ शो॒णो य॑श॒स्वान्।
हिर॑ण्यरूपं॒ जनि॑ता जजान॒ स्वाहा॑ ॥ १७ ॥
—ऋ० म० १०। सू० २०। मं० ९॥
इन ऋग्वेद के मन्त्रों से चारों जने सत्रह आज्याहुति देकर,
निम्नलिखित मन्त्रों से उसी प्रकार आहुति देवें—
प्रा॒णेभ्यः॒ सार्धि॑पति॒केभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ १ ॥
पृ॒थि॒व्यै स्वाहा॑ ॥ २ ॥ अ॒ग्नये॒ स्वाहा॑ ॥ ३ ॥
अ॒न्तरि॑क्षाय॒ स्वाहा॑ ॥ ४ ॥ वा॒यवे॒ स्वाहा॑ ॥ ५ ॥
दि॒वे स्वाहा॑ ॥ ६ ॥ सूर्या॑य॒ स्वाहा॑ ॥ ७ ॥
दिग्भ्यः स्वाहा॑ ॥ ८ ॥ च॒न्द्राय॒ स्वाहा॑ ॥ ९ ॥
नक्ष॑त्रेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ १० ॥ अ॒द्भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ११ ॥
वरु॑णाय॒ स्वाहा॑ ॥ १२ ॥ ना॒भ्यै स्वाहा॑ ॥ १३ ॥
पू॒ताय॒ स्वाहा॑ ॥ १४ ॥ वा॒चे स्वाहा॑ ॥ १५ ॥
प्रा॒णाय॒ स्वाहा॑ ॥ १६ ॥ प्रा॒णाय॒ स्वाहा॑ ॥ १७ ॥
चक्षु॑षे स्वाहा॑ ॥ १८ ॥ चक्षु॑षे स्वाहा॑ ॥ १९ ॥
श्रोत्रा॑य॒ स्वाहा॑ ॥ २० ॥ श्रोत्रा॑य॒ स्वाहा॑ ॥ २१ ॥
लोम॑भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ २२ ॥ लोम॑भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ २३ ॥
त्व॒चे स्वाहा॑ ॥ २४ ॥ त्व॒चे स्वाहा॑ ॥ २५ ॥
लोहि॑ताय॒ स्वाहा॑ ॥ २६ ॥ लोहि॑ताय॒ स्वाहा॑ ॥ २७ ॥
३०६ संस्कारविधिः
मे॒दोभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ २८ ॥ मे॒दोभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ २९ ॥
माथ्ंसेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३० ॥ माथ्ंसेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३१ ॥
स्त्राव॑भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३२ ॥ स्त्राव॑भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३३ ॥
अ॒स्थिभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३४ ॥ अ॒स्थिभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३५ ॥
म॒ज्जभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३६ ॥ म॒ज्जभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३७ ॥
रेत॑से॒ स्वाहा॑ ॥ ३८ ॥ पा॒यवे॒ स्वाहा॑ ॥ ३९ ॥
आ॒या॒साय॒ स्वाहा॑ ॥ ४० ॥ प्रा॒या॒साय॒ स्वाहा॑ ॥ ४१ ॥
सं॒या॒साय॒ स्वाहा॑ ॥ ४२ ॥ वि॒या॒साय॒ स्वाहा॑ ॥ ४३ ॥
उ॒द्या॒साय॒ स्वाहा॑ ॥ ४४ ॥ शुचे॒ स्वाहा॑ ॥ ४५ ॥
शोच॑ते॒ स्वाहा॑ ॥ ४६ ॥ शोच॑मानाय॒ स्वाहा॑ ॥ ४७ ॥
शोका॑य॒ स्वाहा॑ ॥ ४८ ॥ तप॑से॒ स्वाहा॑ ॥ ४९ ॥
तप्य॑ते॒ स्वाहा॑ ॥ ५० ॥ तप्य॑मानाय॒ स्वाहा॑ ॥ ५१ ॥
तृ॒प्ताय॒ स्वाहा॑ ॥ ५२ ॥ घ॒र्माय॒ स्वाहा॑ ॥ ५३ ॥
निष्कृत्यै॒ स्वाहा॑ ॥ ५४ ॥ प्राय॑श्चित्यै॒ स्वाहा॑ ॥ ५५ ॥
भेष॒जाय॒ स्वाहा॑ ॥ ५६ ॥ य॒माय॒ स्वाहा॑ ॥ ५७ ॥
अ॒न्त॒काय॒ स्वाहा॑ ॥ ५८ ॥ मृ॒त्यवे॒ स्वाहा॑ ॥ ५९ ॥
ब्रह्म॑णे॒ स्वाहा॑ ॥ ६० ॥ ब्र॒ह्म॒हत्यायै॒ स्वाहा॑ ॥ ६१ ॥
विश्वे॑भ्यो दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ६२ ॥
द्यावा॑पृथि॒वीभ्याꣳ॒ स्वाहा॑ ॥ ६३ ॥ —यजुः० अ० ३९ ॥
इन तिरसठ मन्त्रों से ६३ आहुति पृथक्-पृथक् देके,
निम्नलिखित मन्त्रों से आहुति देवें—
अन्त्येष्टिप्रकरणम् ३०७
सूर्य॒ चक्षु॑षा गच्छ॒ वात॑मा॒त्मना॒ दिवं॑ च॒ गच्छ पृथि॒वीं च॒
धर्म॑भिः। अ॒पो वा॒ गच्छ॒ यदि॒ तत्र ते हि॒तमोष॑धीषु॒ प्रति॑
तिष्ठा॒ शरी॑रैः स्वाहा॑॥१॥
सोम॒ एके॑भ्यः पवते घृ॒तमेक॒ उपा॑सते ।
येभ्यो॒ मधु॑ प्र॒धाव॑ति॒ तांश्चि॑दे॒वापि॑ गच्छतात् स्वाहा॑॥२॥
ये चि॒त्पूर्व॑ ऋ॑तसाता ऋत॒जाता ऋ॒तावृध॑ः ।
ऋषीं॑स्तप॑स्वतो यम॒ तपो॑जाँ अ॒पि ग॑च्छतात् स्वाहा॑॥३॥
तप॑सा॒ ये अ॑नाधृ॒ष्यास्तप॑सा॒ ये स्व॒र्य॑युः ।
तपो॒ ये च॑क्रि॒रे मह॒स्तांश्चि॑दे॒वापि॑ गच्छतात् स्वाहा॑॥४॥
ये युध्य॑न्ते प्र॒धने॑षु॒ शूरा॑सो॒ ये त॑नू॒त्यज॑ः ।
ये वा॑ स॒हस्र॑दक्षिणा॒स्तांश्चि॑दे॒वापि॑ गच्छतात् स्वाहा॑॥५॥
स्यो॒नास्मै॑ भव पृथिव्यनृक्ष॒रा नि॒वेश॑नी ।
यच्छा॑स्मै॒ शर्म॑ स॒प्रथ॑ः स्वाहा॑ ॥६॥
अपे॒मं जी॒वा अ॑रुधन् गृ॒हेभ्य॒स्तं निर्व॑ह॒त परि॒ ग्रामा॑दितः।
मृ॒त्युर्यमस्या॑सीद्दू॒तः प्रचे॑ता॒ असूंन् पितृ॑भ्यो गम॒यां च॑कार॒
स्वाहा॑॥७॥
य॒मः परो॒ऽवरो॑ वि॒वस्वांस्तत॒ः परं नार्ति पश्या॒मि किं च॒न।
य॒मे अध्व॒रो अधि॑ मे निवि॑ष्टो भुवो॑ वि॒वस्वा॒न्वार्ततान्
स्वाहा॑॥८॥
३०८ संस्कारविधिः
अपा॑गूहन्न॒मृतां॒ मर्त्ये॑भ्यः कृ॒त्वा सव॑र्णामदधुर्विव॑स्वते ।
उ॒ताश्वि-नाव॑भर॒द्यत्तदासी॒दज॑हादु द्वा मि॑थु॒ना सर॑ण्यूः
स्वाहा॑ ॥ ९ ॥
इ॒मौ यु॑नज्मि ते॒ ब॒ह्नी असु॑नीताय॒ वोढ॑वे ।
ताभ्यां॑ य॒मस्य॒ साद॑नं॒ समि॑तीश्चाव॑ गच्छता॒त् स्वाहा॑ ॥ १० ॥
—अथर्व० का० १८ । सू० २ ॥
इन दश मन्त्रों से दश आहुति देकर—
अग्नये रयिमते स्वाहा ॥ १ ॥
पुरुषस्य सयावर्यपेदघानि मृज्महे।
यथा नो अत्र नापरः पुरा जरस आयति स्वाहा ॥ २ ॥
य एतस्य पथो गोप्तारस्तेभ्यः स्वाहा ॥ ३ ॥
य एतस्य पथो रक्षितारस्तेभ्यः स्वाहा ॥ ४ ॥
य एतस्य पथोऽभिरक्षितारस्तेभ्यः स्वाहा ॥ ५ ॥
ख्यात्रे स्वाहा ॥ ६ ॥
अपाख्यात्रे स्वाहा ॥ ७ ॥
अभिलालपते स्वाहा ॥ ८ ॥
अपलालपते स्वाहा ॥ ९ ॥
अग्नये कर्मकृते स्वाहा ॥ १० ॥
यमन्न नाधीमस्तस्मै स्वाहा ॥ ११ ॥
अग्नये वैश्वानराय सुवर्गाय लोकाय स्वाहा ॥ १२ ॥
आयातु देवः सुमनाभिरूतिभिर्यमो ह वेह प्रयताभिरक्ता ।
आसीदताँ सुप्रयते ह बर्हिष्यूर्जाय जात्यै मम शत्रुहत्यै
स्वाहा ॥ १३ ॥
योऽस्य कोष्ठ्य जगतः पार्थिवस्यैक इदद्वशी ।
यमं भङ्गन्यश्रवो गाय यो राजाऽनपरोध्यः स्वाहा ॥ १४ ॥
अन्त्येष्टिप्रकरणम् ३०९
यमं गाय भङ्ग्यश्रवो यो राजाऽनपरोध्यः ।
येनाऽऽपो नद्यो धन्वानि येन द्यौः पृथिवी दृढा स्वाहा ॥ १५ ॥
हिरण्यकक्ष्यान्त्सुधुरान् हिरण्याक्षानयःशफान् ।
अश्वानानः शतो दानं यमो राजाभितिष्ठति स्वाहा ॥ १६ ॥
यमो दाधार पृथिवीं यमो विश्वमिदं जगत् ।
यमाय सर्वमित्तस्थे यत् प्राणद्वायुरक्षितं स्वाहा ॥ १७ ॥
यथा पञ्च यथा षड् यथा पञ्चदशर्षयः ।
यमं यो विद्यात् स ब्रूयाद्यथैक ऋषिर्विजानते स्वाहा ॥ १८ ॥
त्रिकद्रुकेभिः पतति षडुर्वीरेकमिद् बृहत् ।
गायत्री त्रिष्टुप्छन्दांसि सर्वा ता यम आहिता स्वाहा ॥ १९ ॥
अहरहर्नयमानो गामश्वं पुरुषं जगत् ।
वैवस्वतो न तृप्यति पञ्चभिर्मानवैर्यमः स्वाहा ॥ २० ॥
वैवस्वते विविच्यन्ते यमे राजनि ते जनाः ।
ये चेह सत्येनेच्छन्ते य उ चानृतवादिनः स्वाहा ॥ २१ ॥
ते राजन्निह विविच्यन्तेऽथा यन्ति त्वामुप ।
देवांश्च ये नमस्यन्ति ब्राह्मणांश्चापचित्यति स्वाहा ॥ २२ ॥
यस्मिन् वृक्षे सुपलाशे देवैः संपिबते यमः ।
अत्रा नो विशपतिः पिता पुराणा अनुवेनति स्वाहा ॥ २३ ॥
उत्ते तभ्नोमि पृथिवीं त्वत्परीमं लोकं निदधन्मो अहँ रिषम् ।
एताथँ स्थूणां पितरो धारयन्तु तेऽत्रा यमः सादनात् ते मिनोतु
स्वाहा ॥ २४ ॥
यथाऽहान्यनुपूर्वं भवन्ति यथर्तव ऋतुभिर्यन्ति क्लृप्ताः । यथा
नःपूर्वमपरो जहात्येवा धातरायूथँषि कल्पयैषाथँ
स्वाहा ॥ २५ ॥
३१० संस्कारविधिः
न हि ते अग्ने तनुवै क्रूरं चकार मर्त्यः।
कपिर्बभस्ति तेजनं पुनर्जरायुर्गौरिव।
अप नः शोशुचदघमग्ने शुशुग्ध्या रयिम्।
अप नः शोशुचदघं मृत्यवे स्वाहा॥ २६॥
—तैत्ति० प्रपा० ६। अनु० १।१०॥
इन छब्बीस आहुतियों को करके ये सब (ओम् अग्नये
स्वाहा) इस मन्त्र से लेके (मृत्यवे स्वाहा) तक एकसौ इक्कीस
आहुति हुईं, अर्थात् चार जनों की मिलके चार सौ चौरासी और
जो दो जने आहुति देवें तो दो सौ बयालीस। यदि घृत विशेष
हो तो पुनः इन्हीं एक सौ इक्कीस मन्त्रों से आहुति देते जाएँ,
यावत् शरीर भस्म न हो जाए तावत् देवें।
जब शरीर भस्म हो जावे पुनः सब जने वस्त्र प्रक्षालन,
स्नान करके जिसके घर में मृत्यु हुआ हो उसके घर की मार्जन,
लेपन, प्रक्षालनादि से शुद्धि करके, पृष्ठ १३-२१ में लिखे प्रमाणे
स्वस्तिवाचन शान्तिकरण का पाठ और पृष्ठ ९-१२ में लिखे
प्रमाणे ईश्वरोपासना करके इन्हीं स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण
के मन्त्रों से जहाँ अङ्क, अर्थात् मन्त्र पूरा हो, वहाँ ‘स्वाहा’ शब्द
का उच्चारण करके सुगन्ध्यादि मिले हुए घृत की आहुति घर
में देवें कि जिससे मृतक का वायु घर से निकल जाए और
शुद्ध वायु घर में प्रवेश करे और सबका चित्त प्रसन्न रहे। यदि
उस दिन रात्रि हो जाए तो थोड़ी-सी आहुति देकर दूसरे दिन
प्रातःकाल उसी प्रकार स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण के मन्त्रों
से आहुति देवें।
तत्पश्चात् जब तीसरा दिन हो तब मृतक का कोई सम्बन्धी
श्मशान में जाकर चिता से अस्थि उठाके उस श्मशान भूमि
में कहीं पृथक् रख देवे। बस, इसके आगे मृतक के लिए कुछ
भी कर्म कर्त्तव्य नहीं है, क्योंकि पूर्व (भस्मान्तꣳ शरीरम्) यजुर्वेद
अन्त्येष्टिप्रकरणम् ३११
के मन्त्र के प्रमाण से स्पष्ट हो चुका है कि दाहकर्म और
अस्थिसञ्चयन से पृथक् मृतक के लिए दूसरा कोई भी कर्म-
कर्त्तव्य नहीं है। हाँ, यदि वह सम्पन्न हो तो अपने जीतेजी वा
मरे पीछे उसके सम्बन्धी वेदविद्या, वेदोक्तकर्म का प्रचार,
अनाथपालन, वेदोक्त धर्मोपदेश की प्रवृत्ति के लिए चाहे जितना
धन प्रदान करें, बहुत अच्छी बात है॥
॥ इति मृतक-संस्कारविधिः समाप्तः ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्याणां श्रीयुतविरजानन्द-
सरस्वतीस्वामिनां महाविदुषां शिष्यस्य वेदविहिताचारधर्म-
निरूपकस्य श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिनः कृतौ
संस्कारविधिर्ग्रन्थः पूर्तिमगात्॥
आर्यसमाज के नियम
१. सब सत्यविद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं,
उन सबका आदिमूल परमेश्वर है।
२. ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान्,
न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि,
अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी,
अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्त्ता है,
उसी की उपासना करनी योग्य है।
३. वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना-
पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।
४. सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा
उद्यत रहना चाहिए।
५. सब काम धर्मानुसार, अर्थात् सत्य और असत्य को विचार
करके करने चाहिएँ।
६. संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य
है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति
करना।
७. सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य वर्तना चाहिए।
८. अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए।
९. प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से सन्तुष्ट न रहना चाहिए,
किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए।
१०. सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने
में परतन्त्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम में
सब स्वतन्त्र रहें॥
०
टकारा
संस्कार विधि
भारतीय संस्कृति में संस्कारों का विशेष
महत्त्व है। संस्कार हमारे जीवन के आधार हैं।
संस्कार का अर्थ होता है शुद्ध करना, साफ
करना, चमकाना और भीतरी रूप को प्रकाशित
करना।
हमारी दिनचर्या की भांति हमारी
जीवनचर्या भी नियमित है। जन्म से लेकर
मृत्यूपर्यंत के मानव जीवन का गंभीर अध्ययन
करके महर्षि दयानन्द ने मनुष्य के पूर्ण विकास
के लिए- ऐसा विकास जिसमें शरीर, मन, आत्मा
तीनों की उन्नति हो, जिन सुनहरे नियमों की
रचना की है उन्हें हम अपनी जीवनचर्या के नियम
कहते हैं। हमारे संस्कार भी इसी जीवनचर्या के
प्रमुख अंग हैं।
आइये महर्षि दयानन्द कृत संस्कार विधि
द्वारा सोलह संस्कारों की पूर्ण विधि जानें।
विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द