सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 40, कुल 192 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३६ )
वह बड़े-बड़े मकानों को बहा ले जाय, परन्तु यदि उसी गंगा को
छोटी-छोटी नालियों में विभक्त कर दिया जाय तो एक ईंट को
भी नहीं बहा सकती। इसी प्रकार मन सूक्ष्म पदार्थों को जान
सकता है, परन्तु विक्षिप्त वृत्ति होने से उसकी शक्ति का तिरोभाव
हो जाता है।
प्र०—इन्द्रियों के प्रत्यक्ष मानने और मानसिक प्रत्यक्ष के
न मानने में क्या दोष होगा ?
उ०—ईश्वरासिद्धेः ॥ ६२ ॥
मानसिक प्रत्यक्ष के न मानने से ईश्वर की सिद्धि न होगी।
क्योंकि रूप न होने से वह चक्षु का विषय नहीं; सुगंध न होने
से वह नासिका का विषय नहीं; रस न होने से वह रसना का
विषय नहीं। जब ईश्वर का प्रत्यक्ष न हुआ तो अनुमान भी न
होगा, क्योंकि अनुमान प्रत्यक्ष-पूर्वक होता है। जिसका तीन
काल में प्रत्यक्ष न हो उसमें अनुमान हो नहीं सकता और
शब्द प्रमाण से भी काम न चलेगा; क्योंकि वेद के ईश्वर-वाक्य
होने से वेद को प्रमाण मानते हैं। जब ईश्वर स्वयम् असिद्ध होगा
तो उसका वाक्य वेद कैसे प्रमाण माना जायगा ? यहाँ अन्योन्या-
श्रय दोष है, क्योंकि ईश्वर की सिद्धि बिना वेद का प्रमाण हो
नहीं सकता, आर वेद के बिना ईश्वर-वाक्य सिद्ध हुये प्रमाण ही
नहीं हो सकता।
प्र०—अनुमान क्यों नहीं होगा। क्योंकि कार्य को देखकर
कारण का अनुमान से ज्ञान हो सकता है। ऐसे ही सृष्टि को
प्रत्यक्ष देखकर उसके कारण का अनुमान कर लेंगे ?
उ०—अनुमान का होना व्याप्ति के अधीन है, और व्याप्ति
प्रत्यक्ष के अधीन है। जब तक प्रत्यक्ष प्रमाण से नियत कारण
कार्य का सम्बन्ध ज्ञान न हो जाय, तब तक व्याप्ति नहीं हो