संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१० संस्कारविधिः
न हि ते अग्ने तनुवै क्रूरं चकार मर्त्यः।
कपिर्बभस्ति तेजनं पुनर्जरायुर्गौरिव।
अप नः शोशुचदघमग्ने शुशुग्ध्या रयिम्।
अप नः शोशुचदघं मृत्यवे स्वाहा॥ २६॥
—तैत्ति० प्रपा० ६। अनु० १।१०॥
इन छब्बीस आहुतियों को करके ये सब (ओम् अग्नये
स्वाहा) इस मन्त्र से लेके (मृत्यवे स्वाहा) तक एकसौ इक्कीस
आहुति हुईं, अर्थात् चार जनों की मिलके चार सौ चौरासी और
जो दो जने आहुति देवें तो दो सौ बयालीस। यदि घृत विशेष
हो तो पुनः इन्हीं एक सौ इक्कीस मन्त्रों से आहुति देते जाएँ,
यावत् शरीर भस्म न हो जाए तावत् देवें।
जब शरीर भस्म हो जावे पुनः सब जने वस्त्र प्रक्षालन,
स्नान करके जिसके घर में मृत्यु हुआ हो उसके घर की मार्जन,
लेपन, प्रक्षालनादि से शुद्धि करके, पृष्ठ १३-२१ में लिखे प्रमाणे
स्वस्तिवाचन शान्तिकरण का पाठ और पृष्ठ ९-१२ में लिखे
प्रमाणे ईश्वरोपासना करके इन्हीं स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण
के मन्त्रों से जहाँ अङ्क, अर्थात् मन्त्र पूरा हो, वहाँ ‘स्वाहा’ शब्द
का उच्चारण करके सुगन्ध्यादि मिले हुए घृत की आहुति घर
में देवें कि जिससे मृतक का वायु घर से निकल जाए और
शुद्ध वायु घर में प्रवेश करे और सबका चित्त प्रसन्न रहे। यदि
उस दिन रात्रि हो जाए तो थोड़ी-सी आहुति देकर दूसरे दिन
प्रातःकाल उसी प्रकार स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण के मन्त्रों
से आहुति देवें।
तत्पश्चात् जब तीसरा दिन हो तब मृतक का कोई सम्बन्धी
श्मशान में जाकर चिता से अस्थि उठाके उस श्मशान भूमि
में कहीं पृथक् रख देवे। बस, इसके आगे मृतक के लिए कुछ
भी कर्म कर्त्तव्य नहीं है, क्योंकि पूर्व (भस्मान्तꣳ शरीरम्) यजुर्वेद