सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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का बनानेवाला कोई नहीं है, और उत्पत्ति, बनाना दोनों में
इतना अन्तर है कि बीज से अंकुर उत्पन्न हुआ, कुम्हार ने घड़े
को बनाया, इस बात. को बुद्धिमान अपने आप विचार लेवें, कि
उत्पत्ति और बनाना इसमें भेद है या नहीं ? बनाना कोई
और बात है, उत्पत्ति कोई और बात है। इस तरह ही वेदों की
उत्पत्ति मानी गई है, ; किन्तु घटादि पदार्थों के समान वेदों की
उत्पत्ति नहीं है। इस कारण वेद अपौरुषेय हैं।
प्र०—जब कि वेदों में उन्हीं बातों का वर्णन है, जो संसार
में वर्त्तमान हैं, तो वेदों को क्यों प्रमाण माना जाय ?
उ०—निजशक्त्यभिव्यक्तेः स्वतः प्रामा-
ण्यम् ॥ ५१ ॥
अर्थ—जिस वेद के ज्ञान होने से अर्थात् जानने से आयुर्वेद
( वैद्यक ), कला-कौशल आदि सब तरह की विद्याओं का प्रकाश
होता है वह वेद स्वतः ( अपने आप ) प्रमाण है। उस में दूसरे
प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जो आप ही
दूसरों का प्रमाण है, उसका प्रमाण किसको कह सकते हैं,
जैसे—सेर-दुसेरी आदि तोलने को बाट तोलने में आप ही
प्रमाण हैं, लेकिन सेर-दुसेरी आदि बाट क्यों प्रमाण है, ऐसा
प्रश्न कहीं हो सकता, क्योंकि वह तो स्वतः प्रमाण है। इसी तरह
वेदों को भी स्वतः प्रमाण समझना चाहिये। पहिले जो ४१ वें
सूत्र में नास्तिक ने यह-पूर्व पक्ष किया था, कि वेदों का अर्थ नहीं
हो सकता, उसका उत्तर-पक्ष वहाँ पर कह आये थे, और फिर
भी उसको ही दृष्टान्त द्वारा प्रत्यक्ष करते हैं।
नासतः ख्यानं नृशृङ्गवत् ॥ ५२ ॥
अर्थ—जैसे कि पुरुष के सींग नहीं होते, इसी तरह जो
पदार्थ है ही नहीं, उसका कहना भी व्यर्थ है, जैसे कि वन्ध्या